नया घर पटरी से चौंतीस क़दम दूर है। सिर्फ़ चौंतीस। यह दूरी लल्ली के बाप ने नापी थी, मकान लेने से पहले। उन्हें यह मालूम था कि पटरी पास है और उन्होंने यह देखकर ही लिया, क्योंकि इसी वजह से वह मकान सस्ता था।
दिन में उस पटरी पर चार गाड़ियाँ निकलती हैं। रात में एक निकलती है, और वह मालगाड़ी है, और वह ग्यारह बजकर दस मिनट पर निकलती है। पहली रात लल्ली उससे जाग गई। आधी रात नहीं, ग्यारह बजे। वह नौ की है और वह पुराने घर में गहरी नींद सोती थी, जहाँ पटरी नहीं थी।
जागने पर वह डरी नहीं। ज़रा भी नहीं। उसने बस पूछा कि यह क्या था। माँ ने बता दिया कि यह मालगाड़ी है और यह रोज़ इसी वक़्त निकलेगी। लल्ली ने पूछा कि रोज़। माँ ने कहा कि हाँ, रोज़।
दूसरी रात वह फिर जागी। तीसरी रात भी। तीसरी रात उसने पूछा कि यह कब तक निकलेगी। माँ ने कहा कि हमेशा। जब तक यह घर है। चौथी रात लल्ली ने एक चीज़ की, जो उसने अपने आप सोची। वह ग्यारह बजे से पहले जागी और उसने इंतज़ार किया।
गाड़ी आई और वह जागी हुई थी, इसलिए वह जागी नहीं, क्योंकि जागने के लिए सोना पड़ता है। यह उसे अच्छा लगा और उसने सुबह यह बता दिया। माँ ने कहा कि यह ठीक तरीक़ा नहीं है, क्योंकि इसमें नींद देर से आती है।
यह सही था और लल्ली ने इसे पाँचवीं रात मान लिया, क्योंकि उस दिन उसे स्कूल में नींद आई थी। पाँचवीं से नौवीं रात तक वह हर रात उसी वक़्त जागी। जागने का तरीक़ा हर रात थोड़ा बदलता गया और यह उसकी माँ ने देखा।
पहली तीन रात वह उठकर बैठ जाती थी। चौथी और पाँचवीं रात वह लेटे-लेटे आँख खोलती थी। छठी रात उसने आँख खोली और करवट बदलकर सो गई। सातवीं रात उसकी माँ ने देखा कि उसकी आँख खुली ही नहीं, बस उसका हाथ हिला।
आठवीं रात हाथ भी नहीं हिला। कुछ नहीं हिला। नौवीं रात उसने कुछ नहीं किया, और उसकी माँ उस वक़्त जागी हुई थीं, इसलिए यह उन्होंने ठीक से देखा। यानी नौ रात में वह उस आवाज़ की आदी हो गई।
आदत पड़ने का कोई तय दिन नहीं होता और नौ इस घर का हिसाब है। इन नौ रातों में एक और चीज़ बदली और वह लल्ली के बाप ने पकड़ी। पहली तीन रात गाड़ी की आवाज़ उन्हें भी सुनाई देती थी।
चौथी रात से उन्हें नहीं सुनाई दी और वे बाद तक यही समझते रहे कि गाड़ी नहीं आई। यह उन्होंने पाँचवें दिन कहा और लल्ली ने बता दिया कि गाड़ी आई थी। इस पर उन्होंने अपनी कलाई की घड़ी देखी और कुछ नहीं कहा।
उनकी आदत उससे भी जल्दी पड़ गई थी, चार रात में। लल्ली को इसमें एक बात अच्छी लगी, कि वह अपने बाप से पीछे नहीं थी। दसवीं रात जो हुआ, वह किसी ने नहीं सोचा था।
उस रात गाड़ी नहीं आई। बिलकुल नहीं आई। वजह अगले दिन मालूम हुई। उस रात आगे कहीं पटरी की मरम्मत चल रही थी और मालगाड़ी दूसरे रास्ते से भेजी गई। ग्यारह बजकर दस मिनट पर पटरी ख़ाली रही। और उसी वक़्त लल्ली जाग गई। ठीक उसी वक़्त।
वह उठकर बैठ गई, जैसे पहली तीन रातों में बैठती थी। उसकी माँ उस वक़्त भी जागी हुई थीं और उन्होंने पूछा कि क्या हुआ। लल्ली ने कहा कि आज गाड़ी नहीं आई। माँ ने भी वही देखा था। आज वह नहीं आई।
लल्ली ने पूछा कि क्यों। माँ ने कहा कि मालूम नहीं। सुबह पता चलेगा। फिर लल्ली ने एक बात कही, जो उसने सोचकर नहीं कही थी। उसने कहा कि उसे इसी से नींद खुल गई। माँ ने कहा कि आवाज़ से नहीं।
लल्ली ने कहा कि नहीं, आवाज़ न आने से। यह उन्हें अजीब लगा और उन्होंने इस पर बहस नहीं की। उन्होंने कहा कि लेट जा, वह कल आ जाएगी। लल्ली लेट गई और उसे उस रात नींद देर से आई।
बाहर से रात की बाक़ी आवाज़ें आ रही थीं, जो झींगुर की और दूर के कुत्तों की थीं। पटरी की तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई। रात भर नहीं। पटरी के पत्थर रात में ठंडे होते हैं और ठंडे होते पत्थरों की कोई आवाज़ नहीं होती।
अगली रात गाड़ी अपने वक़्त पर आई। लल्ली उस रात जागी नहीं और उसकी माँ ने यह जाँचा भी नहीं, क्योंकि वे सो चुकी थीं। उन्हें यह अगली सुबह मालूम हुआ, पूछने पर, और लल्ली ने कहा कि उसे कुछ याद नहीं।
उस घर में अब वह गाड़ी बातचीत में नहीं आती। वह रोज़ निकलती है और कोई उसका ज़िक्र नहीं करता।
एक चीज़ बदली है और उसे लल्ली की माँ ने किया है। वे रात में सोने से पहले घड़ी नहीं देखतीं, जो उनकी पुरानी आदत थी। इसकी वजह वे बताती हैं और वह सादी है, कि अब वक़्त पीछे से अपने आप बताया जाता है, और उसमें ग़लती नहीं होती।