पद ख़त्म हुआ और दरबार ने वही किया जो दरबार करता है। सब ने एक साथ सिर हिलाया।

कृष्णदेव राय ख़ुद कवि थे और यह बात उनके बारे में सबसे पहले कही जाती थी, उनकी लड़ाइयों से भी पहले। वे तेलुगु में लिखते थे और अच्छा लिखते थे, और दरबार में आठ कवि बैठते थे जिनमें से कई उनसे भी अच्छा लिखते थे।

उस दोपहर उन्होंने अपना नया पद पढ़ा था।

आठ पंक्तियों का पद था, बरसात के पहले दिन पर, जिसमें सूखी ज़मीन को एक ऐसी औरत कहा गया था जो दरवाज़े की तरफ़ देखना छोड़ चुकी है। जेठ का महीना था और उस बरस बारिश देर से आ रही थी, इसलिए विषय सबके मन का था।

पढ़ने के बाद वे रुके और उन्होंने सबकी तरफ़ देखा। तारीफ़ शुरू हो गई।

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एक ने कहा कि ऐसा उपमान पहले किसी ने नहीं बाँधा। दूसरे ने कहा कि छठी पंक्ति में जो शब्द है वह पूरे पद को उठा देता है। तीसरे ने आँखें बंद करके दो बार सिर हिलाया, जो सबसे ऊँची तारीफ़ मानी जाती है।

तेनालीराम अपनी जगह पर चुप बैठे थे और राय की नज़र वहीं जाकर रुकी। 'तुम कुछ नहीं कहोगे?' 'मैं कहूँगा तो वही कहूँगा जो ये कह चुके हैं, महाराज।' 'यानी अच्छा है?' 'यानी मेरी बात का कोई मोल नहीं है। मुझे आपने रखा हुआ है।'

दरबार में सन्नाटा हो गया, क्योंकि यह बात उन आठों पर भी लगती थी। राय हँसे नहीं। दरबार में जो लोग हँसने को तैयार बैठे थे, वे भी रुक गए, क्योंकि राजा के हँसे बिना दरबार नहीं हँसता। 'तो फिर मोल किसकी बात का है?'

'जो आपसे कुछ नहीं चाहता, महाराज।' 'ऐसा कौन है?' 'नगर।' तेनालीराम ने जो सुझाया वह इतना था कि पद एक महीने के लिए उन्हें दे दिया जाए।

उन्होंने कहा कि वे उसे मंदिर के गाने वालों को दे देंगे, बिना यह बताए कि किसका है, और वे उसे गली-गली गाएँगे, जैसे बाक़ी पद गाए जाते हैं। एक महीने बाद वे वापस लाकर बता देंगे कि क्या हुआ।

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राय ने पद दे दिया, और यह उनके बारे में सबसे बड़ी बात है। पद उस महीने नगर में फैल गया। हम्पी में गाना फैलने का अपना रास्ता है और वह मंदिर से शुरू होकर घाट, बाज़ार और फिर गलियों तक जाता है।

मंदिर के गाने वाले उसे सुबह की सेवा में गाते थे और उसके बाद बाज़ार की तरफ़ निकल जाते थे। लक्कण्णा उनमें सबसे पुराना था और उसकी आवाज़ दो गलियों तक जाती थी। उसने भी नहीं पूछा कि पद किसका है, क्योंकि गाने वाले यह पूछते नहीं।

गाना जब गली में जाता है तो वह वहीं का हो जाता है।

पंद्रह दिन में वह पद पानी भरने वाली औरतों तक पहुँच गया, और उसके बाद उसका रास्ता किसी के हाथ में नहीं रहा। बच्चे उसे उलटा-सीधा गाने लगे और एक जगह उसकी तर्ज़ भी बदल गई। महीने के आख़िर में तेनालीराम दरबार में लौटे। उन्होंने वे तीस दिन नगर में ही काटे थे और शाम को घाट पर बैठकर सुनते रहे थे।

उन्होंने कहा कि पद पूरा नगर गा रहा है और उसमें दो पंक्तियाँ बदल चुकी हैं। 'कौन-सी?' 'तीसरी और छठी।' छठी वही थी जिसकी तारीफ़ दरबार में सबसे ज़्यादा हुई थी। 'क्या बदल गया है?'

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तेनालीराम ने बताया कि छठी पंक्ति में जो शब्द था वह भारी था और गाने में मुँह पर नहीं चढ़ता था, इसलिए गली ने उसकी जगह दो छोटे शब्द रख लिए हैं। और तीसरी पंक्ति में जहाँ आपने लिखा था कि औरत दरवाज़े की तरफ़ देखना छोड़ चुकी है, वहाँ अब यह गाया जा रहा है कि वह दरवाज़ा खुला छोड़ना भूल चुकी है।

दरबार में किसी ने साँस नहीं ली। राय बहुत देर तक चुप रहे। फिर उन्होंने कहा कि दूसरी वाली बात बेहतर है। 'बहुत बेहतर है, महाराज,' तेनालीराम ने कहा। 'और वह किसी ने सोचकर नहीं बनाई। वह गाते-गाते बनी है।'

'किसने बनाई होगी?' 'यह पता नहीं चलेगा। मैंने पूछा था। हर गली दूसरी गली का नाम लेती है, और तीसरी गली पहली का।'

उस शाम राय ने ताड़ के पत्ते वाली अपनी प्रति मँगवाई। वह उनके अपने हाथ की लिखी हुई थी और उस पर अभी कालिख भी ठीक से नहीं बैठी थी। उन्होंने लोहे की कलम से तीसरी और छठी पंक्ति खुरचकर हटाईं और उनकी जगह वही लिखा जो नगर गा रहा था।

उन्होंने कहीं कोई निशान नहीं लगाया।

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न हाशिये पर, न नीचे। किसी शब्द के ऊपर कोई बिंदु नहीं रखा गया और कहीं यह नहीं लिखा गया कि ये दो पंक्तियाँ बाद में बदली गईं। वह पद आगे चलकर कई जगह उतारा गया और आज भी मिलता है।

उसे पढ़ने वाले पंडित उसकी तीसरी और छठी पंक्ति की तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि पूरे पद में सबसे अच्छी यही दो हैं। यह भी लिखा मिलता है कि इन्हीं दो पंक्तियों से पता चलता है कि लिखने वाला कितना बड़ा कवि था। किसी प्रति में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह जाना जा सके कि वे किसकी हैं, और राय ने अपने जीते जी यह किसी को नहीं बताया।