उस कंबल का नाम भूरा है। यही नाम है। नाम गुड्डो ने रखा था, तीन बरस पहले, जब वह चार की थी। कंबल भूरा है और इससे ज़्यादा सोचने की उसे ज़रूरत नहीं पड़ी। घर में सब उसे उसी नाम से बुलाते हैं।
भूरा कहाँ है, भूरा ले आओ, भूरा धूप में डाल दो। उस दिन भूरा धुल गया। पूरा धुल गया। धुलने की वजह थी और वह ठीक थी। उस पर दो हफ़्ते पहले दाल गिर गई थी और वह धब्बा जा नहीं रहा था।
माँ ने उसे सुबह धोया, धूप में डाला, और शाम चार बजे तक वह सूख गया। पाँच बजे उसे तह करके गुड्डो के बिस्तर पर रख दिया गया। आठ बजे गुड्डो सोने गई। रोज़ की तरह। उसने भूरा ओढ़ा और थोड़ी देर लेटी रही।
फिर वह उठकर बैठ गई। सीधी। उसने कहा कि यह भूरा नहीं है। माँ ने कहा कि यही है। और यही था। गुड्डो ने कहा कि नहीं है। माँ आईं और उन्होंने कंबल देखा, कोना उठाकर। वह वही था। उसी जगह वही धागा निकला हुआ था और नीचे वाले किनारे पर वही सिलाई थी जो पिछली सर्दी में की गई थी।
माँ ने यह दोनों चीज़ें उसे दिखाईं। गुड्डो ने दोनों देखीं और कहा कि हाँ, यही है, पर यह भूरा नहीं है। यह बात उलझी हुई लगती है और उलझी हुई नहीं है। वह यह कह रही थी कि गंध बदल गई है।
धुलने के बाद कंबल से साबुन की गंध आती है और धूप की गंध आती है। और उसमें से जो गंध पहले आती थी, वह नहीं आती। वह गंध किस चीज़ की थी, यह किसी ने कभी नहीं सोचा था।
उस रात सोचना पड़ा। माँ ने पहला उपाय यह किया कि उसे अपनी चादर दे दी, जो पुरानी है। गुड्डो ने ओढ़ी। और उतार दी। उसने कहा कि यह माँ की गंध है। यह सही था और इसका कोई जवाब नहीं था।
दूसरा उपाय दादी का था। वह चला। उन्होंने कहा कि भूरा को कुछ देर रसोई में रख आओ। रसोई में अँगीठी जल रही थी, क्योंकि रात का दूध गरम हो रहा था। कंबल वहाँ ले जाकर तह करके रख दिया गया, अँगीठी से दो हाथ दूर, ताकि गरम हो और जले नहीं।
गुड्डो वहीं बैठी रही और उसने उसे देखा। दस मिनट बाद उसने पूछा कि अब। दादी ने कहा कि अभी नहीं। थोड़ा और। बीस मिनट बाद उसने फिर पूछा कि अब। दादी ने कहा कि अभी नहीं। आधे घंटे बाद उसने तीसरी बार पूछा और इस बार दादी ने कंबल उठाया और उसका कोना गुड्डो की नाक के पास किया।
गुड्डो ने सूँघा और कुछ नहीं कहा। फिर उसने दोबारा सूँघा। फिर उसने कहा कि थोड़ा-सा आ रही है। थोड़ा-सा काफ़ी था। उसी रात के लिए काफ़ी।
क्योंकि वह गंध धुएँ की थी और उस रसोई की थी, और भूरा हर सर्दी में उसी रसोई में तह किया रखा रहता था, दिन में, जब वह इस्तेमाल में नहीं होता। यानी वह गंध कंबल की नहीं थी, उस जगह की थी।
यह बात दादी ने बताई और उन्होंने इसे बड़ी बात की तरह नहीं बताया। उन्होंने बस कहा कि यह अँगीठी की गंध है। गुड्डो ने पूछा कि तो कल यह चली जाएगी। दादी ने कहा कि नहीं, अब हर रोज़ यहीं रखेंगे।
बीच में एक चीज़ और आज़माई गई थी और वह गुड्डो के भाई का सुझाव था। उसने कहा कि कंबल पर थोड़ा घी लगा दो, तो गंध आ जाएगी। यह सुझाव अच्छा नहीं था और उस पर हँसी हुई। फिर भी उसे पूरा सुना गया, क्योंकि उस घर में सुझाव बीच में नहीं काटे जाते।
उसने आगे कहा कि उसे धुएँ वाली गंध चाहिए तो अँगीठी के पास रखो। यह दूसरा हिस्सा ठीक था और दादी ने उसे उठा लिया। यानी वह तरीक़ा असल में उसका था और उसने इसका दावा कभी नहीं किया।
उस रात कंबल थोड़ा गरम था और वह गरमाहट लेटने पर पीठ पर लगी। गुड्डो ने करवट ली और कंबल का कोना अपनी नाक के पास कर लिया, जो उसकी आदत है। रसोई में अँगीठी अब भी जल रही थी और उसकी लकड़ी चिटकने की आवाज़ आ रही थी, थोड़ी-थोड़ी देर में।
गुड्डो ने कुछ देर बाद अपने आप कहा, बिना किसी के पूछे। उसने कहा कि इसे मत धोना। दादी ने कहा कि धोना पड़ेगा, पर जब धोएँगे तब यहीं रख देंगे, तीन दिन। गुड्डो ने कहा कि चार दिन रखना।
दादी ने कहा कि ठीक है, चार दिन। इस पर बात ख़त्म हो गई और उसके बाद उस कमरे में कोई नहीं बोला। अगली सर्दी में भूरा दो बार धुला और दोनों बार वह चार दिन रसोई में रखा गया, अँगीठी से दो हाथ दूर, तह किया हुआ।
अब वह पहले से पतला हो गया है और उसका एक कोना और खुल गया है, जिसे सिलना है।
रसोई में उसकी जगह पक्की है और वह जगह ताक़ पर है, दाईं तरफ़, जहाँ पहले डिब्बे रखे जाते थे। वे डिब्बे नीचे उतार दिए गए और गुड्डो ने वह उतरवाया नहीं, दादी ने अपने आप कर दिया, और इस पर घर में किसी ने कुछ नहीं पूछा।