इम्तियाज़ ने वह स्कूटर इकतीस बरस चलाया। पंचानबे वाला मॉडल है और उसमें एक पुरानी बीमारी है, जो ऐसे स्कूटरों में आम है। ठंडे में वह सीधा खड़ा रहने पर चालू नहीं होता। उसे बाईं तरफ़ झुकाकर, टंकी का पेट्रोल एक तरफ़ करके, फिर किक मारनी पड़ती है।

यह हुनर भी अलग से सीखना पड़ता है और मंडी में इसी की वजह से आधे लोग उसे उधार नहीं ले जाते। मुरादाबाद की उस गली में उसे लोग स्कूटर से ही पहचानते थे। पीतल के काम की मंडी है वहाँ और उसका काम माल पहुँचाने का था, इसलिए स्कूटर उसके लिए सवारी नहीं, दुकान थी।

जून में वह मस्जिद वाले मोड़ पर गिरा। बारिश का पहला दिन था और सड़क पर वह चिकनाई थी जो पहली बारिश में आती है, और वह मोड़ वह इकतीस बरस से काट रहा था। कलाई टूटी। दाहिनी। प्लास्टर सात हफ़्ते रहा और उतरने के बाद डॉक्टर ने कहा कि सब ठीक है।

सब ठीक नहीं था।

हड्डी जुड़ गई थी, पर पकड़ नहीं लौटी। ब्रेक दबाने पर उँगलियाँ आधे रास्ते में एक बार रुकती थीं। इसमें आधा सेकंड जाता है और आधे सेकंड में स्कूटर छह मीटर चला जाता है। इम्तियाज़ ने यह किसी को नहीं बताया।

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गली में सबको मालूम हो गया। पड़ोस के लड़के ने अपनी माँ से कहा और माँ ने ज़ाहिदा से कह दिया, और ज़ाहिदा ने उससे कुछ नहीं पूछा। उसने अगस्त की एक सुबह चाय रखते हुए कहा कि अब मैं चलाऊँगी।

इम्तियाज़ ने पहले सुना नहीं। फिर सुना। फिर उसने वह सब कहा जो ऐसे मौक़े पर कहा जाता है। कि तुमने ज़िंदगी में साइकिल नहीं चलाई। कि अट्ठावन की उम्र है। कि गली में लोग क्या कहेंगे। कि गिरोगी तो कूल्हा टूटेगा और इस उम्र में कूल्हा नहीं जुड़ता।

आख़िरी बात सही थी और बाक़ी तीनों बेकार थीं। ज़ाहिदा ने कहा कि तुम सिखाओगे या किसी और से सीखूँ। इसके बाद बहस ख़त्म हो गई, क्योंकि दूसरी बात की गुंजाइश ही नहीं थी। पहला दिन स्कूल के मैदान में हुआ। सुबह छह बजे।

वह मैदान इसलिए चुना गया कि वहाँ कुछ भी टकराने को नहीं है। पहले दिन स्कूटर चालू नहीं हुआ, क्योंकि किक मारना अपने आप में एक हुनर है और उसमें वज़न पूरा डालना पड़ता है।

दूसरे दिन चला और सात मीटर चलकर गिरा। तीसरे दिन ज़ाहिदा ने पड़ोस की दीवार का पलस्तर उड़ा दिया। वह दीवार मैदान की नहीं थी। वह मैदान के बाहर वाली थी, और वहाँ तक स्कूटर इसलिए पहुँचा कि उसने घबराकर ब्रेक की जगह हैंडल घुमा दिया था।

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उस दिन इम्तियाज़ चिल्लाया।

उसने मैदान में खड़े होकर चिल्लाया और ज़ाहिदा नीचे उतरकर खड़ी रही और उसने कुछ नहीं कहा, और शाम को उसने पलस्तर वाले को बुलाकर दीवार ठीक करा दी, अपने पैसे से।

चौथे दिन बारिश हुई और मैदान कीचड़ हो गया। इसके बाद सीखना सड़क पर आ गया, जो असली मुश्किल थी, क्योंकि सड़क पर बाक़ी सब भी चल रहे होते हैं। सातवें दिन एक चौदह बरस का लड़का आ गया। वह पड़ोस का ही था और उसने कहा कि चाची, आप गियर बदलते वक़्त क्लच पूरा नहीं छोड़तीं, इसलिए झटका लगता है।

बात सही थी। ज़ाहिदा ने उससे कहा कि तुम बताओ फिर। और उसने उस दिन उस लड़के से सीखा और इम्तियाज़ किनारे खड़ा रहा। उसने उस लड़के से दो दिन बात नहीं की। पूरे दो दिन। उन दो दिनों में ज़ाहिदा ने उसे कुछ नहीं समझाया और तीसरे दिन उसने ख़ुद ही उस लड़के को बुलाकर चाय पिलाई, और मामला वहीं ख़त्म हो गया।

नौवें दिन जो हुआ, असल बात वही है। उस दिन ज़ाहिदा ने मैदान के दो चक्कर बिना रुके लगाए। इम्तियाज़ ने पीछे बैठने को कहा। उसने बहुत सादे तरीक़े से कहा। उसने कहा कि बैठकर देख लूँ, तभी पता चलेगा।

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जो आदमी इकतीस बरस से आगे बैठता आया हो, उसके लिए पीछे बैठना कोई छोटी बात नहीं है। वह बैठा और उन्होंने मैदान के तीन चक्कर लगाए और वह पूरे वक़्त सीट के पीछे वाली रॉड पकड़े रहा। ग्यारहवें दिन ज़ाहिदा ने शीशा अपनी ऊँचाई पर कर लिया।

यह सीखने का आख़िरी क़दम माना जाता है। जब तक आदमी शीशा अपने हिसाब से नहीं करता, तब तक वह किसी और की गाड़ी चला रहा होता है।

उसके बाद माल पहुँचाने का काम बँट गया। पास वाले चक्कर ज़ाहिदा लगाती है और मंडी के अंदर वाले इम्तियाज़, क्योंकि वहाँ भीड़ में धीरे चलना पड़ता है और उतने में उसका हाथ साथ दे देता है। गली में इस पर कुछ दिन बात हुई और फिर बंद हो गई, जैसा हर बात के साथ होता है।

स्कूटर वही है और अब उसे नौ बरस और हो गए हैं।

उसका शीशा उसी जगह पर है जहाँ ज़ाहिदा ने उसे उस ग्यारहवें दिन किया था। इम्तियाज़ जब चलाता है तो उस शीशे में उसे पीछे की सड़क नहीं दिखती, बस दीवारों का ऊपरी हिस्सा दिखता है और कभी-कभी आसमान। उसने उसे नौ बरस में कभी नहीं घुमाया। यह उसने किसी को बताया नहीं है, और शायद ज़ाहिदा को भी नहीं।