फूलमती अट्ठहत्तर की है और जयप्रकाश इक्यासी का। आरा में उनका अपना घर है और उसमें वे दोनों ही रहते हैं। उसकी याददाश्त तीन बरस पहले जाने लगी थी। यह उस तरह नहीं गई जैसा लोग समझते हैं।
उसे बहुत कुछ याद है। चूल्हे का काम याद है। गीत याद हैं, पूरे के पूरे। पड़ोस की एक औरत का नाम याद है जो चालीस बरस पहले मर गई। जो नहीं रहा, वह यह है कि वह इस वक़्त कहाँ है।
पिछले सवा बरस से वह उन दिनों में है जब उनकी शादी तय हो चुकी थी और हुई नहीं थी। उसके हिसाब से वह अपने बाप के घर में है और जयप्रकाश वह आदमी है जिससे उसकी शादी होनी है।
इसलिए वह रोज़ पूछती है कि तारीख़ कब की है। यह सवाल दिन में एक बार आता है और कभी-कभी चार बार। पहले-पहल जयप्रकाश ने सच बताने की कोशिश की थी। उसने कहा था कि शादी हो चुकी है, अट्ठावन बरस हो गए, बच्चे हैं, पोते हैं।
उससे जो हुआ वह बहुत बुरा हुआ।
वह घबरा गई और रोने लगी और घर से निकलने लगी, क्योंकि उसके हिसाब से वह एक अनजान आदमी के घर में थी और यह जो कह रहा था वह डराने वाली बात थी।
उस रात के बाद उसने सच बताना बंद कर दिया। फिर उसने असली तारीख़ बतानी शुरू की। शादी वाली। उससे भी दिक़्क़त हुई। वह तारीख़ जेठ की थी और जब भी वह बताता, वह कहती कि इतनी देर, अभी तो बहुत महीने हैं।
और उसके बाद वह उदास हो जाती थी और घंटों बैठी रहती थी। तीसरी कोशिश में उसे वह तारीख़ मिली जो काम कर गई। सात फ़रवरी उन्नीस सौ सड़सठ। यह उनकी शादी का दिन नहीं है। यह वह दिन है जिस दिन वह अपने चाचा के साथ उसे देखने गया था और वह पानी लेकर आई थी।
उस दिन के बाद बात पक्की हुई थी और शादी छह महीने बाद हुई थी। जब वह यह तारीख़ बताता है तो वह ख़ुश हो जाती है। पास की तारीख़ है, इसलिए इंतज़ार का बोझ नहीं पड़ता, और शायद कहीं कोई कोना है जिसे वह दिन याद है।
यह जवाब कभी बदलना नहीं चाहिए। यही उस घर का सबसे कड़ा नियम है। अगर आज कुछ और बता दिया जाए तो वह उलझ जाती है, और उलझने के बाद उसे ठीक होने में दो दिन लगते हैं। इसलिए जयप्रकाश ने एक परची अपनी जेब में रखनी शुरू कर दी।
कुर्ते की बाईं जेब में। हमेशा।
उस पर वही तारीख़ लिखी है और नीचे यह भी लिखा है कि सुबह चाची के यहाँ से आए थे, क्योंकि वह यह भी पूछती है कि कौन-कौन आया था। परची इसलिए है कि इक्यासी बरस की उम्र में आदमी को अपनी बात भी हमेशा याद नहीं रहती।
बेटा पटना से आता है, दो महीने में एक बार। वह चाहता है कि दोनों उसके पास चलें। जयप्रकाश मना करता है और उसकी वजह उसने बेटे को समझाई भी है। इस घर में फूलमती को दीवारें मालूम हैं। वह अँधेरे में भी रसोई तक चली जाती है और उसे यह नहीं सोचना पड़ता कि मुड़ना किधर है।
नए घर में उसके पास यह भी नहीं रहेगा। दिन ऐसे कटता है। सुबह वह सबसे पहले यही पूछती है। वह बता देता है। वह ख़ुश हो जाती है और कहती है कि तब तो लहठी वाले को कहना पड़ेगा।
इस पर वह हाँ कहता है। दोपहर में कभी-कभी वह फिर पूछ लेती है। वह फिर बताता है, उसी तरह, जैसे पहली बार बता रहा हो, क्योंकि उसके लिए वह पहली बार ही है। जिस दिन वह चार बार पूछती है, उस दिन उसे चार बार पूरा बताना पड़ता है और चौथी बार में जल्दबाज़ी नहीं होनी चाहिए।
पिछले भादों में एक दिन उसने नहीं पूछा। पूरा दिन नहीं पूछा। जयप्रकाश उस दिन उसके आसपास ही रहा और उसने ख़ुद नहीं छेड़ा, क्योंकि छेड़ने से क्या निकलेगा यह किसी को मालूम नहीं होता। शाम को चार बजे वह चौकी पर बैठी थी।
उसने उसका नाम लिया। पूरा नाम, जैसे वह पहले लेती थी, और वह नाम उसने बरस भर से नहीं लिया था। फिर उसने पूछा कि खाना खाया कि नहीं। जयप्रकाश ने कहा कि खा लिया। उसने कहा कि झूठ बोलते हो।
यह पूरे दिन में इतनी ही बात हुई और उसके आधे घंटे बाद वह उठकर अंदर चली गई और फिर वैसी ही हो गई। अगली सुबह उसने फिर वही पूछा कि तारीख़ कब की है। और उसने वही बताया। वह परची अब तीसरी है।
काग़ज़ जेब में रहते-रहते नरम पड़ जाता है और मोड़ वाली जगह से फट जाता है, इसलिए उसे दो बार दोबारा लिखना पड़ा है। दोनों बार उसने उसे बिलकुल वैसा ही उतारा, उसी तरतीब में, उसी लिखावट में। पहली परची के ऊपरी कोने पर स्याही का एक छोटा-सा धब्बा पड़ गया था। दूसरी में उसने वह धब्बा क़लम से बना दिया, और तीसरी में भी बनाया, क्योंकि उसे नहीं मालूम कि उस काग़ज़ का कौन-सा हिस्सा उसे कभी दिख जाए।