चंदन को जन्म के वक़्त ऑक्सीजन नहीं मिली। यह उस अस्पताल की चूक थी और उस पर कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई, और उस बात से आगे इस क़िस्से का कोई लेना-देना नहीं है।
उसके बाद जो हुआ, वह चौबीस बरस चला। वह बैठ सकता था और चल नहीं सकता था। बोल नहीं सकता था और सुन सब सकता था। उसे चौबीसों घंटे किसी न किसी की ज़रूरत रहती थी। खाना, साफ़-सफ़ाई, करवट, दौरे की दवा, और वे दस काम जो घंटे-घंटे में आते हैं।
गिरीश और प्रेमा ने दूसरे बरस में ही एक हिसाब बना लिया। उन्होंने वक़्त बाँट लिया। गिरीश की नौकरी सुबह की थी। वह छह से दो घर पर रहता था और वहीं से नौकरी पर चला जाता था और रात को दस बजे लौटता था।
प्रेमा दो से रात दस तक रहती थी, और रात दस के बाद फिर गिरीश। यानी दिन का हर घंटा किसी न किसी के नाम था। इसमें कोई भावुकता नहीं थी। यह वैसा ही हिसाब था जैसा कारख़ाने में लगता है।
और यही उसे चला भी सका, क्योंकि जो चीज़ भावना पर चलती है वह चौबीस बरस नहीं चलती। अब वह बात जो इस घर का असली हाल है और जिसे कोई नहीं कहता। वे दोनों उन चौबीस बरसों में एक-दूसरे के साथी नहीं रहे।
वे साथी नहीं थे, वे साथ काम करने वाले दो लोग थे। उनकी बातचीत काम की होती थी। दवा कब दी। दौरा कितनी देर का था। डॉक्टर ने क्या कहा। पानी कितना गया। पारी बदलते वक़्त दो मिनट की बात होती थी और उसे वे दोनों अपनी भाषा में हैंडओवर कहते भी नहीं थे, पर वह वही था।
उनके बीच झगड़ा भी नहीं होता था। झगड़ने के लिए भी वक़्त चाहिए और नाराज़गी को पालने के लिए भी, और उन दोनों के पास दोनों नहीं थे। बीच में एक और लड़की हुई और वह ठीक है और उसकी शादी हो चुकी है और वह गुजरात में रहती है।
वह अपने माँ-बाप के बारे में एक बात कहती है, जो उसने बड़े होकर समझी। वह कहती है कि उसने अपने घर में न कभी लड़ाई देखी और न कभी हँसी। चंदन चौबीस का था जब गया। सर्दियों में निमोनिया हुआ और वह तीन दिन में गया, और डॉक्टरों ने कहा कि यह इस हाल में देर-सबेर होना ही था।
अंतिम संस्कार, तेरहवीं, रिश्तेदार, और वह सब जो होता है। और फिर वे दोनों उस घर में रह गए। अब यहाँ जो लिखा जाएगा वह सुनने में बुरा लगेगा और इसे लिखे बिना बात पूरी नहीं होगी। उन्हें समझ नहीं आया कि एक-दूसरे से क्या बात करें।
चौबीस बरस में उनकी हर बातचीत का एक विषय था और वह विषय अब नहीं था। पहले हफ़्ते वे शाम को दो कुर्सियों पर बैठे रहे और कुछ नहीं बोले। दूसरे हफ़्ते गिरीश ने नौकरी की छुट्टी ख़त्म करके जाना शुरू कर दिया, और उसे जाकर राहत मिली, और उस राहत पर उसे शर्म भी आई।
प्रेमा घर में अकेली रह गई और उसे दिन में कोई काम नहीं था। बयालीस दिन ऐसे बीते। तैंतालीसवें दिन गिरीश ने कुछ कहा। उसने कहा कि चलो कहीं चलते हैं। उन्नीस सौ अट्ठानबे में, चंदन के होने से पहले, उन्होंने एक जगह जाने की बात की थी। पचमढ़ी।
वह बात उन दिनों की थी जब दोनों की उम्र चौबीस-पचीस थी और उन्होंने उसे कभी दोहराया नहीं। प्रेमा को याद थी। वे मार्च में गए। दो दिन के लिए। और वह सफ़र अच्छा नहीं रहा। यह भी सही-सही लिखा जाना चाहिए, क्योंकि उसे अच्छा लिख देना उन दोनों के साथ बेईमानी होगी।
उस मौसम में वहाँ भीड़ थी। कमरा जो मिला वह गंदा था और उसमें से बदबू आ रही थी। पहले दिन शाम को बारिश हुई और वे कहीं नहीं जा सके।
दूसरे दिन जिस जगह वे गए, वहाँ इतने लोग थे कि खड़े होने की जगह नहीं थी। खाने में प्रेमा को कुछ लग गया और रात में उसका पेट ख़राब रहा। उन्होंने तीसरे दिन का टिकट था और वे दूसरे ही दिन लौट आए।
बस में लौटते वक़्त दोनों काफ़ी देर चुप रहे। फिर प्रेमा ने कहा कि अच्छा नहीं था न। गिरीश ने कहा कि नहीं। और उसके बाद वे दोनों हँस पड़े। पहले वह हँसी, फिर वह, और फिर दोनों काफ़ी देर तक हँसते रहे, इतनी देर कि आगे की सीट वाले ने मुड़कर देखा।
उन्हें यह ख़ुद नहीं समझ आया कि इतनी हँसी किस बात पर आई। बात यह थी कि चौबीस बरस में उनके पास ऐसी कोई चीज़ नहीं थी जो सिर्फ़ उन दोनों की हो। न अच्छी, न बुरी। वह ख़राब सफ़र पहली चीज़ थी।
अब उसे छह बरस हो गए हैं। गिरीश रिटायर हो चुका है और प्रेमा ने मुहल्ले की चार लड़कियों को सिलाई सिखाना शुरू कर दिया है। वे हर बरस दो दिन के लिए कहीं जाते हैं। छह बरस में छह बार।
उनमें से चार बार सफ़र ख़राब रहा है और यह उनके यहाँ का मज़ाक़ बन चुका है।
चंदन वाला कमरा अब भी वैसा ही है। उसकी चारपाई वहीं है और दीवार की कील पर दवाओं की वह थैली अब भी टँगी है, ख़ाली। प्रेमा हर पंद्रह दिन में वह कमरा साफ़ करती है और गिरीश उन दिनों घर में नहीं रहता, और यह उन्होंने आपस में कभी तय नहीं किया।