सरला की माँ अट्ठानबे में गईं। टीबी से। उस वक़्त सरला सत्रह की थी और ग्यारहवीं में थी और उसकी शादी तय हो चुकी थी। गाँवों में यह उलटा नहीं लगता। पढ़ाई चलती रहती है और रिश्ता भी तय हो जाता है और दोनों साथ-साथ चलते हैं।
रामसेवक उन्नीस का था। उसे उसकी माँ ने आख़िरी हफ़्ते में बुलवाया था। वह गया और वह कमरे में बीस मिनट रहा और उन बीस मिनटों में जो बात हुई, उसे उसने पैंतीस बरस याद रखा। उन्होंने कहा कि इसका बीए पूरा करा देना।
उसने हाँ कह दिया। उस उम्र में और उस कमरे में कोई और जवाब नहीं होता। शादी उसके सात महीने बाद हुई। अब वह बात जो इस पूरे क़िस्से को मोड़ देती है और जो रामसेवक को बहुत बाद में मालूम हुई।
सरला पढ़ना नहीं चाहती थी।
यह आलस नहीं था और यह पढ़ाई से डर भी नहीं था। वह ठीक-ठाक पढ़ती थी और उसके नंबर बुरे नहीं आते थे।
उसे दुकान चाहिए थी।
उसके नाना की खाद-बीज की दुकान थी और उसमें उसका मन लगता था। दाम, बोरी, उधार, किसान की बात, और वह हिसाब जो दुकान में सिर पर चलता है और काग़ज़ पर नहीं। उसने चौदह की उम्र से वहाँ बैठना शुरू कर दिया था।
उसकी माँ को यह पसंद नहीं था।
इसमें उनका अपना कारण था। वे ख़ुद आठवीं तक पढ़ी थीं और उन्हें उम्र भर यह चुभा था और उन्होंने अपनी बेटी के लिए वही चाहा जो उन्हें नहीं मिला। यह ग़लत नहीं है। बहुत माएँ यही करती हैं।
पर जो चीज़ माँ चाहती है और जो बेटी चाहती है, वे हमेशा एक नहीं होतीं, और मरते वक़्त इसे तय करने का हक़ किसी को नहीं होता, और फिर भी हो जाता है। शादी के बाद रामसेवक ने वह वादा निभाना शुरू किया।
पहले बरस उसने फ़ॉर्म भरवाया। सरला ने भर दिया और परीक्षा नहीं दी। दूसरे बरस उसने ख़ुद फ़ॉर्म भरा और फ़ीस भरी और उसे लेकर परीक्षा केंद्र तक गया। वह गई और दो पर्चे देकर छोड़ दिया। तीसरे बरस उसने निजी कॉलेज में दाख़िला करवाया, जहाँ हाज़िरी नहीं देखी जाती।
चौथे बरस उसने घर पर एक मास्टर लगवाया, जो हफ़्ते में दो दिन आता था। उन बरसों में इस पर घर में बहुत बार बात हुई और कई बार बुरी तरह हुई। सरला कहती थी कि मुझे नहीं करना। रामसेवक कहता था कि तुम्हारी माँ ने कहा था।
और यही वह जगह थी जहाँ बात हर बार रुक जाती थी, क्योंकि उस वाक्य का जवाब किसी के पास नहीं होता। इस बीच सरला ने वह किया जो वह करना चाहती थी। नाना के बाद वह दुकान उसके मामा के पास गई और मामा शहर चले गए, और उन्होंने वह सरला को चलाने को दे दी।
उसने उसे नौ बरस में दोगुना कर दिया। उस क़स्बे में खाद की दुकान औरत के हाथ में पहली बार दिखी थी और शुरू के दो बरस उसे उसकी भी क़ीमत चुकानी पड़ी। रामसेवक ने इसमें उसे कभी नहीं रोका।
वह ख़ुद बिजली विभाग में था और शाम को दुकान पर बैठ जाता था और बोरी उतरवाता था। आठवें बरस एक रात सरला ने वह बात कह दी जो उसने आठ बरस नहीं कही थी।
उस दिन फिर फ़ॉर्म की बात चली थी। उसने कहा कि माँ ने मुझसे भी कहा था। रामसेवक चुप हो गया। उसने कहा कि उन्होंने मुझसे उससे पहले कहा था, तुम्हें बुलाने से चार दिन पहले, और मैंने मना कर दिया था।
उसने यह भी बताया कि उसने क्या कहा था। उसने कहा था कि मुझे दुकान चलानी है। और उसकी माँ ने उसके बाद उससे कुछ नहीं पूछा, और चार दिन बाद उन्होंने रामसेवक को बुलवा लिया। यह सुनकर रामसेवक कुछ देर बैठा रहा।
उसे यह समझ आया कि वह आठ बरस से एक ऐसी चीज़ पूरी कर रहा था जिसे उस लड़की ने ख़ुद, उसी कमरे में, चार दिन पहले लौटा दिया था। और यह भी कि उसकी सास ने यह जानते हुए उसे बुलाया था।
उसने अगले दिन से यह बात छोड़ दी। उसने न कोई नाराज़गी दिखाई और न कहा कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया, क्योंकि उसे मालूम था कि वह क्यों नहीं बताया गया होगा। फ़ॉर्म उसके बाद कभी नहीं भरा गया।
इसके बाईस बरस बाद जो हुआ, उसकी किसी ने योजना नहीं बनाई। उनकी लड़की उजाला ने बीए में दाख़िला लिया। वह घर पर पढ़ती थी, शाम को, उसी मेज़ पर जिस पर खाना लगता है। सरला उन दिनों दुकान से जल्दी आने लगी थी, क्योंकि अब वहाँ एक लड़का रख लिया गया था।
वह उसके साथ बैठने लगी। पहले वह बस बैठती थी। फिर वह उसकी किताब पलटने लगी। फिर उसने उससे एक सवाल पूछ लिया। उस बरस अगस्त में उसने ख़ुद फ़ॉर्म भरा। इकतालीस की उम्र में। उसने यह किसी से नहीं कहा कि क्यों भर रही है और रामसेवक ने भी नहीं पूछा।
यह उसने अपनी माँ के लिए नहीं किया। यह उसने उसके लिए भी नहीं किया। उसने वह इसलिए किया कि उसे उस मेज़ पर बैठना अच्छा लगने लगा था और उस मेज़ पर बैठने का एक बहाना चाहिए था। अब वे दोनों साथ पढ़ती हैं। माँ और बेटी।
उजाला उसकी हिंदी सुधारती है और वह भी बिना लिहाज़ के सुधारती है, जैसे बीस बरस की लड़की सुधारती है, और सरला बिना कुछ कहे मान लेती है और दोबारा लिखती है। रामसेवक उस वक़्त उठकर बरामदे में चला जाता है और वहीं बैठा रहता है, और वह अंदर नहीं आता जब तक वे दोनों उठ नहीं जातीं।