बाड़े में रोज़ रात आठ जानवर अंदर होते हैं। पूरे आठ। गिनती किशना करता है और वह ऊँची आवाज़ में गिनता है, दरवाज़े पर खड़ा होकर। एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ। आठ पर वह दरवाज़ा बंद करता है और साँकल चढ़ाता है।

उस रात वह सात पर रुक गया। आठवाँ नहीं आया। आठवाँ बछड़ा था, जो चार महीने का है और जिसका नाम नहीं रखा गया है, क्योंकि उस घर में बछड़ों का नाम नहीं रखा जाता। वह दरवाज़े से छह क़दम दूर खड़ा था।

किशना ने उसे बुलाया। वह खड़ा रहा। हिला भी नहीं। किशना ने दोबारा बुलाया और इस बार हाथ से इशारा किया, जैसे बड़े लोग करते हैं। बछड़े ने कान हिलाए और वहीं खड़ा रहा। किशना नौ का है और उसका काम गिनती करना है, हाँकना नहीं।

इसलिए उसने अपने बाबा को बुलाया। बाबा आए। उन्होंने पहले वही किया जो किशना ने किया था। उन्होंने उसे बुलाया। बछड़ा वहीं खड़ा रहा। बाबा उसके पीछे गए और उन्होंने उसे हल्के से धकेला, पीछे से, दोनों हाथों से। बछड़ा दो क़दम आगे बढ़ा और फिर रुक गया, दरवाज़े से चार क़दम पर।

बाहर ठंडी हवा थी और बाड़े के अंदर से भूसे की गंध आ रही थी। बाबा ने कहा कि कोई बात होगी। किशना ने पूछा कि क्या बात है। बाबा ने कहा कि मालूम नहीं, पर कोई बात होगी।

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इसके बाद उन्होंने वह किया जो उस रात का सबसे लंबा हिस्सा था। वे बछड़े के पास ज़मीन पर बैठ गए, उकड़ूँ, और चुप हो गए। किशना भी बैठ गया, क्योंकि बाबा बैठे थे। दोनों कुछ देर वहीं बैठे रहे।

इस बीच बाड़े के अंदर से आवाज़ें आती रहीं, जो जानवरों के हिलने की और साँस की थीं। और एक आवाज़ बाहर से आती थी, जो दूर कहीं कुत्ते की थी। थोड़ी देर बाद किशना की माँ आईं, क्योंकि दोनों देर से लौटे नहीं थे।

उन्होंने पूछा कि क्या हुआ। बाबा ने कहा कि यह अंदर नहीं आ रहा। माँ ने अंदर झाँका और उन्होंने एक चीज़ देखी, जो दोनों ने नहीं देखी थी। उन्होंने कहा कि गाय की रस्सी आज दूसरी खूँटी पर बँधी है।

यह सही था। बिलकुल सही।

उस दिन दोपहर में बाड़े का एक कोना लीपा गया था और उस कोने की खूँटी गीली थी, इसलिए गाय को दूसरी खूँटी पर बाँधा गया, जो दरवाज़े के दूसरी तरफ़ है। बछड़ा हर रात अंदर आकर सीधे अपनी माँ के पास जाता है और वह जगह उसे मालूम है।

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उस रात वह जगह ख़ाली थी और उसके अंदर से यह दिख रहा था। यानी वह अंदर नहीं आ रहा था, इसलिए नहीं कि उसे डर लग रहा था, बल्कि इसलिए कि वहाँ जो चाहिए था, वह वहाँ नहीं दिख रहा था।

माँ अंदर गईं और उन्होंने गाय की रस्सी खोली और उसे पुरानी खूँटी पर बाँध दिया, जो अब सूख चुकी थी। उसके बाद किसी ने बछड़े को नहीं बुलाया। वह अपने आप चला। धीरे-धीरे। छह क़दम, फिर दरवाज़ा, फिर अंदर, और सीधे अपनी माँ के पास।

किशना ने वहीं खड़े होकर गिनती पूरी की। उसने आठ कहा। ऊँची आवाज़ में। फिर उसने दरवाज़ा बंद किया और साँकल चढ़ाई। अंदर से आवाज़ आई, जो बछड़े के दूध पीने की थी, और वह आवाज़ थोड़ी देर आती रही और फिर बंद हो गई।

इसके बाद माँ ने एक और बात बताई, जो किशना को अच्छी लगी। उन्होंने कहा कि यह उन्हें इसलिए दिखा कि वे दोपहर में वहाँ लीपने आई थीं। यानी जिसने खूँटी बदली थी, उसे ही याद आया। बाबा ने इस पर सिर हिलाया और कहा कि ठीक है।

फिर उन्होंने कहा कि अगली बार लीपते वक़्त खूँटी के आसपास की जगह छोड़ दी जाए। बाहर आकर किशना ने एक सवाल पूछा। उसने पूछा कि बाबा वहाँ बैठ क्यों गए थे। बाबा ने कहा कि जानवर को धकेलने से वह पीछे हटता है, और बैठ जाने से वह सोचता है कि कोई ख़तरा नहीं है।

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किशना ने पूछा कि तो वह अंदर आ जाता। बाबा ने कहा कि नहीं, वजह दूसरी थी, और वजह तेरी माँ ने पकड़ी। उन्होंने यह बात बिना किसी अफ़सोस के कही।

उस रात किशना अपने बिस्तर पर लेटा और उसने वह गिनती दोबारा मन में की। एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात, आठ। आठ पर वह रुका। और वहीं रुका रहा।

बाहर वही कुत्ता कहीं दूर बोल रहा था और उसकी आवाज़ में देर होती जा रही थी, यानी दो आवाज़ों के बीच का अंतर बढ़ रहा था। किशना उस अंतर को गिनने लगा और तीसरी बार तक पहुँचकर उसे यह याद नहीं रहा कि वह कहाँ था।

उस बाड़े में अब गाय की रस्सी उसी खूँटी पर बाँधी जाती है और उसे बदला नहीं जाता।

लीपने के दिन भी नहीं बदली जाती। उस दिन खूँटी के चारों तरफ़ की जगह छोड़ दी जाती है और वह गोल जगह बिना लिपी रह जाती है, और वह हर बार दिखती है, क्योंकि उसके चारों तरफ़ का फ़र्श ताज़ा लिपा होता है और वह गोला पुराना।