छत पर शाम को टीपू और उसकी बुआ बैठती हैं। बैठने की वजह गरमी है, क्योंकि नीचे का कमरा दिन भर तपता है और छत सात बजे तक ठंडी हो जाती है। छत से सामने का नीम दिखता है और नीम की तीसरी डाल आँख की सीधाई में पड़ती है।

उस डाल पर हर शाम एक चिड़िया आती है। हर शाम। वह एक ही चिड़िया है, यह टीपू का दावा है, और उसका आधार यह है कि उसके गले के नीचे एक सफ़ेद धब्बा है।

उस शाम वह आई और डाल पर बैठी और तुरंत उड़ गई। टीपू ने गिनना शुरू किया। एक। दूसरी बार वह बैठी और उड़ गई। तीसरी बार भी वही हुआ। चौथी बार वह बैठी और थोड़ी देर रुकी, दो-तीन सेकंड, और फिर उड़ गई।

टीपू ने बुआ से कहा कि यह बैठ नहीं रही। बुआ ने कहा कि देखते रहो। और गिनते रहो। पाँचवीं बार वही हुआ। छठी और सातवीं बार भी। सातवीं के बाद वह उड़कर पीपल की तरफ़ चली गई, जो दूर है, और वहाँ बैठ गई।

पीपल पर वह पहले कभी नहीं बैठी थी, यह भी टीपू का दावा है। अब सवाल यह था कि डाल में क्या हो गया। टीपू ने पहला अंदाज़ा लगाया, कि डाल टूट गई है। बुआ ने उधर देखा और कहा कि टूटी हुई नहीं लगती।

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दूसरा अंदाज़ा भी टीपू का था, कि वहाँ चींटियाँ लग गई हैं। यह मुमकिन था और इसे दूर से देखा नहीं जा सकता था। तीसरा अंदाज़ा बुआ का था, कि किसी बिल्ली ने वहाँ चढ़ना सीख लिया है। इस पर टीपू ने कहा कि बिल्ली उस डाल तक नहीं चढ़ सकती, क्योंकि नीचे का तना चिकना है।

यह बात ठीक थी।

इसके बाद दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे और नीचे गली से आवाज़ें आती रहीं, जो बर्तन धोने की और किसी के पानी भरने की थीं। आसमान का रंग बदल रहा था और नीम अब पहले से गहरा दिख रहा था।

फिर बुआ ने कहा कि ऊपर देखो। टीपू ने ऊपर देखा। डाल के ऊपर, लगभग एक हाथ की ऊँचाई पर, एक तार गुज़र रहा था। वह तार वहाँ पहले नहीं था। एक दिन पहले तक नहीं था। वह उस दिन दोपहर में खींचा गया था, क्योंकि गली के आख़िरी घर में नया कनेक्शन लगा था।

तार काला है और शाम की रोशनी में वह नीम की टहनियों में घुल जाता है, इसलिए वह पहली नज़र में दिखा नहीं। अब बात समझ में आ गई। पूरी। चिड़िया बैठती थी और उसके सिर के ऊपर एक हाथ पर कुछ था, जो पहले नहीं था।

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वह उड़कर हट जाती थी। हर बार। टीपू ने पूछा कि तो अब वह वहाँ कभी नहीं बैठेगी। बुआ ने कहा कि मालूम नहीं। किसी को नहीं मालूम। टीपू को यह जवाब अच्छा नहीं लगा और उसने दोबारा पूछा। बुआ ने बताया कि तार हटाया नहीं जा सकता, इसलिए दो में से एक होगा, या वह इसकी आदत डाल लेगी, या दूसरी जगह ढूँढ़ लेगी।

टीपू ने आगे पूछा कि कितने दिन में। बुआ ने कहा कि यह भी मालूम नहीं। इस बीच बुआ ने एक बात बताई, जो टीपू ने पहले नहीं सुनी थी। उन्होंने कहा कि चिड़िया को डाल से मतलब नहीं है, उसे ऊपर की जगह से मतलब है।

बैठने वाली चिड़िया अपने सिर के ऊपर की जगह देखती है, क्योंकि ख़तरा ऊपर से आता है। नीचे से आने वाली चीज़ें उसे दिख जाती हैं और वह उड़ जाती है। ऊपर की चीज़ पर वह भरोसा नहीं कर सकती, इसलिए वह वहाँ बैठती ही नहीं।

टीपू ने पूछा कि यह बुआ को कैसे मालूम है। बुआ ने बताया कि उनके नाना मुर्ग़ियाँ पालते थे और वे यही कहते थे। उस रात टीपू ने सोने से पहले यही सोचा और अगली शाम वह छत पर बुआ से पहले पहुँच गया।

उस शाम चिड़िया आई और पाँच बार बैठकर उड़ी और छठी बार पीपल पर गई। तीसरी शाम चार बार बैठी। चौथी शाम तीन बार। पाँचवीं शाम उसने कुछ और किया, जो टीपू ने नहीं सोचा था। वह तीसरी डाल पर बैठी ही नहीं।

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वह उसी नीम की दूसरी डाल पर बैठी, जो थोड़ी नीचे है और जिसके ऊपर तार नहीं है। और वहाँ बैठकर वह उड़ी नहीं। एक बार भी नहीं। टीपू ने उसे देखा और गिनने की ज़रूरत नहीं पड़ी। वह वहीं बैठी रही और उसने अपना सिर पंख के नीचे किया, जो चिड़ियाँ सोने से पहले करती हैं।

उस वक़्त छत ठंडी हो चुकी थी और नीचे की गली शांत थी। टीपू ने बुआ से कहा कि उसने दूसरी जगह ढूँढ़ ली। बुआ ने कहा कि हाँ। ढूँढ़ ली। टीपू ने पूछा कि वह तीसरी डाल पर दोबारा जाएगी।

बुआ ने कहा कि हो सकता है, जब तार पुराना हो जाएगा। टीपू ने यह पूछा कि तार पुराना होने से क्या होता है। बुआ ने कहा कि कुछ नहीं होता, बस वह नया नहीं रहता। यह जवाब टीपू को उस वक़्त पूरा लगा और उसने आगे नहीं पूछा।

अब उस नीम की दूसरी डाल पर हर शाम वह चिड़िया बैठती है और गली के दो-तीन बच्चों को यह मालूम है।

तीसरी डाल ख़ाली रहती है और उस पर धूल जमी रहती है, जो पत्तों पर दिखती है, क्योंकि पंख लगने से पत्ते साफ़ रहते हैं। तार अब भी वहीं है और उस पर एक जगह जोड़ है, जो नीचे से दिखता है, और टीपू छत पर बैठकर कभी-कभी उसे देखता है।