मंदिर छह किलोमीटर पर है और वे इकतालीस बरस से सावन के आख़िरी सोमवार को पैदल जाते रहे हैं।

पैदल जाना कोई मन्नत नहीं थी।

शुरू में साधन नहीं था, इसलिए पैदल गए। फिर साधन हो गया और तब तक पैदल जाना ही उस दिन का मतलब बन चुका था, और ऐसी चीज़ें बदली नहीं जातीं। योगेंद्र अब सत्तर का है। रामेश्वरी सड़सठ की। जून में वह आँगन में फिसल गई थी।

बारिश का पहला हफ़्ता था और आँगन का वह हिस्सा सीमेंट का है जिस पर काई जम जाती है, और यह हर बरस जमती है और हर बरस उसे खुरचा जाता है, और उस बरस खुरचने में देर हो गई।

कूल्हे की हड्डी बच गई। घुटना नहीं बचा। डॉक्टर ने कहा कि चलना बंद नहीं करना है, पर छह किलोमीटर का सवाल ही नहीं है। सावन आया और आख़िरी सोमवार पास आता गया। इस बारे में घर में बात नहीं हुई। किसी ने नहीं छेड़ा।

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रविवार की शाम रामेश्वरी ने दोनों लोटे निकालकर माँज दिए।

यह उसी का काम था, हमेशा से। पीतल के दो लोटे हैं, एक जोड़ी, और वे उसी दिन के लिए रखे रहते हैं और बाक़ी साल आले में उलटे रखे रहते हैं। उसने दोनों माँजे। एक नहीं। फिर उसने योगेंद्र से कहा कि तुम हो आओ।

उसने यह सादे तरीक़े से कहा। जैसे कहा जाता है कि दूध ले आना। योगेंद्र चुप रहा। वह ऐसी बातों पर हमेशा से चुप रहता आया है। सोमवार को वह चार बजे उठा। उन दोनों का चलने का वक़्त हमेशा साढ़े चार का रहा है, क्योंकि आठ बजे के बाद उस सड़क पर धूप और भीड़ दोनों हो जाती हैं।

उसने दोनों लोटे उठाए। दोनों में जल भरा। रामेश्वरी दरवाज़े तक आई और वहीं खड़ी रही, और उसने उसे जाते हुए देखा, और अंदर जाकर उसने दीवार वाली घड़ी की तरफ़ देखा और वक़्त देख लिया।

रामेश्वरी उस सुबह दोबारा नहीं सोई।

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वह दरवाज़े की चौखट पर बैठी रही और उजाला होते देखा, और सात बजे उसने चाय बनाई और दो गिलास में डाली, जो चालीस बरस की आदत है और आदत एक दिन में नहीं जाती। दूसरा गिलास उसने ढककर रख दिया।

वह शाम तक वैसा ही रखा रहा। यही उस दिन की असली बात है और उसे समझने के लिए एक हिसाब जानना पड़ेगा। उन दोनों को छह किलोमीटर जाने में हमेशा दो घंटे चालीस मिनट लगते थे। अकेला आदमी वह रास्ता सवा घंटे में तय कर लेता है। योगेंद्र आज भी कर लेता।

ये जो बाक़ी अस्सी मिनट हैं, वे रामेश्वरी के थे। उसकी चाल धीमी है, यह शादी के वक़्त से है, और बीच में उसे दो बार बैठना पड़ता था। बैठने की जगह भी तय थी। चौथे किलोमीटर पर एक पीपल है और उसके नीचे चबूतरा है।

योगेंद्र उस दिन वहीं बैठा। वह सवा छह बजे वहाँ पहुँचा और वह वहाँ पचास मिनट बैठा रहा, और उसके बाद उठकर आगे बढ़ा, और मंदिर सात बजकर दस मिनट पर पहुँचा। वह कोई भावुक आदमी नहीं है और उसने वहाँ बैठकर पुरानी बातें नहीं सोचीं।

उसने जो सोचा वह यह था कि अगर वह घर जल्दी लौट आया तो रामेश्वरी को यह मालूम हो जाएगा कि इकतालीस बरस में वह उसे कितना धीमा करती रही है। और यह उसे मालूम नहीं होना चाहिए था। उसने दोनों लोटे चढ़ाए। एक अपनी तरफ़ से, एक उसकी तरफ़ से।

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पंडित ने पूछा कि आज अकेले। उसने कहा कि घुटना ख़राब है। लौटते में उसने वही किया। उसी चबूतरे पर, उतनी ही देर। घर वह ठीक साढ़े बारह बजे पहुँचा, जो उन दोनों का हमेशा का वक़्त था, मिनट भर के फ़र्क़ से।

रामेश्वरी ने कुछ नहीं पूछा। उसने पानी दिया, फिर खाना दिया, और खाते वक़्त उसने सिर्फ़ यह पूछा कि भीड़ कितनी थी। उसने कहा कि हर बरस जितनी। बात वहीं ख़त्म हो गई।

अगले बरस भी यही हुआ। फिर उसके बाद वाले बरस भी। चौथे बरस रामेश्वरी ने एक बात कही। उसने इतना कहा कि इस बार पौने पाँच पर निकलना, आजकल उजाला देर से होता है। योगेंद्र ने कहा कि ठीक है।

इससे ज़्यादा उसने कुछ नहीं पूछा। इसका मतलब यह था कि उसे पता है। पूरा पता है, और शायद पहले बरस से ही पता था, क्योंकि वह घड़ी उसी ने देखी थी। दूसरा मतलब यह था कि वह उसे पंद्रह मिनट कम बैठने दे रही है, क्योंकि उस चबूतरे पर बरसात में मच्छर बहुत होते हैं।

इसके अलावा इस बारे में उन दोनों के बीच आज तक कोई बात नहीं हुई। लोटे अब भी दो हैं और दोनों हर बरस जाते हैं।

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पीतल के लोटे की मूठ हाथ से घिसकर चमकने लगती है और यह पचास बरस में साफ़ दिखने लगता है। योगेंद्र वाला दोनों तरफ़ से घिसा हुआ है, क्योंकि वह उसे बदल-बदलकर पकड़ता रहा है। रामेश्वरी वाला बरसों तक एक ही तरफ़ से घिसा था, क्योंकि वह उसे हमेशा दाहिने हाथ में सीधा पकड़ती थी। अब उसकी दूसरी तरफ़ भी घिसने लगी है, और वह इसलिए घिस रही है कि उसे अब कोई और आदमी बाएँ हाथ में लटकाकर छह किलोमीटर ले जाता है।