फ़सल कटकर भंडारों में आ गई और उसके पीछे-पीछे चूहे आ गए। विजयनगर के सरकारी भंडार शहर के पश्चिम में थे, आठ बड़े कमरे, और उस कार्तिक में उनमें से तीन में बोरियाँ नीचे से कटी हुई मिलीं। नुक़सान का हिसाब लगाया गया तो अफ़सर की आवाज़ धीमी हो गई। भंडार का काम यह था कि साल भर शहर उसी से चलता था, और कार्तिक से चैत तक उसमें जो पड़ा रहता था वही अगली फ़सल तक का सहारा था।
दरबार में मंत्री अप्पाजी ने उपाय रखा। हर घर में एक बिल्ली हो। बिल्लियाँ चूहे मारेंगी और भंडार बचेंगे। और चूँकि ग़रीब घर बिल्ली नहीं पाल सकते, इसलिए राजकोष से हर घर को रोज़ आधा सेर दूध दिया जाए, ताकि बिल्ली भूखी न रहे।
राजा कृष्णदेव को बात जँच गई। हुक्म उसी हफ़्ते निकल गया। शहर के हर मोहल्ले में बिल्लियाँ बाँटी गईं और राजकीय गोशाला से रोज़ भोर में दूध की गाड़ियाँ निकलने लगीं।
तेनालीराम की चाल
वेंकम्मा कुम्हारों वाले मोहल्ले में रहती थी। पति को गुज़रे तीन साल हो चुके थे और दो बच्चे थे, चार और छह के। वह चाक पर काम करती थी, अपने ससुर के पुराने चाक पर, और महीने भर के बर्तन बेचकर जितना मिलता था उसमें दूध का कोई हिस्सा नहीं बनता था। उसके घर में दूध साल में दो बार आता था, दोनों बार त्योहार पर। अब वह रोज़ आ रहा था।
पहले दिन उसने कटोरा बिल्ली के आगे रखा और उसे देखती रही। कटोरे में दूध ऊपर तक भरा था और उस पर हल्की मलाई तैर रही थी। छोटा लड़का बग़ल में खड़ा था। वह कुछ बोला नहीं। बस देखता रहा।
दूसरे दिन कटोरा बच्चों के आगे गया। उसने ख़ुद एक घूँट नहीं लिया।
यह अकेली वेंकम्मा ने नहीं किया। मोहल्ले के अट्ठाईस घरों में से छब्बीस में यही हुआ, और किसी ने किसी से इसका ज़िक्र नहीं किया, क्योंकि कहने की ज़रूरत नहीं थी।
छह महीने बाद भंडार का हिसाब फिर आया। चूहे कम नहीं हुए थे, बढ़ गए थे। दूध का ख़र्च राजकोष में एक अलग मद बन चुका था और वह मद हर महीने मोटा हो रहा था।
सच सामने आया
राजा ने जाँच बिठाई। नरसिम्हा नाम का अफ़सर घर-घर गया। उसके पास एक लंबी सूची थी और हर घर के आगे उसे सिर्फ़ हाँ या ना लिखना था, इसलिए उसका काम शाम तक निपट गया। हर घर में बिल्ली मिली, हर बिल्ली मोटी मिली, और हर आदमी ने कहा कि दूध बिल्ली को ही जाता है। वेंकम्मा ने भी यही कहा, और कहते हुए उसने दरवाज़े की चौखट पकड़ रखी थी।
रिपोर्ट आई कि सब ठीक चल रहा है। दरबार में इसे पढ़कर सुनाया गया और उसके बाद सन्नाटा रहा, क्योंकि सब ठीक चल रहा था और चूहे फिर भी बढ़ रहे थे।
तभी तेनालीराम ने कहा कि उनके घर की बिल्ली दूध नहीं पीती।
दरबार हँस पड़ा। राजा ने कहा कि ऐसी बिल्ली दिखाओ। अगले दिन तेनालीराम बिल्ली लेकर आए, दुबली सी, और उसके आगे भरा हुआ कटोरा रखा गया। बिल्ली ने एक बार सूँघा और तीन क़दम पीछे हट गई। कटोरा पास सरकाया गया तो वह और पीछे हट गई और फिर खंभे के पीछे चली गई।
"यह क्या है, तेनालीराम?" "पहले दिन मैंने इसे दूध दिया था, जहाँपनाह। खौलता हुआ। इसका मुँह जल गया। उस दिन के बाद यह दूध के पास नहीं जाती।" "तुमने ऐसा क्यों किया?" "क्योंकि जो बिल्ली दिन में दो बार दूध पीती है, वह चूहा नहीं पकड़ती। मेरी बिल्ली पहले दिन से भूखी है। मेरे घर में एक भी चूहा नहीं है।"
राजा कुछ देर उस दुबली बिल्ली को देखते रहे। उनका अगला सवाल यह था कि बाक़ी घरों की बिल्लियाँ चूहे क्यों नहीं पकड़तीं।
"वह सवाल मत पूछिए, जहाँपनाह," उन्होंने जवाब दिया। "यह पूछिए कि दूध कहाँ जा रहा है। आपके अफ़सर ने घर-घर जाकर यह देखा कि बिल्ली भूखी तो नहीं है। यह किसी ने नहीं देखा कि घर में और कौन भूखा है।"
इस बार किसी की हँसी नहीं निकली। अप्पाजी ने सिर झुका लिया। राजा ने नरसिम्हा को बुलाकर एक ही सवाल पूछा, कि कुम्हारों वाले मोहल्ले में कितने बच्चे हैं, और अफ़सर के पास इसका जवाब नहीं था।
हुक्म बदल दिया गया। दूध अब बिल्लियों के नाम पर नहीं, बच्चों के नाम पर बाँटा जाने लगा, उन्हीं मोहल्लों में, उतनी ही मात्रा में। बिल्लियाँ वहीं रहीं और उनका दाना बंद हो गया। गोशाला से उतनी ही गाड़ियाँ निकलती रहीं और राजकोष का ख़र्च एक पैसा नहीं बढ़ा, क्योंकि दूध वही था और मोहल्ले वही थे। तीन महीने में भंडार का नुक़सान आधे से नीचे आ गया, और चौथे महीने में अफ़सर ने पहली बार यह लिखा कि गिनती करने लायक़ नुक़सान नहीं है।
वेंकम्मा के घर दूध अब भी रोज़ आता है और अब उसे कटोरा किसी के आगे सरकाने में देर नहीं लगती। बिल्ली दीवार पर बैठी रहती है, पहले से दुबली, और भंडार वाली दीवार में जो सूराख़ है उससे नज़र नहीं हटाती।