दोनों को अलग-अलग चीज़ चाहिए थी और दोनों की ज़रूरत ठीक थी। चुन्नी को अँधेरा चाहिए था। पूरा अँधेरा। उसकी माँ को रोशनी चाहिए थी। तेज़ रोशनी। घर में दो कमरे हैं और उनके बीच एक दरवाज़ा है। एक कमरे में सोते हैं और दूसरे में रसोई है।
दरवाज़ा पुराना है और उसके नीचे लगभग दो उँगली की जगह है, जो ज़मीन और लकड़ी के बीच बची हुई है। यह जगह हर पुराने दरवाज़े में होती है। हर एक में। रसोई में बल्ब जलता है और उसकी रोशनी उस जगह से नीचे होकर सोने वाले कमरे में आती है।
वह एक पट्टी बनाती है, फ़र्श पर, दरवाज़े की चौड़ाई भर की। चुन्नी की चारपाई उसी तरफ़ है। दरवाज़े के सामने। उसे वह पट्टी दिखती है और वह उसे देखती रहती है, और देखते-देखते नींद नहीं आती। यह उसने कई दिन बाद बताया। नौ दिन बाद।
बताने में देर इसलिए हुई कि उसे यह मालूम था कि माँ को वह रोशनी क्यों चाहिए। माँ सिलाई करती हैं और रात में करती हैं, क्योंकि दिन में घर का काम रहता है। उनका काम दस बजे से शुरू होकर बारह-साढ़े बारह तक चलता है।
यह पूरे घर को मालूम है। चुन्नी को भी। इसलिए चुन्नी ने पहले अपने हिसाब से हल निकालने की कोशिश की। उसने पहले करवट बदली, दीवार की तरफ़ मुँह करके। इससे पट्टी दिखती नहीं थी, पर रोशनी छत पर भी पड़ती है और वह हल्की-सी दिखती रही।
फिर उसने अपने ऊपर चादर खींच ली, सिर तक। इससे गरमी लगने लगी, क्योंकि जेठ का महीना था। तीसरी बार उसने चारपाई खिसकाने की कोशिश की और वह नहीं खिसकी, क्योंकि उसका एक पाया ज़मीन में धँसा हुआ था।
उस रात उसने कोई हल नहीं निकाला और वह देर तक जागती रही। अगले दिन उसने बता दिया। पूरा बता दिया। उसने पूरी बात बताई, यह भी कि उसने तीन चीज़ें आज़माईं। माँ ने पहला सुझाव यह दिया कि वे दूसरे कमरे का दरवाज़ा बंद करके काम कर लेंगी।
यह हो नहीं सकता था, क्योंकि रसोई में हवा नहीं आती और दरवाज़ा बंद करने पर वहाँ बैठा नहीं जा सकता। दूसरा सुझाव चुन्नी का था, कि माँ बल्ब की जगह लालटेन ले लें। यह भी नहीं चला, क्योंकि लालटेन की रोशनी में सुई का धागा नहीं दिखता।
तीसरा सुझाव चुन्नी के भाई का था, जो पाँच का है। उसने कहा कि दरवाज़े के नीचे कपड़ा रख दो। यह सुनकर दोनों चुप हो गईं। दोनों। यह इतना सादा था कि दोनों को यह पहले नहीं सूझा। उसी शाम कपड़ा ढूँढ़ा गया।
पहला कपड़ा एक तौलिया था और वह मोटा था, इसलिए वह उस जगह में ठीक से नहीं बैठा और दरवाज़ा बंद करने में अटक गया। दूसरा एक पुरानी चादर थी और वह पतली थी, इसलिए रोशनी उसके ऊपर से निकल आई।
तीसरा वह निकला जो सही था। पुराना दुपट्टा। वह एक पुराना दुपट्टा है, जिसका रंग गहरा नीला है और जो अब पहना नहीं जाता। उसे तीन बार तह किया गया और उस जगह में दबा दिया गया, दरवाज़ा बंद करके, नीचे से।
उस रात चुन्नी लेटी और उसने फ़र्श की तरफ़ देखा। पट्टी नहीं थी। एक लकीर भी नहीं। पूरा अँधेरा नहीं था, क्योंकि खिड़की खुली थी और बाहर से हल्की रोशनी आती है, जो चाँद की या सड़क की होती है।
पर दरवाज़े वाली पट्टी नहीं थी। दूसरी तरफ़ रसोई में बल्ब जलता रहा और माँ का काम चलता रहा। सिलाई मशीन की आवाज़ आती रही, जो रुक-रुककर आती है, क्योंकि सीने में बीच-बीच में कपड़ा घुमाना पड़ता है। चुन्नी उसी आवाज़ को सुनती रही।
वह आवाज़ उसे बुरी नहीं लगती थी और यह उसने पहले भी कहा था। उसे रोशनी बुरी लगती थी। सिर्फ़ रोशनी। मशीन की आवाज़ में एक चीज़ है जो हर रात एक जैसी होती है। वह चलती है, रुकती है, और फिर चलती है, और रुकने का वक़्त लगभग बराबर होता है।
उस रात चुन्नी ने उसे गिनने की कोशिश की और वह चौथी बार तक पहुँची। उसके बाद उसे याद नहीं कि क्या हुआ। माँ ने बारह बजे काम बंद किया और बल्ब बुझाया। फिर उन्होंने दरवाज़ा खोला और वह दुपट्टा उठा लिया, क्योंकि रात में हवा के लिए दरवाज़ा खुला रहता है।
अंदर आकर उन्होंने देखा कि चुन्नी सो रही है। अब यह रोज़ होता है और इसमें दो हिस्से हैं। दस बजे दुपट्टा नीचे दबाया जाता है और बारह बजे उठा लिया जाता है। दबाने का काम चुन्नी करती है, क्योंकि वह उस तरफ़ सोती है।
उठाने का काम माँ करती हैं। बारह बजे। उस दुपट्टे की तह अब अपने आप बन जाती है, यानी वह तीन तह में ही रहता है, क्योंकि रोज़ उसी तरह मोड़ा जाता है। उसका निचला किनारा फ़र्श से रगड़कर मैला हो गया है और वह हिस्सा धोने पर भी साफ़ नहीं होता।
चुन्नी के भाई को यह अब तक नहीं मालूम है कि वह तरीक़ा उसका था। किसी ने उसे बताया नहीं और वह उस रात के बाद इस बात में शामिल भी नहीं रहा। माँ ने एक बार कहा था कि उसे बता देना चाहिए, और चुन्नी ने कहा था कि बाद में बताएँगे, और वह बाद अभी नहीं आया।