नाव घाट पर बँधी थी और उसमें तीन लोग सो रहे थे। बाबा, छोटकी, और छोटकी का भाई। यह उनका घर नहीं है, और उनका घर किनारे पर है। उनका घर किनारे पर है, दो सौ क़दम ऊपर, और गरमी में वे नाव में सोते हैं, क्योंकि पानी के ऊपर हवा चलती रहती है।

यह हर साल जेठ और आसाढ़ में होता है। रस्सी खूँटे से बँधी थी। खूँटा लकड़ी का है और वह घाट की सीढ़ी के पास गड़ा है, और वह बरसों से वहीं है। रस्सी की गाँठ बाबा लगाते हैं और वह एक ही तरह की गाँठ लगाते हैं।

उस रात छोटकी को नींद नहीं आई। देर तक नहीं आई। उसकी वजह वह थी जो उसने लेटे-लेटे देखी। नाव हिलती है। यह सामान्य है। पर उस रात उसे लगा कि नाव पहले से थोड़ा आगे है। उसने खूँटे को देखा और रस्सी को देखा, और रस्सी में एक ढीलापन दिखा, जो बीच में झूल की तरह नीचे लटक रहा था।

उसने भाई को जगाने की कोशिश की और वह नहीं जागा। फिर उसने बाबा को हिलाया। कंधे से। बाबा जाग गए, पूरी तरह नहीं, आधे। उन्होंने पूछा कि क्या है। छोटकी ने कहा कि रस्सी ढीली हो गई है। बाबा उठे और बैठ गए और उन्होंने रस्सी की तरफ़ देखा।

फिर उन्होंने वह किया जो छोटकी को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कहा कि यह ऐसी ही रहती है। छोटकी ने कहा कि पहले ऐसी नहीं थी। बाबा ने कहा कि पानी बढ़ा है, इसलिए नाव ऊपर आ गई है, और रस्सी की लंबाई वही है, तो वह ढीली दिखती है।

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यह बात सही थी और छोटकी को समझ भी आई। फिर भी नींद नहीं आई। ज़रा भी नहीं। समझ आने और नींद आने में फ़र्क़ होता है और बाबा को यह मालूम है। इसलिए उन्होंने आगे बहस नहीं की। वे नाव के सिरे तक गए, जो चार क़दम है, और उन्होंने रस्सी खींची।

खींचकर उन्होंने एक दूसरी गाँठ लगाई, पहली के ऊपर, उसी खूँटे पर। दो गाँठों की ज़रूरत नहीं थी और उन्होंने यह कहा भी नहीं कि ज़रूरत नहीं है। फिर उन्होंने रस्सी का बचा हुआ सिरा नाव के अंदर खींचा। उस सिरे की लंबाई लगभग दो हाथ थी।

उन्होंने वह सिरा छोटकी के हाथ में दे दिया। उन्होंने कहा कि इसे पकड़े रहो, और अगर यह खिंचे तो मुझे जगा देना। छोटकी ने उसे पकड़ लिया। कसकर। रस्सी मोटी थी और उसके रेशे हथेली में चुभते थे, थोड़े-थोड़े।

वह लेट गई और सिरा उसकी मुट्ठी में रहा। बाबा वापस अपनी जगह गए और लेट गए और थोड़ी देर में उनकी साँस भारी हो गई। नदी की आवाज़ नाव की तली से आती है और वह पानी के थपकने की आवाज़ है।

वह आवाज़ बराबर नहीं होती। दो थपक के बीच का अंतर कभी छोटा होता है और कभी बड़ा। छोटकी उसी को सुनती रही। पहले उसने रस्सी को दो बार खींचकर देखा, यह जाँचने के लिए कि तनी हुई है। दोनों बार वह तनी हुई मिली, बराबर तनी हुई।

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तीसरी बार उसने खींचा नहीं, क्योंकि ज़रूरत नहीं पड़ी। उसने बस मुट्ठी को थोड़ा कस लिया और वह उसे काफ़ी लगा। इस बीच उसने एक चीज़ याद की, जो उसे पिछली गरमी की थी। पिछले बरस भी वह एक रात इसी तरह जागी थी और उस बार वजह रस्सी नहीं थी।

उस बार नाव में पानी आ गया था, थोड़ा-सा, तली के एक जोड़ से। बाबा ने उस रात वह जोड़ नहीं भरा था, क्योंकि रात में वह नहीं भरा जाता। उन्होंने एक कटोरी से पानी उलीचा और कटोरी वहीं छोड़ दी थी, तली पर, उलटी।

और छोटकी से कहा था कि अगर पानी कटोरी के किनारे तक आ जाए तो उसे जगा देना। पानी वहाँ तक नहीं आया और सुबह वह जोड़ भर दिया गया। छोटकी को उस रात की एक ही चीज़ याद है, कि कटोरी उलटी रखी थी और वह हिलती नहीं थी।

ऊपर आसमान में तारे थे और उनमें से एक दूसरे से ज़्यादा चमकीला था, जो हर रात होता है। किनारे पर कहीं मेंढक बोल रहे थे और उनकी आवाज़ लगातार नहीं थी, रुक-रुककर थी। थपक की आवाज़ आती रही। बराबर नहीं, पर आती रही।

छोटकी की मुट्ठी धीरे-धीरे ढीली हुई और रस्सी का सिरा उसकी हथेली पर पड़ा रहा, पकड़ा हुआ नहीं, बस रखा हुआ। सुबह वह सिरा वहीं था, उसकी खुली हथेली पर। बाबा ने उठकर पहले वही देखा और उसे वहीं छोड़ दिया, हटाया नहीं।

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उसके बाद हर रात वह सिरा अंदर खींचा जाता है। यह बाबा करते हैं और वे इसके बारे में कुछ नहीं कहते। दूसरी गाँठ भी हर रात लगती है और सुबह खोली जाती है, क्योंकि दिन में नाव चलती है।

उस खूँटे पर अब दो जगह रस्सी की रगड़ के निशान हैं, एक नीचे और एक उससे ऊपर, और ऊपर वाला नया है और उसकी लकड़ी अभी हल्के रंग की है। छोटकी घाट से गुज़रते हुए कभी-कभी उसे देख लेती है और उस पर हाथ नहीं लगाती।