उस घर में चाबियाँ कुंती के पास रहती थीं। गुच्छे में ग्यारह थीं। अलमारी, बक्सा, कोठरी, ऊपर वाला कमरा, और वे छह जिनका ताला अब कहीं नहीं है और जो फिर भी गुच्छे में लगी रहती हैं। गुच्छा उनके पल्लू में बँधा रहता था। सोते वक़्त भी।

रजनी इस घर में तेईस की उम्र में आई। उसे तेल चाहिए तो कुंती से कहना पड़ता। चीनी चाहिए तो कुंती से। बच्चों की फ़ीस के पैसे भी वहीं से आते थे। दूसरे बरस की एक बात इस घर में मिसाल की तरह चलती है।

रजनी के मायके से लोग आए हुए थे और चाय के लिए चीनी नहीं थी। कुंती उस वक़्त पड़ोस में गई हुई थीं और उन्हें बुलाने कोई नहीं जा सकता था, इसलिए रजनी ने दुकान से पाव भर चीनी उधार मँगवाई।

शाम को कुंती ने वह उधार अपने हाथ से चुकाया और दुकानदार से कहा कि आगे इस घर के नाम कुछ मत लिखना। यह उन्होंने गुस्से में नहीं कहा था और यही उस बात की सबसे कड़ी चीज़ थी। राजेश बीच में फँसा रहता था और उसने कभी कुछ नहीं किया।

यह उसकी बुराई है और इसे छिपाने का कोई फ़ायदा नहीं। वह अपनी माँ से कह नहीं सकता था और अपनी पत्नी से कहने को कुछ था नहीं, इसलिए वह दोनों तरफ़ हाँ कहता रहा। मुहल्ले में इस घर की यही कहावत थी कि वहाँ बहू के हाथ में कुछ नहीं है।

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और जो लोग यह कहते थे, उनमें से किसी ने कुंती से कुछ नहीं पूछा। छठे बरस कुंती को पित्त की थैली का ऑपरेशन हुआ। वे चार दिन अस्पताल में रहीं। जाने से पहले उन्होंने गुच्छा रजनी को दिया। किसी और को नहीं, राजेश को भी नहीं।

उन चार दिनों में रजनी को अलमारी का नीचे वाला ख़ाना देखना पड़ा, क्योंकि बीमा के काग़ज़ वहीं थे। वहाँ उसे और भी काग़ज़ मिले। उनमें दो हज़ार चार का एक नोटिस था। वह अदालत का था और उसमें इस घर का ज़िक्र था और उसमें कुंती का नाम कहीं नहीं था।

उस दिन रजनी ने वे काग़ज़ पूरे पढ़े और उसे पहली बार यह सब समझ आया। राजेश के पिता उन्नीस सौ अट्ठानबे में गए थे। कुंती तब सैंतालीस की थीं। मकान उनके ससुर के नाम था और उनके ससुर के बाद कभी दाख़िल-ख़ारिज नहीं हुआ, इसलिए काग़ज़ पर मकान अब भी एक मरे हुए आदमी का था।

दो हज़ार चार में राजेश के चाचा ने उसी बात पर दावा किया था। वह मुक़दमा दो बरस चला और किसी तरह टल गया, और उन दो बरसों में कुंती को यह मालूम हो गया कि उनके पास काग़ज़ पर कुछ नहीं है।

इसके पहले भी एक बात थी, जो रजनी को बाद में पड़ोस की एक बुज़ुर्ग औरत से मालूम हुई। कुंती की अपनी सास ने उन्हें बीस बरस कोठरी के पास नहीं जाने दिया था। बीस बरस। इस घर में, इसी कोठरी के।

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चाबियाँ उनके हाथ में तब आईं जब वे सैंतालीस की हो चुकी थीं और तब तक उनके पति जा चुके थे। उसके बाद उन्होंने उन्हें नहीं छोड़ा। रजनी ने यह किसी को नहीं बताया कि उसने क्या पढ़ा। कुंती लौट आईं और गुच्छा वापस ले लिया और इस बारे में किसी ने कुछ नहीं पूछा।

और रजनी ने चाबियाँ माँगना बंद कर दिया। यह उसने सोच-समझकर किया।

उसकी समझ में यह आ चुका था कि वह गुच्छा घर पर हुकूमत नहीं है। वह इस बात का सुबूत है कि इस बार कोई उन्हें नहीं निकाल सकता, और इससे ज़्यादा उनके पास कभी कुछ रहा नहीं। जो काम उसने किया, वह अलग था।

उसने दाख़िल-ख़ारिज कराया। इसमें उसे चौदह महीने लगे।

तहसील के ग्यारह चक्कर, मृत्यु प्रमाणपत्र की नक़ल, वारिस का काग़ज़, अख़बार में इश्तिहार, और वह सब जो ऐसे कामों में लगता है और जिसे कोई नहीं करता क्योंकि जब तक झगड़ा न हो तब तक ज़रूरत नहीं दिखती। पैसे उसने अपनी नौकरी से लगाए। वह सिलाई केंद्र पर पढ़ाती थी।

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राजेश को उसने साथ लिया, क्योंकि बेटे के दस्तख़त चाहिए थे, और उसने कर दिए और आगे कुछ नहीं पूछा। काम पूरा होने पर मकान का काग़ज़ कुंती के नाम हो गया। रजनी ने अपना नाम नहीं डलवाया। राजेश का भी नहीं।

वह काग़ज़ लेकर वह उनके पास गई और उनके सामने रख दिया और इतना कहा कि यह हो गया है। कुंती ने उसे पढ़ा। दो बार। वे उस दिन कुछ नहीं बोलीं। ग्यारह दिन बाद उन्होंने गुच्छा खोला। उन्होंने उसमें से दस चाबियाँ निकालकर रजनी को दे दीं और अपने पास एक रखी।

इस पर घर में कुछ नहीं कहा गया और मुहल्ले में तो और भी नहीं, क्योंकि मुहल्ले को यह मालूम ही नहीं हुआ। अब इसे नौ बरस हो गए। कुंती अस्सी की हैं और अब ज़्यादा चलती नहीं और दिन भर बरामदे में रहती हैं।

जो एक चाबी उन्होंने रखी, वह कोठरी की है। तेल, चीनी, दाल, गुड़ और सिलबट्टा सब उसी में रहता है, और उसमें दिन में कई बार जाना पड़ता है। रजनी हर बार बरामदे में जाकर माँगती है और वे हर बार पल्लू खोलकर देती हैं और हर बार यह भी पूछ लेती हैं कि कितना चाहिए। यह इस घर में दिन का सबसे ज़रूरी काम है और दोनों को मालूम है कि यह क्यों ऐसे ही रखा गया है।