ममता का चयन छब्बीस की उम्र में हुआ। शादी को चार बरस हो चुके थे और एक बच्चा था। उस भर्ती में उस ज़िले से इक्कीस लड़कियाँ गई थीं और उनमें से चार निकलीं। इसमें उसके अपने दो बरस लगे थे। दौड़, कूद, लिखित, और वह सब जो बीच में आता है।
मुकेश की दुकान क़स्बे के उसी मोड़ पर थी जहाँ उसके बाप की हुआ करती थी। नाई की दुकान पूरी की पूरी ग्राहकों पर चलती है और ग्राहक बरसों में बनते हैं। आदमी जिस दुकान पर बीस बरस से बाल कटवाता है, वह दूसरी दुकान पर नहीं जाता, चाहे वह सस्ती हो।
इसका उलटा भी उतना ही सच है। नए क़स्बे में जाकर दुकान खोलो तो छह महीने तक कोई नहीं आता, क्योंकि सबकी अपनी दुकान पहले से है। ट्रेनिंग नौ महीने की थी। गोरखपुर में। उन नौ महीनों में बच्चा मुकेश के पास रहा और दुकान चलती रही।
फिर पहली तैनाती आई। दो सौ किलोमीटर दूर। मुकेश ने दुकान बंद कर दी। उसने यह एक हफ़्ते में तय किया और ममता से बहस नहीं की, और यह बात यहाँ लिखनी ज़रूरी है क्योंकि आगे इसी की क़ीमत का हिसाब है।
पहली नई दुकान खड़ी होने में अठारह महीने लगे। उस क़स्बे में तीन नाई पहले से थे और उनका आपस में इलाक़ा बँटा था। पहले चार महीने में उसकी दिन की कमाई सत्तर रुपये थी। इन बातों का ज़िक्र उसने घर पर नहीं किया, पर ममता को दिखता था, क्योंकि पैसा एक ही जगह से आता है और घटता दिखता है।
चौथे बरस दूसरा तबादला हुआ।
यह उसकी अपनी वजह से नहीं था। महिला सिपाहियों की तैनाती वहाँ से हटी और पूरे थाने का ढाँचा बदल गया। दूसरी दुकान। इस बार उसे मालूम था कि क्या होगा और वह मालूम होना कोई मदद नहीं करता। इस बार एक और बात हुई।
वहाँ जिस चौक पर उसने जगह देखी, वहाँ के दुकानदारों ने मकान मालिक से बात कर ली और किराया अचानक ड्योढ़ा हो गया। यह सीधे किसी ने नहीं कहा और मकान मालिक ने बहाना बाज़ार का बताया। मुकेश ने वह जगह छोड़ दी और चौक से हटकर, बस स्टैंड वाली सड़क पर दुकान ली, जहाँ किराया कम था और आना-जाना आधा।
उसकी दूसरी दुकान इसी वजह से चौदह महीने में खड़ी हुई और अठारह में नहीं।
बीच में एक बरस ऐसा गया जब बच्चे की फ़ीस ममता की तनख़्वाह से गई और मुकेश ने इसका ज़िक्र कभी नहीं किया, और यह भी अपनी जगह एक बात है। आठवें बरस तीसरा तबादला आने वाला था। इस बार दो जगहें सामने थीं।
एक अच्छी थी। ज़िला मुख्यालय, थाना बड़ा, और वहाँ से आगे बढ़ने का रास्ता खुलता है, क्योंकि जो काम मुख्यालय में दिखता है वही ऊपर तक जाता है। दूसरी वह थी जहाँ से वे दोनों आए थे। वही पुराना क़स्बा।
वहाँ थाना छोटा है और वहाँ जाकर आदमी वहीं का होकर रह जाता है। ममता ने दूसरी माँगी। और उसने यह चुपचाप नहीं किया। उसने घर पर बताया, अर्ज़ी देने से पहले। मुकेश ने मना किया। उसने साफ़ कहा कि यह ग़लत है और तुम्हारी तरक़्क़ी रुक जाएगी और मेरी दुकान तीसरी बार भी खड़ी हो जाएगी।
दोनों में इस पर तीन दिन बहस हुई और वह अच्छी बहस नहीं थी। चौथे दिन ममता ने अर्ज़ी दे दी। उसने उसमें वही जगह लिखी। उस बरस मुख्यालय वाली जगह पर जो गई, वह दो बरस बाद हवलदार हो गई। ममता आज भी सिपाही है।
यह हिसाब उन दोनों के सामने है और इसे कोई छिपाता नहीं। तीसरी दुकान उसी मोड़ पर खुली। इस बार तीन महीने लगे।
जो लोग उसके बाप के वक़्त से आते थे, उनमें से बहुत अभी थे और उन्हें कुछ बताना नहीं पड़ा। पहले ही हफ़्ते में सत्रह पुराने आदमी आ गए और उनमें से चार ने पूछा कि इतने बरस कहाँ थे।
बोर्ड उसने तीनों बार पेंटर से लिखवाया। और तीनों बार उसने एक ही नाम लिखवाया।
वह नाम उसका अपना नहीं है। वह उसके बाप की दुकान का नाम है, जो इसी मोड़ पर थी और जो उसके बाप के जाने के बाद दो बरस बंद रही थी।
पहले दो क़स्बों में वह नाम किसी के लिए कुछ नहीं था। वहाँ लोग उसे पढ़कर आगे बढ़ जाते थे और किसी ने कभी नहीं पूछा कि इसका मतलब क्या है। पेंटर हर बार पूछता था कि क्या लिखूँ। और वह हर बार वही बोलता था।
अब वह बोर्ड ग्यारह बरस में तीसरा है और पहली बार वह उस जगह टँगा है जिस जगह का वह नाम है। ममता की ड्यूटी उसी थाने में है जो उस मोड़ से आठ मिनट पर है और वह लौटते वक़्त दुकान के आगे से निकलती है, और अगर कुर्सी ख़ाली हो तो कुछ देर बैठ भी जाती है, और मुकेश उसके सामने वाले शीशे को कभी साफ़ नहीं करता क्योंकि उस पर पानी के दाग़ हैं और उन दाग़ों में से एक पर उसने अपने बच्चे का नाम उँगली से लिखा था, उस दिन, जब दुकान खुली थी।