यह खेल इकतीस बरस पुराना है और इसे किसी ने शुरू नहीं किया। धर्मेंद्र की कपड़े की दुकान है। बाज़ार के बीच वाली गली में। दिन भर में कितने ग्राहक आए, यह वह गिनता रहता है। यह कोई शौक़ नहीं है। जो आदमी दुकान चलाता है वह गिनता ही है, क्योंकि उसी से पता चलता है कि हफ़्ता कैसा जा रहा है।

गिनती वह काउंटर पर रखी एक छोटी स्लेट पर करता था। एक-एक लकीर। शाम को दुकान बंद करके वह घर आता है और चंदा पूछती है कि कितने आए। पहले बरस में एक दिन उसने बताने से पहले कहा कि तुम बताओ।

उसने अंदाज़े से एक नंबर बोल दिया। वह ग़लत था और उस दिन बात वहीं ख़त्म हो गई। अगले दिन उसने फिर पूछ लिया। और फिर यह रोज़ का हो गया। नियम भी अपने आप बन गए। दोनों एक-एक नंबर बोलते हैं। फिर स्लेट उलटी जाती है। जिसका नंबर असल से ज़्यादा दूर हो, वह चाय बनाता है।

बराबर दूरी हो तो दोनों बनाते हैं, जो इकतीस बरस में इकतालीस बार हुआ है, और यह गिनती चंदा ने रखी है।

यह खेल हर शाम खेला गया।

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बीच में दुकान बंद रही, दो बार बाढ़ आई, तीन मौतें हुईं, बच्चे हुए और बड़े होकर चले गए। जिन दिनों दुकान बंद रही, उन दिनों खेल नहीं हुआ। बाक़ी सब दिनों में हुआ। चंदा इसमें अच्छी थी। इकतीस बरस में उसने मौसम, त्योहार, बाज़ार का दिन, स्कूल की छुट्टी और शादियों का सीज़न सब पकड़ लिया था।

वह अक्सर तीन-चार के अंदर रहती थी। धर्मेंद्र भी वहीं रहता था, क्योंकि वह वहीं बैठा होता था, और इसलिए यह खेल बहुत हद तक बराबरी का था। उन्तीसवें बरस चंदा के हाथ काँपने लगे। यह अचानक नहीं हुआ और यह कोई बड़ी बीमारी भी नहीं थी। डॉक्टर ने कहा कि उम्र के साथ आता है और इसका इलाज कुछ ख़ास नहीं है।

हाथ हिलते थे तो ज़्यादातर कामों में फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ चाय में पड़ता था। पतीली से गिलास में डालते वक़्त हाथ हिले तो चाय गिरती है, और गरम चाय गिरने से हाथ जलता है, और दो बार जल भी चुका था।

चंदा ने चाय बनाना नहीं छोड़ा। उसने किसी से यह कहा भी नहीं कि दिक़्क़त होती है। उन्तीसवें बरस की गर्मियों से धर्मेंद्र ग़लत नंबर बोलने लगा। वह पहले भी ग़लत बोलता था, दो-तीन का, जितना कोई भी बोलता है।

अब वह चौदह-पंद्रह का ग़लत बोलने लगा। उसने यह हिसाब से किया। हर रोज़ नहीं, क्योंकि हर रोज़ करने से पकड़ा जाता। हफ़्ते में चार-पाँच दिन। इसका नतीजा यह हुआ कि चाय वह बनाने लगा। चंदा ने इसे तीसरे महीने पकड़ लिया।

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पकड़ने की वजह सीधी थी। जो आदमी इकतीस बरस से कपड़ा नापता आया हो और थान देखकर मीटर बता देता हो, वह अपनी ही दुकान के ग्राहक चौदह से ग़लत नहीं गिनता। चंदा ने इस पर कुछ नहीं कहा। और उसका जवाब इस पूरे क़िस्से की सबसे अच्छी बात है।

उसने ख़ुद ग़लत नंबर बोलना शुरू कर दिया। उससे भी ज़्यादा ग़लत। अगर धर्मेंद्र पंद्रह दूर बोलता, वह बीस दूर बोलती।

क्योंकि अगर वह हारती है तो चाय उसे बनानी पड़ेगी, और वही वह चाहती थी। उसे यह नहीं चाहिए था कि उससे चाय बनवाई न जाए। उसे यह चाहिए था कि किसी को यह कहना न पड़े कि अब तुमसे नहीं होगा।

यानी दोनों हारने की कोशिश करने लगे। इसका जो नतीजा निकला, वह हँसने लायक़ है। अब जीतता वह था जिसका बेतुका नंबर इत्तिफ़ाक़ से असल के थोड़ा पास पड़ जाता। एक शाम असल में तेईस ग्राहक आए थे। बाज़ार का दिन था और बारिश भी नहीं थी, इसलिए यह कोई अजीब गिनती नहीं थी।

धर्मेंद्र ने छह बोला। चंदा ने चौवालीस। उस दिन चाय चंदा ने बनाई और उसमें आधी प्याली मेज़ पर गिरी। यह चार महीने चला। फिर एक शाम धर्मेंद्र ने दुकान से आते ही, बैठने से पहले, बिना कुछ पूछे कह दिया।

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उसने कहा कि आज सत्ताईस आए। चंदा ने उसे देखा और कुछ देर बाद कहा कि मैं इकसठ कहती। और वे दोनों हँस पड़े। उस दिन के बाद वह खेल नहीं खेला गया।

इसका ऐलान नहीं हुआ और किसी ने यह नहीं कहा कि अब बंद करते हैं। बस अगली शाम धर्मेंद्र ने आते ही नंबर बता दिया और चंदा ने सुन लिया, और वैसा ही अगले दिन हुआ।

अब चाय वही बनाता है। रोज़।

स्लेट अब भी काउंटर पर रखी है और वह उस पर अब भी लकीरें खींचता है, क्योंकि दुकान चलाने के लिए वह ज़रूरी है।

चंदा उसके साथ बैठती है।

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एक बात रह गई और उसे भी लिख देना चाहिए। चंदा चाय में अदरक कूटकर डालती थी और पत्ती बाद में डालती थी, और धर्मेंद्र ने यह कभी नहीं सीखा और उसने कभी बताया भी नहीं। इसलिए पिछले चार बरस से उस घर में जो चाय बनती है वह फीकी रहती है। दोनों को वह पसंद नहीं है और दोनों उसे रोज़ पीते हैं।