तिन्नी की खिड़की छोटी है और उसकी देहरी चौड़ी है। उस देहरी पर हर रात एक दीया रखा जाता है। हर रात। यह घर का नियम नहीं है। यह तिन्नी की आदत है। उसे अँधेरे में एक छोटी रोशनी अच्छी लगती है और वह रोशनी बल्ब की नहीं चाहिए।

दीया मिट्टी का है और उसका एक किनारा थोड़ा टूटा है। उसमें बाती दादी बनाती हैं, रुई से, अपनी हथेली पर बेलकर। उस रात हवा चल रही थी। हवा पीपल की तरफ़ से आती है और खिड़की उसी तरफ़ खुलती है।

पहली बार दीया नौ बजे बुझा। हवा से। तिन्नी उठी और उसने दादी को बुलाया। दादी आईं, माचिस लाईं, और दीया जला दिया। फिर वे वहीं बैठ गईं, चारपाई के किनारे। दूसरी बार वह पंद्रह मिनट बाद बुझा। फिर हवा से।

इस बार दादी ने कुछ किया। सोचकर किया। उन्होंने दीये को देहरी के अंदर वाले कोने में खिसका दिया, जहाँ दीवार का सहारा था। बाहर हवा चल रही थी और पीपल के पत्तों की आवाज़ आ रही थी, वह आवाज़ जो पानी जैसी लगती है।

तीसरी बार वह और जल्दी बुझा। दस मिनट में। तिन्नी ने पूछा कि अब क्या। दादी ने कहा कि अब कुछ और आज़माएँगे। उन्होंने एक पीतल की कटोरी लाकर दीये के आगे रख दी, आड़ की तरह। कटोरी ठंडी थी और तिन्नी ने उसे छूकर देखा।

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दीया जला और थोड़ी देर सीधा जला, और फिर उसकी लौ कटोरी के पीछे से इस तरह मुड़ी कि बुझ गई। इस बीच तिन्नी ने एक चीज़ आज़माई, अपनी तरफ़ से। उसने अपनी हथेली दीये के आगे लगा दी, आड़ की तरह।

इससे लौ सीधी हो गई और जलती रही। पर हथेली गरम होने लगी और उसे हटाना पड़ा। हटाते ही वह बुझ गई। दादी ने इस पर कुछ नहीं कहा, बस दोबारा जला दिया। चौथी बार दादी ने कहा कि खिड़की बंद कर दें।

तिन्नी ने मना कर दिया। साफ़ मना। खिड़की बंद करने से हवा बंद हो जाती और उस रात हवा ठंडी थी, और ठंडी हवा में नींद जल्दी आती है। यह बात तिन्नी ने कही और दादी ने मान ली। उन्होंने कहा कि तो हवा भी चाहिए और दीया भी चाहिए।

तिन्नी ने कहा कि हाँ। दोनों। इसके बाद दादी कुछ देर चुप रहीं। बाहर पीपल की आवाज़ आती रही, वह आवाज़ जो पानी जैसी लगती है। फिर वे उठीं और अंदर गईं और लौटकर आईं। उनके हाथ में एक चीज़ थी और वह तिन्नी ने पहले नहीं देखी थी।

वह मिट्टी का एक छोटा घड़ा था, टूटा हुआ, जिसका ऊपर का आधा हिस्सा नहीं था। वह रसोई में पड़ा रहता है और उसमें कुछ नहीं रखा जाता। दादी ने उसे उलटा किया और उसके पेट में जो जगह थी, उसमें दीया रख दिया।

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अब दीया तीन तरफ़ से घिरा था और ऊपर से खुला था। हवा उसके ऊपर से निकल जाती थी और लौ तक नहीं पहुँचती थी। दीया जला। और जलता रहा। तिन्नी लेटी और उसने उसे देखा। पहले एक मिनट, फिर दो, फिर उसने गिनना छोड़ दिया।

लौ हिलती थी और बुझती नहीं थी।

उस हिलने में एक तरह की चाल थी, जो थोड़ी देर बाद देखी जा सकती थी, कि वह बाईं तरफ़ झुकती है और सीधी हो जाती है, और फिर झुकती है। बाहर पीपल की आवाज़ आ रही थी। दादी ने पूछा कि अब ठीक है।

तिन्नी ने कहा कि हाँ। फिर उसने एक और बात पूछी, जो उस वक़्त उसे ज़रूरी लगी। उसने पूछा कि यह घड़ा कब से टूटा है। दादी ने कहा कि बहुत पहले से। तिन्नी ने पूछा कि तो उसे फेंका क्यों नहीं।

दादी ने कहा कि टूटी चीज़ का कोई काम निकल आता है, बस देर लग जाती है। यह उन्होंने आम बात की तरह कहा और आगे कुछ नहीं जोड़ा। तिन्नी ने उसके बाद कुछ नहीं पूछा। उसने कंबल ठीक किया और करवट बदली, इस तरह कि दीया दिखता रहे।

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बाहर हवा चलती रही और पीपल की आवाज़ आती रही। दादी थोड़ी देर और बैठीं और उन्होंने बाती को सलाई से ज़रा नीचे किया, जिससे लौ छोटी हो गई। छोटी लौ ज़्यादा देर चलती है और यह उन्हें मालूम है।

कमरे की दीवार पर उस लौ की रोशनी एक गोल घेरे की तरह पड़ती थी, और घड़े के टूटे किनारे की वजह से उस घेरे का एक हिस्सा कटा हुआ था। वह कटा हुआ हिस्सा हिलता नहीं था। वहीं का वहीं था।

तिन्नी उसी को देखती रही। आँखें भारी हो रही थीं। दादी ने माचिस देहरी पर ही रख दी, हाथ के पास, और यह उन्होंने आदत से किया।

उस रात माचिस की ज़रूरत नहीं पड़ी। दीया सुबह तक जला और तेल ख़त्म होने पर अपने आप बुझा, जो चार बजे के आसपास होता है। अगली रात वह घड़ा फिर देहरी पर रखा गया, और उसके बाद हर रात।

अब वह वहीं रहता है और दिन में भी नहीं हटाया जाता। उसके अंदर की मिट्टी काली पड़ गई है और बाहर की तरफ़ नीचे एक जगह तेल का धब्बा बन गया है, जो गोल है और जो छूटता नहीं। तिन्नी ने उस घड़े का नाम नहीं रखा और घर में उसे घड़ा ही कहा जाता है, और दादी उसे उलटा घड़ा कहती हैं, क्योंकि वह उलटा ही रखा रहता है।