गोपी के बाप की बस रात साढ़े नौ बजे आती है। वे उसी बस के चालक हैं और वह बस उनके गाँव से होकर निकलती है। गाँव में बस अड्डा नहीं है, बस एक मोड़ है, और वहाँ बस रुकती है।

मोड़ से उनका घर डेढ़ सौ क़दम है। इतना ही। गोपी सात का है और वह साढ़े नौ से पहले नहीं सोता। यह उसकी माँ की परेशानी है, क्योंकि उसे सुबह स्कूल जाना होता है।

उस रात बस देर थी। बहुत देर। देर की वजह अगली सुबह मालूम हुई। रास्ते में एक जगह सड़क खुदी हुई थी और वहाँ एक तरफ़ से गाड़ियाँ निकाली जा रही थीं। दस बजे तक बस नहीं आई। मोड़ ख़ाली था।

गोपी चारपाई पर बैठा था और वह हर थोड़ी देर में दरवाज़े की तरफ़ देखता था। माँ ने पहले वही कहा जो हर माँ कहती है। उन्होंने कहा कि सो जा, वे आ जाएँगे। गोपी ने कहा कि नहीं। साफ़ मना।

उन्होंने दोबारा कहा और गोपी ने दोबारा मना कर दिया। फिर उन्होंने कुछ और कहा, और उस रात की बात वहीं से बदली। उन्होंने कहा कि ठीक है, मत सो, पर एक काम कर। गोपी ने पूछा कि क्या। माँ ने कहा कि लेटकर सुन, और मुझे बता कि बस कब आ रही है।

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गोपी ने कहा कि आवाज़ से कैसे पता चलेगा। माँ ने बताया कि हर गाड़ी का हॉर्न अलग होता है और तेरे बाप की बस का हॉर्न तू पहचानता है। यह सही था, और गोपी को यह मालूम था। उस बस का हॉर्न भारी है और वह दो बार बजता है, मोड़ से पहले, हमेशा।

गोपी लेट गया। चुपचाप। यह पहली बार था जब वह उस रात लेटा। अब उसे कुछ करना था और करने के लिए लेटना ज़रूरी था, क्योंकि बैठे रहने पर दूर की आवाज़ कम सुनाई देती है। यह भी माँ ने बताया और यह भी सही है।

सवा दस पर एक गाड़ी आई। गोपी ने कहा कि यह नहीं है। माँ ने पूछा कि कैसे। उसने कहा कि यह पतली आवाज़ वाली है, यह जीप है। और वह जीप ही थी। वह आगे निकल गई। साढ़े दस पर एक और आई।

गोपी ने कहा कि यह ट्रक है। उसने कहा कि ट्रक का हॉर्न लंबा होता है और एक ही बार बजता है। यह भी ठीक था। दोनों बार वह सही निकला। पौने ग्यारह पर तीसरी आवाज़ आई और वह दूर थी।

गोपी ने इस बार कुछ नहीं कहा। माँ ने पूछा कि यह क्या है। उसने कहा कि पता नहीं, बहुत दूर है। माँ ने इतना ही कहा कि सुनते रहो, वह आएगी। इस बीच माँ वहीं बैठी रहीं और उन्होंने अपना काम किया, जो उस वक़्त दाल बीनने का था, और उसकी आवाज़ भी कमरे में आ रही थी।

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दाल बीनने की आवाज़ बराबर होती है, यानी उसमें कोई फेर-बदल नहीं होता। गोपी उसे भी सुन रहा था। ग्यारह बजे उसने पूछा कि अभी नहीं आई। माँ ने कहा कि नहीं, अभी नहीं। उसने पूछा कि आएगी न। माँ ने कहा कि हाँ, वह आएगी, आज देर है।

उसने पूछा कि कितनी देर। उन्होंने कहा कि मालूम नहीं, बस सुनते रहो। उसके बाद उसने कुछ नहीं पूछा। बाहर से आवाज़ें आती रहीं और वे ज़्यादा नहीं थीं, क्योंकि ग्यारह बजे के बाद उस सड़क पर गाड़ियाँ कम होती हैं।

दो बार कुत्ते बोले, एक बार बहुत दूर से एक गाड़ी निकली, और एक बार कहीं दरवाज़ा बंद हुआ। गोपी हर आवाज़ पर एक पल के लिए ठहरता था और फिर छोड़ देता था। इस बीच एक बात हुई, जो पहले नहीं हुई थी।

गोपी ने अपनी माँ से पूछा कि वे कैसे पहचानती हैं। माँ ने कहा कि वे नहीं पहचानतीं। उन्होंने कहा कि हॉर्न वे भी सुनती हैं, पर उससे पहले उन्हें कुछ और सुनाई देता है। गोपी ने पूछा कि क्या।

माँ ने कहा कि बस मोड़ से पहले धीमी होती है और उसका इंजन नीचे बैठ जाता है, और वह आवाज़ हॉर्न से पहले आती है। गोपी ने उस रात उसे सुनने की कोशिश की और उसे वह नहीं मिली।

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बस सवा ग्यारह बजे आई। उसका हॉर्न मोड़ से पहले दो बार बजा, जैसा हमेशा बजता है, भारी आवाज़ में। उस वक़्त गोपी सो चुका था। वह कब सोया, यह माँ को भी ठीक-ठीक नहीं मालूम, क्योंकि वे दाल बीन रही थीं और बीच में उन्होंने देखा नहीं।

हॉर्न सुनकर उन्होंने उसकी तरफ़ देखा और वह करवट लेकर सो रहा था। उन्होंने उसे जगाया नहीं। गोपी के बाप आए और उन्होंने पहले यही पूछा कि वह जागा हुआ है या नहीं। माँ ने कहा कि सो गया। कब, यह उन्हें भी नहीं मालूम।

उन्होंने पूछा कि कैसे। माँ ने कहा कि उसे सुनने का काम दे दिया था। इस पर उन्होंने कुछ नहीं कहा और वे हाथ धोने चले गए। अब यह हर रात होता है और इसका नाम घर में नहीं रखा गया है।

गोपी लेटकर सुनता है और बताता है कि कौन सी गाड़ी है, और वह ज़्यादातर सही बताता है। उसकी माँ कहती हैं कि वह हॉर्न से पहले सो जाता है, लगभग हर रोज़।

एक चीज़ उसे अब भी आती है और वह सोते-सोते आती है। उसका हाथ चारपाई के किनारे से नीचे लटका रहता है, हथेली खुली हुई, उस तरफ़ जहाँ से दरवाज़ा है। उसके बाप जब अंदर आते हैं तो उस हथेली पर एक बार हाथ रख देते हैं, और गोपी जागता नहीं, और यह उन्होंने किसी को बताया नहीं है।