सुइयाँ चार हैं। वे एक कपड़े में लिपटी रहती हैं। कपड़ा लाल है और उसमें चार जगह छेद हैं, हर सुई की अपनी जगह। यह इंतज़ाम दादी का है और वे इसे बरसों से उसी तरह रखती हैं। गिनना ज़रूरी है, क्योंकि उस कमरे में तीन बच्चे नीचे सोते हैं, चटाई पर।

उस रात गिनती में तीन निकलीं। एक कम। दादी ने दो बार गिना। दोनों बार तीन ही निकलीं। चौथी सुई सबसे छोटी है और वह ज़्यादा इस्तेमाल होती है, इसलिए उसका सिरा पतला है। वह किसी तरह कपड़े से निकल गई थी।

अब उसे मिलना ज़रूरी था। उसी रात। यह ज़रूरत बहस की नहीं थी और घर में किसी ने इस पर सवाल नहीं किया। पहले जो हुआ, वह ग़लत था, और दादी ने उसे रोका। पिंकी और उसका भाई फ़र्श पर हाथ फेरने लगे।

दादी ने दोनों के हाथ पकड़कर हटा दिए। फ़ौरन। उन्होंने कहा कि सुई हाथ से नहीं ढूँढ़ी जाती। इसकी वजह साफ़ है और उन्होंने बताई भी। हाथ फेरने में सुई मिलती नहीं। चुभ जाती है। और चुभने के बाद वह कहाँ है, यह और मुश्किल हो जाता है।

दूसरा तरीक़ा पिंकी की माँ का था और वह ठीक था, पर काम नहीं आया। उन्होंने झाड़ू लगाने को कहा। एक बार। झाड़ू से सुई एक जगह इकट्ठा हो सकती है, कूड़े के साथ, और फिर कूड़े में से निकाली जा सकती है।

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दिक़्क़त यह थी कि उस कमरे का फ़र्श कच्चा है, यानी मिट्टी का, और उस पर झाड़ू लगाने से धूल उठती है। धूल में सुई और नीचे बैठ जाती है। और गहरी। यह दादी ने बताया और माँ ने मान लिया।

तीसरा तरीक़ा दादी का था और उसमें कोई हाथ या झाड़ू नहीं था। उन्होंने कहा कि लालटेन नीचे रखो। फ़र्श पर। लालटेन उस कमरे में ताक़ पर रखी जाती है, ऊँचाई पर, ताकि पूरे कमरे में रोशनी हो। उसे उठाकर फ़र्श पर रख दिया गया, दीवार के पास, और उसकी बत्ती थोड़ी तेज़ कर दी गई।

इससे जो हुआ, वह पिंकी को अच्छा लगा। फ़र्श पर की हर छोटी चीज़ की एक लंबी छाया बन गई। मिट्टी के ऊपर के छोटे कंकड़, एक धागा, एक तिनका, और चटाई के किनारे का उठा हुआ हिस्सा। सबकी छाया एक ही तरफ़ को गई और वे सब दिखने लगीं।

ऊपर से रोशनी में ये चीज़ें दिखती नहीं, क्योंकि छाया नहीं बनती। यह सादा है और यह उस रात काम आया। अब ढूँढ़ना शुरू हुआ और वह चुपचाप हुआ। दादी घुटनों पर बैठीं और उन्होंने कमरे को चार हिस्सों में बाँट लिया।

पहला हिस्सा दरवाज़े की तरफ़ का था और उसमें कुछ नहीं मिला। दूसरे में एक बटन मिला, जो पुराना था। तीसरे में कुछ नहीं मिला। चौथा हिस्सा वह था जहाँ दादी बैठकर सिलाई करती हैं और वहीं वह मिली। वह चटाई के किनारे के नीचे थी, आधी दबी हुई, और उसका पतला सिरा बाहर था।

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उसकी छाया एक पतली लकीर की तरह बनी और वह लकीर बाक़ी तिनकों से ज़्यादा सीधी थी। पिंकी ने उसे पहले देखा। सबसे पहले। उसने हाथ नहीं लगाया, क्योंकि उसे मना किया गया था। उसने बस उस तरफ़ उँगली उठाई।

दादी ने उसे उठाया, दो उँगलियों से, सिरे से नहीं। फिर उन्होंने उसे लाल कपड़े के चौथे छेद में लगा दिया। उसके बाद उन्होंने गिना। एक, दो, तीन, चार। चार पर वे रुकीं। और कपड़ा लपेट दिया। कपड़ा ताक़ पर रखा गया और लालटेन भी वापस ताक़ पर गई, और उसकी बत्ती धीमी कर दी गई।

उठाने के बाद दादी ने एक काम और किया, जो उन्होंने बिना कहे किया। उन्होंने वही लालटेन नीचे रखकर पूरा कमरा दोबारा देखा, एक बार और। पिंकी ने पूछा कि सुई तो मिल गई। दादी ने कहा कि हाँ, पर गिनती चार की थी और आज एक गिरी थी।

उन्होंने कहा कि जो एक बार गिर सकती है, वह दो बार भी गिर सकती है। दूसरी बार देखने में उन्हें कुछ नहीं मिला और उन्हें यह पहले से मालूम था। फिर भी उन्होंने देखा, और यह उस रात का आख़िरी काम था।

इसके बाद तीनों बच्चे चटाई पर लेटे। पिंकी ने एक सवाल पूछा और वह उस वक़्त उसे ज़रूरी लगा। उसने पूछा कि अगर वह न मिलती तो क्या होता। दादी ने कहा कि तो आज तुम तीनों ऊपर चारपाई पर सोते।

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पिंकी ने पूछा कि और कल। दादी ने कहा कि कल दिन की रोशनी में मिल जाती। यह उन्होंने बिना किसी घबराहट के कहा और आगे कुछ नहीं जोड़ा। पिंकी ने उसके बाद कुछ नहीं पूछा। कमरे में लालटेन की धीमी रोशनी थी और उसमें छाया अब नहीं बन रही थी, क्योंकि वह ऊपर से आ रही थी।

बाहर आँगन से कुछ आवाज़ें आ रही थीं, जो बर्तन रखने की थीं, और वे भी थोड़ी देर में बंद हो गईं। उस घर में अब सिलाई का काम फ़र्श पर नहीं होता। दादी उसके लिए एक चौकी पर बैठती हैं, जो नीची है, और सुइयों का कपड़ा उसी चौकी पर खुलता है।

चौकी लकड़ी की है और उस पर एक जगह सुई का निशान बन गया है, एक छोटा छेद, जो देखने पर दिख जाता है। दादी उसी छेद के पास कपड़ा खोलती हैं और गिनती हर बार ऊँची आवाज़ में करती हैं, एक-दो-तीन-चार, खोलते वक़्त भी और लपेटते वक़्त भी।