रिश्ता कराने वाले ने कहा था कि लड़का इंटर पास है। सुखदेव आठवीं पास था।
यह झूठ किसी बड़ी नीयत से नहीं बोला गया था। रिश्ता कराने वाले ऐसे झूठ रोज़ बोलते हैं और उन्हें झूठ नहीं मानते, और उनका हिसाब यह होता है कि शादी हो जाने के बाद कौन पूछता है। विद्या एमए थी। हिंदी से।
उसे यह तीसरे दिन मालूम हुआ।
किसी ने बताया नहीं। बिजली का बिल भरने की बात चली और उसने कहा कि तुम भर आना, और सुखदेव ने कहा कि तुम लिख दो, मैं जमा कर आऊँगा। उसने आगे नहीं पूछा और उसे समझ आ गया। अब जो हुआ, उसे साफ़ लिखना पड़ेगा, क्योंकि इसे मीठा करके लिखना बेईमानी होगी।
विद्या रुक गई और वह इसलिए नहीं रुकी कि उसे सुखदेव अच्छा लगा। वह इसलिए रुकी कि उसके बाप ने वह सब लगा दिया था जो उसके पास था और उसकी दो छोटी बहनें अभी बैठी थीं। लौटी हुई लड़की के घर में बाक़ी लड़कियों के रिश्ते नहीं आते। यह मिर्ज़ापुर के उस मुहल्ले में उन्नीस सौ निन्यानबे में भी सच था और अब भी है।
उसने यह बात किसी से नहीं कही, अपनी माँ से भी नहीं। पहला बरस बुरा गया। इसमें झगड़ा नहीं था। इसमें कुछ भी नहीं था और वही सबसे बुरी चीज़ थी। सुखदेव की लोहे-हार्डवेयर की दुकान थी और वह सुबह आठ से रात नौ तक वहीं रहता था और घर आकर खा लेता था।
दूसरे बरस उसने पहली बार पूछा। विद्या कुछ पढ़ रही थी और उसने पूछा कि यह क्या है। उसने बता दिया। किताब का नाम, और यह कि उसमें क्या है। तीन हफ़्ते बाद उसने वह किताब उठा ली। उसने यह छिपकर नहीं किया। वह उसे दुकान ले गया और दोपहर की ख़ाली घड़ी में पढ़ता रहा।
उसे पढ़ने में मुश्किल होती थी। आठवीं तक पढ़े आदमी को अक्षर जोड़ने में दिक़्क़त नहीं होती। दिक़्क़त उन शब्दों से होती है जो किताबों में ही आते हैं और बोलचाल में कभी नहीं आते। ऐसे शब्दों पर वह रुक जाता था।
और वह उन्हें पूछता था। रात में, खाना खाते वक़्त, वह पूछ लेता था कि इसका मतलब क्या है। विद्या बता देती थी। बिना कुछ जोड़े, बिना कुछ कहे। इसलिए यह बात उसे शुरू से मालूम थी। यह कोई छिपाया हुआ काम नहीं था और यह भी नहीं था कि वह उसे चौंकाना चाहता हो।
उस पहली किताब में उसे सात महीने लगे। उन्नीस बरस में उसने अड़तीस पढ़ीं। साल में दो। कभी-कभी सिर्फ़ एक, और एक बरस तो एक भी नहीं। विद्या ने उन्हीं उन्नीस बरसों में शायद छह सौ पढ़ी होंगी, और यह गिनती किसी ने नहीं की, और यह गिनती इस मामले में सबसे बेकार चीज़ है।
बीच में उसकी अपनी ज़िंदगी भी चलती रही। उसने आठ बरस निजी स्कूल में चौबीस सौ रुपये महीने पर पढ़ाया और फिर चौंतीस की उम्र में सरकारी नौकरी निकाली, जिसकी तैयारी उसने रात में की। उन दिनों सुखदेव दुकान से जल्दी आने लगा था और बच्चों को वही देखता था।
ग्यारहवें बरस एक बात हुई। स्कूल का कोई कार्यक्रम था और उसमें विद्या के साथ सुखदेव भी गया। वहाँ बातों-बातों में उसने एक शब्द बोला और उसका उच्चारण ठीक नहीं था। विद्या के साथ पढ़ाने वाले एक मास्टर ने उसे टोक दिया।
उसने बुरी नीयत से नहीं टोका। उसने हँसकर टोका और सुधार भी दिया और आगे बढ़ गया, और वहाँ छह लोग खड़े थे। सुखदेव ने भी हँस दिया। विद्या उस वक़्त चुप रही। उसने जो किया, वह आगे के आठ बरसों में दिखा।
स्कूल का कोई भी कार्यक्रम हो, वह उसे साथ ले जाने लगी। हर बार। एक बार भी अकेले नहीं गई। और वह पहुँचते ही उसका नाम लेकर परिचय कराती थी, किसी के पूछने से पहले। इसमें कोई तक़रीर नहीं थी और उसने कभी उस मास्टर से कुछ नहीं कहा।
बस वह उसे हर जगह ले जाती रही और आगे खड़ा करती रही, आठ बरस। आज उनकी शादी को उन्नीस बरस हो गए हैं। बड़ी लड़की बीएससी कर रही है और छोटा नौवीं में है। घर में एक लोहे की अलमारी है जिसके तीन ख़ाने किताबों के हैं।
ऊपर के दो विद्या के हैं और उनमें किताबें ठूँसकर रखी गई हैं, दोहरी क़तार में, क्योंकि जगह कम पड़ती है। सबसे नीचे वाला ख़ाना अलग है। उसमें अड़तीस किताबें हैं और वे सीधी खड़ी हैं और उनमें जगह बची हुई है।
उन अड़तीसों में पेंसिल के निशान हैं।
वे निशान किसी लाइन के नीचे नहीं हैं। किसी बात पर नहीं हैं। वे सिर्फ़ शब्दों के नीचे हैं, अकेले शब्दों के, और उनमें से हर एक वह शब्द है जो उसे पूछना पड़ा था। कुछ पन्नों पर एक भी नहीं है और कुछ पर चार-चार हैं। एक किताब में एक जगह विद्या का अपना नाम भी नीचे से खिंचा हुआ है, क्योंकि उसमें एक औरत का वही नाम था, और उस निशान के बारे में उसने आज तक नहीं पूछा।