वह घड़ी उन्नीस सौ छियासी की है। चाबी वाली है, लकड़ी के ख़ोल में, और उसे हफ़्ते में एक बार चाबी देनी पड़ती है। कमलेश्वर उसे दस मिनट आगे रखता है। जमुना उसे ठीक कर देती है। यह चालीस बरस से चला आ रहा है।

इसे झगड़ा कहना ग़लत होगा और इसे मज़ाक़ कहना भी ग़लत होगा। यह उन दोनों के बीच की सबसे पुरानी चीज़ है और अब उसका कोई कारण नहीं बचा।

कारण शुरू में था।

कमलेश्वर की नौकरी उन दिनों तेरह किलोमीटर दूर थी और बस एक ही थी और वह सुबह सात दस पर निकलती थी। वह हमेशा देर से चलने वाला आदमी है। इसलिए उसने घड़ी दस मिनट आगे कर दी, ताकि उसे लगे कि देर हो रही है।

यह तरीक़ा उस बरस काम कर गया। जमुना को यह पसंद नहीं आया। उसका कहना यह था कि घड़ी वक़्त बताने के लिए होती है और अगर उसमें झूठ लिखा है तो घर में किसी को सही वक़्त कैसे मालूम होगा।

📚 यह भी पढ़ें तारीख़
तारीख़

उसकी बात में दम था और उसने इसे साबित भी किया। एक बार दूध वाला दस मिनट पहले चला गया, क्योंकि उसे घड़ी दिखा दी गई थी। एक बार बच्चे स्कूल दस मिनट पहले पहुँच गए और गेट बंद था और वे बाहर खड़े रहे।

इसलिए वह उसे पीछे कर देती है। और वह उसे फिर आगे कर देता है। इसका कोई तय क्रम नहीं है। कभी वह चाबी देते वक़्त कर देता है। कभी झाड़-पोंछ में वह उसे पीछे खींच देती है। कई बार एक ही दिन में दोनों बार हुआ है।

बच्चों को यह मालूम था। उनके यहाँ यह चलता था कि घड़ी का वक़्त देखकर कोई काम मत करो, फ़ोन देख लो।

बड़ी लड़की कहती है कि उसने बचपन में कई बार यह देखा कि माँ स्टूल पर चढ़कर घड़ी ठीक कर रही है और पिताजी बरामदे में बैठे देख रहे हैं और कुछ नहीं बोल रहे। इस पर आख़िरी बार बात कब हुई थी, यह किसी को याद नहीं।

शुरू के दो-तीन बरस तक शायद हुई हो। उसके बाद यह बिना बात के चलता रहा। चालीस बरस में उस घड़ी को दो बार ठीक कराना पड़ा। एक बार दो हज़ार चार में और एक बार दो हज़ार चौदह में।

📚 यह भी पढ़ें स्कूटर
स्कूटर

पिछले बरस वह बंद हो गई।

इस बार बात दूसरी थी। मिस्त्री ने देखकर कहा कि इसका पुर्ज़ा अब नहीं मिलता और बनवाने में जितना लगेगा उतने में नई आ जाएगी। बात सही थी। बड़ा लड़का उसी हफ़्ते नई ले आया। डिजिटल थी। दीवार पर लगती है, बैटरी से चलती है, और उसमें अंक बड़े-बड़े दिखते हैं, जो अब उन दोनों की आँखों के लिए बेहतर है।

वह लगा दी गई। उसी कील पर। पहला हफ़्ता ठीक गया। किसी ने कुछ नहीं कहा। दूसरे हफ़्ते कमलेश्वर ने उसे आगे करने की कोशिश की। उसमें बटन दबाकर वक़्त बदलना पड़ता है और उसमें दो बटन एक साथ दबाने पड़ते हैं और वह उससे नहीं हुआ।

उसने लड़के को फ़ोन करके पूछा भी नहीं, क्योंकि पूछने का मतलब यह बताना था कि वह क्यों पूछ रहा है। जमुना ने यह देख लिया था। उसने भी कुछ नहीं कहा। तीसरे हफ़्ते वह घड़ी दीवार से उतार दी गई।

यह उन दोनों ने मिलकर तय नहीं किया। एक दिन कमलेश्वर बाज़ार से लौटा तो वह उतरी हुई थी, मेज़ पर रखी थी, और जमुना ने इस पर कुछ नहीं कहा। उसने उसे वापस नहीं लगाया। उस महीने के आख़िर में वह पुरानी घड़ी लेकर शहर गया।

📚 यह भी पढ़ें आख़िरी सोमवार
आख़िरी सोमवार

वहाँ एक बूढ़ा मिस्त्री है जो अब भी चाबी वाली घड़ियाँ देखता है। उसने कहा कि पुर्ज़ा नहीं है, पर बनाया जा सकता है, और उसमें बाईस सौ लगेंगे और तीन हफ़्ते। नई घड़ी छह सौ की आई थी। कमलेश्वर ने बाईस सौ दे दिए।

बिना मोल-भाव के। तीन हफ़्ते बाद वह उसे ले आया और दीवार पर उसी कील पर लगा दिया, जिसका निशान वहाँ बना हुआ था। जमुना ने उसे लगते हुए देखा और कुछ नहीं पूछा। उसने बाईस सौ के बारे में भी नहीं पूछा, हालाँकि घर का हिसाब उसी के पास रहता है और उसे मालूम हो ही गया।

उस शाम कमलेश्वर ने चाबी दी और सुइयाँ दस मिनट आगे कर दीं। जमुना ने रात को खाना निपटाने के बाद स्टूल लगाया और उन्हें पीछे कर दिया। यह चल रहा है। अब तक। अब उनकी उम्र क्रमशः सड़सठ और चौंसठ है और कमलेश्वर को अब कहीं जाना नहीं होता, इसलिए दस मिनट आगे वाली घड़ी का कोई काम नहीं है।

और वह डिजिटल वाली घड़ी अब भी उसी डिब्बे में है जिसमें वह आई थी।

वह डिब्बा पीछे वाले कमरे में, संदूक के ऊपर रखा है। उस पर उसका दाम भी लिखा हुआ है और अंदर बैटरी अलग रखी है, ताकि लीक न हो जाए। यह ध्यान जमुना ने रखा है, क्योंकि घर की चीज़ों का ख़याल वही रखती है, और उसने वह घड़ी फेंकी नहीं है और लगाई भी नहीं है।