क़र्ज़ चार लाख साठ हज़ार का था और वह उनकी शादी के दूसरे बरस लिया गया। मंजू के पिता का दिल का ऑपरेशन था। नागपुर में। पहले पैसा साहूकार से लिया गया, क्योंकि उस वक़्त बैंक तीन हफ़्ते लेता और तीन हफ़्ते थे नहीं।

साहूकार का ब्याज तीन रुपये सैकड़ा महीना था। जिसे यह मालूम नहीं, उसके लिए इतना काफ़ी है कि उस हिसाब से चार साल में मूल जितना ब्याज बन जाता है। चौथे बरस उदय ने उसे सहकारी बैंक के क़र्ज़ में बदलवाया और तब जान बची।

उसके बाद क़िस्त बँध गई। हर महीने की सात तारीख़। ग्यारह सौ पचास रुपये।

यह रकम आज सुनने में कुछ नहीं लगती और रीवा में एक किराए के मकान में रहने वाले दो लोगों के लिए, जिनमें एक की तनख़्वाह नौ हज़ार हो, यह हर महीने की सबसे बड़ी चीज़ थी। चौदह बरस चला। एक सौ अड़सठ क़िस्तें।

इन चौदह बरसों में जो नहीं हुआ, उसकी सूची छोटी है और साफ़ है। दूसरा बच्चा नहीं हुआ। यह अपने आप नहीं हुआ। यह पाँचवें बरस बैठकर तय किया गया और दोनों को मालूम था कि वे क्या तय कर रहे हैं।

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छत नहीं पड़ी। चौदह बरस टीन के नीचे कटे, जो जाड़े में ठीक रहता है और मई में नहीं। मंजू की डीएड की पढ़ाई तीसरे बरस छूट गई। फ़ीस उसी महीने पड़ती थी जिस महीने ब्याज चढ़ा हुआ था। और एक बात जो उदय को सबसे भारी पड़ी।

उसके अपने पिता का श्राद्ध सबसे छोटे तरीक़े से हुआ। ग्यारह लोगों का। गाँव में इस पर बात चली और उसके चाचा ने उससे कहा कि बाप के लिए इतना भी नहीं। उदय ने कोई सफ़ाई नहीं दी, क्योंकि सफ़ाई देने का मतलब क़र्ज़ बताना था, और क़र्ज़ बताने का मतलब मंजू के मायके की बात बताना था।

मंजू को यह उसी शाम मालूम हो गया, क्योंकि चाचा ने ज़ोर से कहा था। उस रात उसने उससे कहा कि बता क्यों नहीं देते। उसने कहा कि तुम्हारे बाप का ऑपरेशन है, चर्चा का सामान नहीं। मंजू के पिता नौ बरस और जिए।

वे ग्यारहवें बरस गए और तब तक तीन बरस की क़िस्तें बाक़ी थीं। यह बात इस मामले की सबसे सादा और सबसे कड़ी बात है। जिस आदमी के लिए वह पैसा लगा था, वह चला गया और क़िस्त चलती रही।

आठवें बरस एक मौक़ा आया था। उदय के बड़े भाई ने कहा कि आधा मैं दे देता हूँ। उसने यह अच्छे मन से कहा था और उसके पास पैसा भी था। उदय हाँ कहने वाला था। मंजू ने मना कर दिया।

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उसकी वजह उसने उसी रात बता दी थी और वह वजह भावुक नहीं थी।

उसने कहा कि आज वे दो लाख देंगे और उसके बाद उम्र भर इस घर के हर फ़ैसले में उनकी एक बात रहेगी। बच्चे की पढ़ाई में, मकान में, हमारे मायके आने-जाने में। उसने यह भी कहा कि इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं है, यह अपने आप हो जाता है।

उदय ने भाई से मना कर दिया और उस मना करने में उसे बहुत बुरा लगा और उसने वह भी मंजू से नहीं छिपाया। आख़िरी क़िस्त चौदहवें बरस फागुन में गई। गुरुवार था। उदय बैंक गया और पैसा जमा किया और उसे रसीद मिली और उस पर वह लिखा था जो चौदह बरस से नहीं लिखा गया था।

बक़ाया शून्य। वह घर आया और उसने रसीद मंजू को दी और वह पढ़ती रही। उसके बाद दोनों बैठ गए। और उन दोनों की समझ में नहीं आया कि अब किया क्या जाए।

यह सुनने में हल्की बात लगती है और वह शाम बहुत भारी थी। चौदह बरस से हर महीने की सात तारीख़ उनके दिमाग़ में थी। कोई चीज़ ख़रीदने की बात उठती तो सबसे पहले वही सोचा जाता था। अब वह जगह ख़ाली हो गई थी और वहाँ रखने को कुछ नहीं था।

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मंजू ने चाय बनाई और वे चुपचाप पीते रहे। फिर उदय उठकर बाहर चला गया। वह चालीस मिनट बाद लौटा और उसके हाथ में एक छोटा-सा पैकेट था। उसमें साबुन था। एक ही डिबिया, और वह उस कंपनी की थी जिसका साबुन मंजू शादी से पहले लगाती थी।

उसने वह दूसरे बरस लेना बंद कर दिया था, क्योंकि जो घर में आता था वह नौ रुपये सस्ता था। यह बात उसने कभी नहीं कही थी। उदय ने उसे कभी देखा भी नहीं था, क्योंकि उनकी शादी के वक़्त तक वह बंद हो चुका था।

उसे यह उसके मायके से मालूम था। उसकी छोटी बहन ने बरसों पहले किसी बात पर कह दिया था कि दीदी को यही अच्छा लगता था। उसने वह चौदह बरस याद रखा। मंजू ने उसे उसी शाम खोल लिया। उसने उसे रखा नहीं, सँभालकर नहीं रखा, अलमारी में नहीं रखा। उसने उसे उसी रात नहाने में लगाया।

उस रात उस टीन वाले कमरे में उस साबुन की गंध भरी रही और उदय को इसका पता नहीं चला, क्योंकि जो आदमी साबुन ख़रीदकर लाता है वह यह नहीं सोचता कि घर से कैसी गंध आएगी। मंजू ने उसे बताया भी नहीं।

उसके बाद से वह हर महीने वही लेती है।

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छह बरस हो गए। नौ रुपये महीने के हिसाब से यह कुल छह सौ अड़तालीस रुपये बैठता है, और यह हिसाब मंजू ने कभी नहीं लगाया, और उस घर में यह अकेली चीज़ है जिसका हिसाब नहीं लगाया जाता।