तेनालीराम का खेत बिना जुता पड़ा था और आषाढ़ के बादल कभी भी आ सकते थे। ज़मीन डेढ़ एकड़ थी, गाँव के छोर पर, और तीन गरमियों से उसमें कुछ नहीं बोया गया था। ऊपर की मिट्टी पत्थर जैसी सख़्त हो चुकी थी। तीन गरमियों से वह इसलिए ख़ाली पड़ा था कि तेनालीराम का ज़्यादातर वक़्त दरबार में जाता था, और खेती के लिए न आदमी थे न मन।

बैलों की जोड़ी पड़ोसी की थी और वह हर साल उधार मिल जाती थी। इस बार पड़ोसी ने पहले ही बता दिया था कि उसका अपना काम ही दस दिन का है। दस दिन बाद बारिश आ चुकी होती और जुताई का कोई मतलब नहीं रहता।

मज़दूर लगाने का ख़र्च तेनालीराम ने पूछा था। जवाब सुनकर उन्होंने दोबारा नहीं पूछा। दरबार का विदूषक तनख़्वाह पाता है, ज़मींदारी नहीं। घर का सारा हिसाब लक्ष्मम्मा रखती थीं, और उसमें इस साल जुताई का ख़ाना ख़ाली पड़ा था।

सबने हामी भरी

उन्हीं दिनों गाँव में दो आदमी घूमते दिख रहे थे। मल्लन्ना और पेद्दन्ना, दोनों पास के क़स्बे के, दोनों बिना काम के। दोनों पहले किसी साहूकार के यहाँ काम करते थे, और साहूकार के मरने के बाद उसके बेटों ने सारे पुराने लोगों को हटा दिया था। काम माँगने वे तीन गाँव घूम चुके थे। उनके बारे में कोई पक्की बात किसी को मालूम नहीं थी, पर तीन घरों में रात को कुत्ते भौंके थे और लोग जोड़ लगा रहे थे।

एक शाम तेनालीराम आँगन में बैठे थे कि उन्हें दीवार के उस पार खाँसने की आवाज़ आई। वे उठे नहीं। उन्होंने बस अपनी पत्नी लक्ष्मम्मा को भीतर से बुलाया और बात शुरू कर दी, ज़रा ऊँची आवाज़ में।

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उन्होंने कहा कि राजा ने इस बार जो थैली दी है वह घर में रखना ठीक नहीं है। चोरों का ज़ोर है। इसलिए उन्होंने उसे खेत में गाड़ दिया है, और जगह उन्हें ख़ुद ठीक-ठीक याद नहीं, क्योंकि अँधेरे में गाड़ी थी, बस इतना पता है कि बीच वाले हिस्से में कहीं है।

लक्ष्मम्मा ने पूछा कि इतनी लापरवाही क्यों की। तेनालीराम ने कहा कि जो चीज़ ख़ुद उन्हें न मिले, वह किसी और को कैसे मिलेगी।

दीवार के उस पार कुछ देर तक चुप्पी रही। फिर दो जोड़ी पैर धीरे-धीरे दूर चले गए।

एक और पेच

उस रात तेनालीराम देर तक जागे। पहले पहर के बाद खेत की तरफ़ से आवाज़ आने लगी, वही आवाज़ जो कुदाल के मिट्टी में धँसने से आती है। एक कुदाल नहीं थी। दो थीं। बीच-बीच में कुदाल पत्थर से टकराती थी और तब आवाज़ बदल जाती थी। एक बार कुछ गिरा और उसके बाद देर तक चुप्पी रही, जैसे दोनों रुककर सुन रहे हों कि किसी ने सुना तो नहीं।

आवाज़ भोर तक आती रही।

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सुबह तेनालीराम मेड़ पर जाकर खड़े हो गए। डेढ़ एकड़ ज़मीन एक सिरे से दूसरे सिरे तक खोदी जा चुकी थी। ढेले तोड़े गए थे, मिट्टी पलटी गई थी, और जगह-जगह गड्ढे थे जिन्हें भरना मुश्किल नहीं था। ऐसी जुताई बैलों से भी नहीं होती। मेड़ पर खड़े होकर देखने पर लगता था कि किसी ने पूरी ज़मीन को ऊपर से नीचे कर दिया है, और तेनालीराम कुछ देर तक बस यही सोचते रहे कि दो आदमी एक रात में इतना कैसे कर सकते हैं।

उन्होंने उसी दिन बीज डलवाए। तीसरे दिन बारिश आ गई।

पाँचवें दिन मल्लन्ना और पेद्दन्ना घर के सामने आ खड़े हुए। दोनों की हथेलियाँ फूली हुई थीं और दोनों के चेहरे पर वह भाव था जो ठगे जाने के बाद आता है, पर जिसे कहा नहीं जा सकता, क्योंकि कहने पर अपनी बात ख़ुद खुल जाती है।

"थैली नहीं मिली?" तेनालीराम ने पूछा। दोनों चुप रहे। "मुझे भी नहीं मिली थी," उन्होंने कहा। "क्योंकि मैंने कुछ गाड़ा ही नहीं था।"

मल्लन्ना ने जवाब देने की कोशिश की और बीच में ही रुक गया। पेद्दन्ना ने ज़मीन देखनी शुरू कर दी।

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तेनालीराम भीतर गए और लौटे तो हाथ में पैसे थे। उन्होंने दोनों को एक रात की मज़दूरी दी, वही जो गाँव में दो आदमियों की एक रात की बनती थी, एक पैसा कम नहीं। "यह किसलिए?" मल्लन्ना ने पूछा। "काम किसलिए किया?"

बात गाँव में फैली और वहाँ से दरबार तक पहुँची। राजा कृष्णदेव हँसते-हँसते दोहरे हो गए और उन्होंने पूछा कि अगर वे दोनों खोदने न आते तो क्या होता। तेनालीराम ने कहा कि तब खेत बिना जुते रह जाता, और वे यह बात हँसकर नहीं बोले। दरबार के एक आदमी ने कहा कि दोनों को पकड़वा देना चाहिए था, क्योंकि इरादा तो चोरी का ही था। तेनालीराम ने कहा कि इरादे पर सज़ा देने लगें तो दरबार ख़ाली हो जाएगा।

उस साल की फ़सल अच्छी हुई। कटाई के वक़्त तेनालीराम ने दो आदमी लगाए और दोनों वही थे। पेद्दन्ना अब भी वहीं काम करता है। मल्लन्ना दो साल बाद अपने क़स्बे लौट गया और जाते हुए कह गया कि वह रात उसकी ज़िंदगी की सबसे बेवक़ूफ़ी वाली रात थी, और उसने यह बात हँसकर कही।