आवाज़ हल्की थी और उसका समय तय नहीं था। मिन्नी उसे चार रात सुनती रही। पूरी चार। उनका कमरा टीन का है, यानी उसकी छत टीन की है और दीवारें पक्की हैं। टीन की छत पर आवाज़ें आती हैं, यह सब जानते हैं।
बारिश की, हवा की, बिल्ली की, और पत्ते गिरने की। यह आवाज़ इनमें से किसी जैसी नहीं थी। यह एक थाप थी, एक ही जगह पर, और वह लौटकर आती थी। पहली रात मिन्नी ने उसे गिनने की कोशिश की।
उसने गिना कि एक थाप के बाद अगली कितनी देर में आती है। उसे कोई हिसाब नहीं मिला। कोई भी नहीं। कभी वह जल्दी आती और कभी बहुत देर बाद। दूसरी रात उसने अपनी माँ से यह कहा। माँ ने कहा कि बिल्ली होगी। और सो जा।
मिन्नी ने कहा कि बिल्ली चलती है और यह एक ही जगह पर है। माँ ने कहा कि तो कोई पत्ता होगा। मिन्नी ने कहा कि पत्ता एक ही बार गिरता है। इन दोनों बातों का जवाब माँ के पास नहीं था और उन्होंने यह मान भी लिया।
उन्होंने कहा कि कल दिन में देखेंगे। तीसरे दिन दोपहर में छत पर देखा गया। देखने का काम मिन्नी के चाचा ने किया, जो सीढ़ी लगाकर ऊपर चढ़े। ऊपर कुछ नहीं था। कुछ भी नहीं। टीन पर धूल थी, दो-तीन सूखे पत्ते थे, और एक जगह पानी का पुराना निशान था।
वे नीचे उतर आए और उन्होंने कहा कि कुछ नहीं है। तीसरी रात आवाज़ फिर आई। उसी जगह से। इस बार मिन्नी ने एक चीज़ की, जो सबसे काम की निकली। उसने आवाज़ की जगह पहचानने की कोशिश की। वह चारपाई पर लेटी रही और उसने ध्यान से सुना, और उसे लगा कि आवाज़ कमरे के उस कोने के ऊपर से आती है जो आँगन की तरफ़ है।
यह उसने अगली सुबह बता दिया। चौथे दिन शाम को चाचा दोबारा ऊपर गए और इस बार वे उसी कोने पर गए। वहाँ भी टीन ख़ाली था। पहले जैसा। पर उस कोने पर उन्होंने नीचे झाँका, टीन के किनारे से, और वहाँ उन्हें वह चीज़ दिखी।
आँगन की दीवार के सहारे एक लौकी की बेल चढ़ी हुई थी। वह बेल उस बरस लगाई गई थी और वह अब दीवार के ऊपर तक पहुँच चुकी थी। उसका एक कोंपल टीन के किनारे से ऊपर निकला हुआ था।
कोंपल हवा में हिलता है और लौकी की बेल तेज़ बढ़ती है। बढ़ते हुए वह कोंपल टीन को छूता था और हट जाता था, और फिर छूता था। यही थाप थी। चारों रात यही थी। चाचा ने नीचे आकर यह बताया और मिन्नी ने पहले भरोसा नहीं किया।
उसने पूछा कि बेल से इतनी आवाज़ कैसे आती है। चाचा ने कहा कि टीन के नीचे ख़ाली जगह है, और ख़ाली जगह आवाज़ बड़ी कर देती है। यह बात सही है और इसे परखने का तरीक़ा भी उन्होंने बताया।
उन्होंने मिन्नी से कहा कि वह उसी कोने के नीचे खड़ी होकर टीन को उँगली से ठोके। मिन्नी ने ठोका और आवाज़ वैसी ही आई, वही थाप। इस बात का एक हिस्सा और है, जो मिन्नी को सबसे अच्छा लगा।
लौकी की बेल रात में बढ़ती है, दिन में नहीं। यह चाचा ने बताया और उन्होंने कहा कि इसीलिए आवाज़ रात में आती थी। और इसीलिए दिन में छत पर जाकर कुछ नहीं मिला था, क्योंकि दिन में कोंपल हिलता ही नहीं था।
मिन्नी ने पूछा कि वह रात में क्यों बढ़ती है। चाचा ने कहा कि दिन में धूप में पानी सूखता है और रात में बचा रहता है। अब यह तय करना था कि क्या किया जाए। बेल काटी नहीं जा सकती थी, क्योंकि उस पर तीन लौकियाँ लगी थीं।
टीन बदला नहीं जा सकता था। इसलिए एक तीसरा रास्ता निकाला गया, और वह मिन्नी की माँ का था। उन्होंने कपड़े की एक पट्टी ली, जो पुरानी साड़ी की थी और जिसका रंग हरा था। उस पट्टी से बेल के उस कोंपल को हल्के से बाँधकर एक तरफ़ कर दिया गया, दीवार की तरफ़, टीन से हटाकर।
बाँधने में यह ध्यान रखा गया कि गाँठ कसी न हो, क्योंकि बेल बढ़ती है और कसी गाँठ उसे काट देती है। उस रात कमरे में आवाज़ नहीं आई। एक बार भी नहीं। मिन्नी लेटी और उसने ध्यान से सुना, क्योंकि अब उसे सुनने की आदत पड़ चुकी थी।
टीन ठंडा हो रहा था और ठंडा होते टीन की अपनी एक आवाज़ होती है, जो चटकने जैसी है और बहुत हल्की है। वह आवाज़ आती रही। आँगन से भी आवाज़ें आती रहीं, जो पत्तों की थीं। थाप नहीं आई। रात भर नहीं आई।
मिन्नी ने माँ से पूछा कि बेल कब तक बढ़ेगी। माँ ने कहा कि जब तक लौकियाँ हैं। मिन्नी ने पूछा कि उसके बाद। माँ ने कहा कि उसके बाद वह सूख जाएगी और उतार दी जाएगी। मिन्नी ने कहा कि तो पट्टी भी उतर जाएगी।
माँ ने कहा कि हाँ, उतर जाएगी। यह सुनकर मिन्नी को अच्छा नहीं लगा और उसने यह कहा नहीं। वह करवट लेकर लेट गई और उसने कंबल का कोना हाथ में ले लिया। उस बरस लौकी की सात लौकियाँ आईं और बेल कार्तिक में सूख गई।
बेल उतारते वक़्त वह हरी पट्टी भी उतरी और वह अब भी घर में है।
वह आँगन की कील पर टँगी रहती है, उसी कोने में, और अगले बरस उसी से नई बेल बाँधी गई। वह पट्टी अब पहले से हल्के रंग की हो गई है, धूप से, और उसका एक सिरा फट गया है, और मिन्नी की माँ हर बरस उसे उसी कील पर लौटाकर टाँग देती हैं।