उस नदी में बरसात के चार महीने नाव नहीं चलती। यह कोई नियम नहीं है। कोई रोकता भी नहीं।
बात सिर्फ़ इतनी है कि जुलाई से अक्टूबर तक कोसी की धार ऐसी हो जाती है कि नाव को सीधा रखना किसी के बस का नहीं रहता, और जो मल्लाह उतारता है वह अपनी और सवारी दोनों की जान पर उतारता है।
इसलिए नावें किनारे पर बँधी रहती हैं। उलटी करके, घास से ढककर। और इस पार का गाँव उस पार के गाँव से चार महीने के लिए कट जाता है। घूमकर जाने का रास्ता है। पैंसठ किलोमीटर, पुल होकर। उसमें बस बदलनी पड़ती है और पूरा दिन जाता है और वापसी उसी दिन नहीं होती।
शाहीन इस पार की थी। अफ़रोज़ उस पार का। उनकी शादी की बात दोनों घरों में तय थी और उसमें कोई अड़चन नहीं थी, न ज़ात की, न पैसे की, न किसी बड़े-बूढ़े की। अड़चन सिर्फ़ पानी की थी और वह हर बरस चार महीने आती थी।
दूसरे बरस अफ़रोज़ ने एक काम किया था। सितंबर था और धार थोड़ी उतर चुकी लगती थी और उसने तैरकर पार करने की सोची। वह अच्छा तैराक है और उसने बचपन से उसी पानी में तैरा है, और वह पूरी नाप-तौल के साथ उतरा।
बीच में धार ने उसे पकड़ लिया।
वह चार सौ मीटर नीचे बहा और एक झाड़ में अटककर निकला, और उसके सीने पर वह निशान आज भी है जो उस झाड़ की किसी टहनी से बना था। शाहीन इस पार खड़ी थी और उसने यह पूरा होते देखा।
उसने उस दिन जो कहा वह इतना ही था कि दोबारा किया तो मैं तुमसे शादी नहीं करूँगी। उसने दोबारा नहीं किया। यह उन दोनों की सबसे साफ़ बात है, क्योंकि इसमें कोई बहादुरी नहीं थी और असल बात उसी में थी।
शाहीन एएनएम थी।
उसकी नौकरी इसी पार के उपकेंद्र पर लगी थी, अपने ही गाँव से चार किलोमीटर पर, और वह उसे बड़ी मुश्किल से मिली थी। इस इलाक़े में औरत की सरकारी नौकरी क्या होती है, यह बताने की ज़रूरत नहीं। उसके घर में उसकी माँ अकेली थीं। बाप बरसों पहले जा चुके थे और भाई कोई नहीं था।
अफ़रोज़ की अपनी दुकान उस पार थी। खाद-बीज की, इकलौती, और वह उसके बाप के वक़्त से चल रही थी। इसलिए सवाल यह नहीं था कि शादी होगी या नहीं। सवाल यह था कि कौन किस पार रहेगा। और इसका जवाब जो निकला, वह शाहीन ने निकाला।
उसने तबादले की अर्ज़ी दी। उस पार वाले उपकेंद्र के लिए।
इसमें दो बरस लगे और तीन बार ज़िले जाना पड़ा और एक बार उसे इस बात का जवाब भी देना पड़ा कि वह वहाँ क्यों जाना चाहती है, और उसने वहाँ सच बोला और उससे कुछ बिगड़ा नहीं। तबादला हुआ। शादी हुई। वह उस पार चली गई।
इसमें जो चीज़ पीछे छूटी वह उसकी माँ थीं। आठ महीने कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। नाव चलती है, पार आधे घंटे का है, और शाहीन हफ़्ते में दो बार हो आती है। चार महीने उसकी माँ अकेली रह जाती हैं और तब उन तक पहुँचने का कोई तरीक़ा नहीं रहता।
यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसका हल निकाल लिया गया हो। उसका हल नहीं निकला। वह हर बरस आता है और हर बरस उतना ही भारी होता है। जो निकला वह छोटा-सा तरीक़ा था और वह उसकी माँ ने ही निकाला।
उनके घर की छत फूस की है और उस पर एक सफ़ेद सूती चादर डाली जा सकती है। वह हर सुबह उसे डालती हैं और शाम को उठा लेती हैं। इस पार से वह एक छोटा-सा सफ़ेद चौकोर दिखता है। इतना ही दिखता है और इतना ही काफ़ी है।
चादर छत पर है तो सब ठीक है। तीसरे बरस सितंबर में एक सुबह वह नहीं दिखी।
अफ़रोज़ ने घंटे भर में मल्लाह जगा लिया और उसे तिगुना पैसा देकर उतारा और वह ख़ुद भी साथ गया, और उस मौसम में उस पानी में उतरने का क्या मतलब है, वह ऊपर लिखा जा चुका है। उधर कुछ नहीं हुआ था। उनकी आँख देर से खुली थी, बस।
उसके बाद से वे चादर सबसे पहले डालती हैं, चाय से भी पहले। अब उस बात को ग्यारह बरस हो गए हैं।
उनके दो बच्चे हैं और दुकान चलती है और शाहीन उसी उपकेंद्र पर है, और उस पूरे इलाक़े में लोग उसे नाम से जानते हैं, क्योंकि वहाँ के बहुत से बच्चे उसी के हाथों निकले हैं। और बरसात के उन चार महीनों में हर सुबह एक काम होता है, जो अब घर का काम है।
अफ़रोज़ शाहीन से पहले उठता है। यह उसने अपने आप शुरू किया और आज तक इसका ज़िक्र नहीं हुआ। वह छत पर जाता है, उस तरफ़ देखता है, और नीचे आकर बता देता है, चाहे शाहीन पूछे या न पूछे। ग्यारह बरस में उसने यह हर सुबह किया है, और ऐसी सुबहें कुल मिलाकर तेरह सौ से ऊपर हो चुकी हैं।