तीसरी बार बाँध उसी जगह से टूटा जहाँ से पिछली दो बार टूटा था। ख़बर हम्पी दस दिन बाद पहुँची। रास्ते में नदी चढ़ी हुई थी। वह तालाब कोर्रगल की तरफ़ था और उससे नौ गाँवों की ज़मीन सींची जाती थी।

विजयनगर में पानी का काम सबसे बड़ा काम माना जाता था। पहाड़ी नालों को रोककर तालाब बनाए जाते थे और उनसे निकली नहरें कोसों दूर तक जाती थीं। जिस बरस तालाब भर जाता, उस बरस उन गाँवों से दो फ़सलें आती थीं। जिस बरस टूट जाता, उस बरस एक भी नहीं।

ठेका मल्लण्णा के पास था।

वह अपने काम का जानकार माना जाता था और उसके बाप ने भी यही काम किया था। बाँध पहली बार तीन बरस पहले बना था। तब सब ठीक लगा था। पहली बरसात में वह बीच से बैठ गया।

मल्लण्णा ने कहा कि उस साल पानी बहुत आया और ऐसा पानी बीस बरस में नहीं आया था। बात मान ली गई। दोबारा बनाने का काम भी उसी को मिला, क्योंकि जो पहले बना चुका है वही जल्दी बना सकता है।

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दूसरी बरसात में वह किनारे से कटा। इस बार उसने बताया कि नीचे की मिट्टी में चूहों ने बिल कर दिए थे। यह भी होता है। उसे तीसरी बार का काम मिल गया। तीसरी बरसात में वह उसी बीच वाली जगह से फिर बैठ गया।

अब की बार दरबार में बात उठी।

कोई कह रहा था कि मिट्टी की जाँच कराई जाए। कोई कह रहा था कि ठेका बदल दिया जाए और किसी और को दिया जाए। कोषाधिकारी ने हिसाब पढ़कर सुनाया कि तीन बार में उस एक बाँध पर जितना ख़र्च हुआ है, उतने में दो नए तालाब बन जाते।

कृष्णदेव राय ने कोषाधिकारी से एक ही बात जाननी चाही, कि मल्लण्णा पर चोरी साबित होती है या नहीं। कोषाधिकारी ने कहा कि नहीं होती। कहीं से नहीं होती।

यही असली दिक़्क़त थी। मिट्टी का काम है। कितनी डली, कितनी दबाई गई, कितनी परतें पड़ीं, यह बाद में कोई नहीं बता सकता। और जब वह बह चुका हो तब तो बिलकुल नहीं। 'तो नया आदमी लगा दो,' किसी ने कहा।

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'नया आदमी भी मिट्टी का ही काम करेगा,' तेनालीराम बोले। दरबार चुप हो गया। 'महाराज, चोरी साबित करने की ज़रूरत नहीं है। यह पूछने की ज़रूरत है कि जब बाँध टूटता है तो किसका नुक़सान होता है।' राय ने कहा कि नौ गाँवों का होता है।

'और बनाने वाले का?' 'उसका फ़ायदा होता है।' 'तो जब तक यह बात उलटी है, बाँध टूटता रहेगा। चाहे मल्लण्णा बनाए, चाहे कोई और।' 'तो इसका इलाज क्या है?' तेनालीराम ने जो कहा वह इतना छोटा था कि पहले किसी को समझ ही नहीं आया।

'बनाने वाले का घर बाँध के नीचे बनवा दीजिए।' दरबार में हँसी हुई। ज़ोर की हँसी। फिर हँसी बंद हो गई। आदेश उसी हफ़्ते निकला। उसमें एक भी कड़ा शब्द नहीं था।

उसमें लिखा था कि तालाब चौथी बार बनाया जाएगा, ठेका मल्लण्णा के पास ही रहेगा, मज़दूरी पहले जितनी ही रहेगी, और उसके साथ राज्य की तरफ़ से उसे नौ मुरा ज़मीन और एक मकान दिया जाएगा। मकान की जगह भी लिखी हुई थी। बाँध के ठीक नीचे, ढलान से चार सौ क़दम पर, नाले के रास्ते में।

मल्लण्णा ने कहा कि वह मकान नहीं लेगा। उससे कहा गया कि यह इनाम है और इनाम लौटाया नहीं जाता। उसने कहा कि परिवार वहाँ नहीं रहेगा। उससे कहा गया कि आदेश में परिवार का ज़िक्र नहीं है, बस इतना है कि मकान उसका होगा और उसमें वह ख़ुद बरसात के चार महीने रहेगा।

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काम उस बार आठ महीने चला। पिछली बार तीन में हो गया था।

जो लोग देखने गए उन्होंने बताया कि इस बार मिट्टी अलग तरह से डाली जा रही है। पतली परतें, हर परत पर पानी छिड़ककर बैलों से रौंदाई, और बीच में मुरम की एक पट्टी। किनारों पर पत्थर भी लगाए गए, जो पहले तीनों बार नहीं लगे थे।

मल्लण्णा रोज़ सुबह से शाम तक वहीं रहता था और एक-एक टोकरी अपनी आँख के सामने डलवाता था। चूहों वाली बात भी उसने ख़ुद ही सुलझा ली। उसने बाँध के भीतरी हिस्से में कड़ी मिट्टी और चूने की एक तह डलवाई, जिसमें बिल नहीं बनते।

वह बाँध उस बरसात में नहीं टूटा। एक जगह से भी नहीं। अगली बरसात में भी नहीं टूटा, और उस बरस पानी सच में बहुत आया था।

मल्लण्णा उसके बाद बीस बरस और काम करता रहा और उसने राज्य के लिए चार और तालाब बनाए। हर एक के नीचे उसका एक मकान बना और उसने चारों में रहना क़बूल किया, और चौथे के बाद उसने ख़ुद यह शर्त अपने काग़ज़ों में लिखवानी शुरू कर दी, क्योंकि उससे उसे काम जल्दी मिलने लगा था।

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कोर्रगल वाला वह मकान आज भी बाँध के नीचे खड़ा है, ढलान से चार सौ क़दम पर। उसमें मल्लण्णा के परिवार की सातवीं पीढ़ी रहती है। बरसात में उस घर के आँगन में पानी आता है, टख़ने तक, और हर बरस उतना ही आता है, और उससे ज़्यादा कभी नहीं आया।