काग़ज़ पर फ़ौज एक लाख चालीस हज़ार की थी। पिछली लड़ाई में मैदान में जितने आदमी उतरे, उनकी गिनती चौरासी हज़ार बैठी थी। विजयनगर की फ़ौज सीधे राजा की नहीं होती थी।
राज्य के हर बड़े हिस्से पर एक नायक बिठाया जाता था। उसे ज़मीन मिलती थी और बदले में उसे इतने घुड़सवार और इतने पैदल हमेशा तैयार रखने पड़ते थे। ज़मीन की आमदनी का हिसाब उसी गिनती पर लगता था। साल में एक बार जाँच होती थी।
जाँच का तरीक़ा बरसों से एक ही था। हर सूबे में बारी-बारी से मैदान लगता, नायक अपने आदमी और घोड़े लेकर आता, दरबार का अफ़सर देखता, और आगे बढ़ जाता।
तारीख़ें छह महीने पहले तय हो जाती थीं और सबको मालूम रहती थीं। इसे सुविधा माना जाता था, क्योंकि आदमी और घोड़े दूर-दूर से आते हैं और उन्हें तैयारी का वक़्त चाहिए।
इसी में पूरा खेल था।
पहले सूबे की जाँच के बाद उसी के आदमी दूसरे सूबे में पहुँच जाते थे, फिर तीसरे में। एक ही घुड़सवार तीन-चार नायकों की गिनती में खड़ा हो जाता था और तीन-चार जगह उसका दाना-पानी लिखा जाता था। इसे साबित करना मुमकिन नहीं था। दो बार कोशिश हो चुकी थी और दोनों बार अफ़सर ख़ाली हाथ लौटा था।
आदमी के माथे पर लिखा नहीं होता कि वह किसका है। घोड़े के भी नहीं। और अफ़सर वही देखता है जो सामने खड़ा हो। ख़ज़ाने के हिसाब से उस बरस यह निकला कि जितने आदमियों का ख़र्च दिया जा रहा है, उतने आदमी राज्य में हैं ही नहीं।
दरबार में सुझाव आए।
एक ने हर सिपाही के हाथ पर निशान लगवाने की बात रखी। दूसरे ने कहा कि जाँच बिना बताए की जाए। तीसरे का सुझाव दो-दो अफ़सर भेजने का था। कृष्णदेव राय ने तेनालीराम की तरफ़ देखा, जो अब तक चुप बैठे थे।
'गिनती में गड़बड़ है,' उन्होंने कहा। 'गिनने वाले में नहीं।' 'फिर?' 'महाराज, गिनती ठीक है। हर बार जो खड़ा है वह सचमुच खड़ा है। दिक़्क़त सिर्फ़ यह है कि वह कल कहीं और खड़ा था।'
'तो निशान लगवा दें?'
'निशान मिट जाता है। और आदमी को निशान लगाकर भेजना उसका अपमान है, और अपमान की गई फ़ौज लड़ती नहीं।'
'तो रास्ता क्या है?' कोषाधिकारी बीच में बोल पड़ा कि ख़र्च वैसे भी हर बरस बढ़ता जा रहा है और इस बार का हिसाब पिछली बार से भी बुरा है। तेनालीराम ने जो कहा उसमें न कोई निशान था, न कोई जाँच।
'आठों सूबों की जाँच एक ही दिन रखिए।' दरबार में कुछ देर किसी को समझ नहीं आया। फिर धीरे-धीरे आया।
एक ही दिन, एक ही घड़ी, आठ अलग-अलग मैदान, आठ सौ कोस में फैले हुए। कोई आदमी दो जगह खड़ा नहीं हो सकता। कोई घोड़ा दो मैदानों में नहीं दौड़ सकता। और इसके लिए किसी पर इलज़ाम लगाने की ज़रूरत नहीं थी।
हुक्म उसी हफ़्ते निकला और उसमें चोरी का ज़िक्र नहीं था। लिखा सिर्फ़ इतना गया कि इस बरस से जाँच का तरीक़ा बदला जा रहा है और आठों सूबों की जाँच एक साथ होगी, ताकि दरबार के अफ़सरों का वक़्त बचे।
तारीख़ भी बताई गई। चार महीने बाद की। उन चार महीनों में जो हुआ, वह किसी दरबार में नहीं हुआ। वह सूबों में हुआ, चुपचाप, और उसकी कोई रिपोर्ट नहीं आई।
तिरुमल पूर्वी सूबे का नायक था और उसकी लिखी हुई गिनती ग्यारह हज़ार की थी। उसने उन चार महीनों में सचमुच के आठ हज़ार आदमी भर्ती किए, क्योंकि उधार वाले अब नहीं मिलने थे। सिद्दप्पा ने दूसरा रास्ता लिया। उसने ख़ुद दरबार में आकर अपनी गिनती नौ हज़ार से घटाकर पाँच हज़ार करा ली और उसी हिसाब से कम ज़मीन ले ली।
दो नायकों ने कुछ नहीं किया और जाँच वाले दिन उनके मैदान आधे ख़ाली रहे। उनमें से एक की जगह उसके भाई को दे दी गई और दूसरे से आधी ज़मीन वापस ले ली गई। उस बरस की कुल गिनती एक लाख चालीस हज़ार से घटकर छियानबे हज़ार रह गई।
यह घटना नहीं था। यह पहली बार सही गिनती थी, और ख़ज़ाने वालों ने दरबार में यही कहकर उसे पढ़ा भी। और अगली लड़ाई में मैदान में बानबे हज़ार उतरे, जो उससे पहले कभी नहीं हुआ था। उस साल के बाद जाँच हमेशा एक ही दिन होने लगी।
तारीख़ भी अब छह महीने पहले नहीं बताई जाती थी। वह एक महीने पहले बताई जाती थी और नायकों को उसमें कोई ख़ास दिक़्क़त भी नहीं हुई, क्योंकि जिसके पास सचमुच के आदमी हों उसे तैयारी के लिए महीना बहुत होता है।
एक और चीज़ बदली, जो किसी हुक्म में नहीं लिखी गई थी।
जाँच के महीने में सूबों के बीच वाली बड़ी सड़क पहले भरी रहती थी। घोड़े, पैदल, बैलगाड़ियाँ, सब एक सूबे से दूसरे की तरफ़ चलते दिखते थे और लोग समझते थे कि फ़ौज की आवाजाही है। उस बरस के बाद वह सड़क जाँच के महीने में उतनी ही ख़ाली रहने लगी जितनी बाक़ी ग्यारह महीनों में रहती थी।