फ़ोन हर रविवार आठ बजे आता था और पंद्रह बरस में यह चार बार टूटा। दो बार तूफ़ान में। एक बार जब उमेश के हाथ में चोट लगी थी। एक बार बिना किसी वजह के, और वह वजह उसने आज तक नहीं बताई।

बाक़ी सात सौ से ऊपर रविवार पूरे हुए। उमेश सूरत में था। पावरलूम पर। गाँव सिवान ज़िले में है और उस गाँव से इस तरह जाने वाले पचास से ऊपर हैं, इसलिए इसमें कोई ख़ास बात नहीं है। प्रभा घर पर थी। दो बच्चे, एक भैंस, और सास, जो अब नहीं हैं।

आठ बजे का वक़्त इसलिए था कि मिल में रविवार की छुट्टी नहीं होती थी, पर शाम की पाली सात पर ख़त्म होती थी। फ़ोन वह शेड के बाहर से करता था। यह ज़रूरी बात है और आगे इसी पर सब टिका है।

पावरलूम की आवाज़ बंद नहीं होती। दिन-रात नहीं होती। शेड के बाहर खड़े होकर भी बात करो तो पीछे से वह खटर-खटर आती रहती है, लगातार, एक ही चाल में। प्रभा ने वह आवाज़ पंद्रह बरस सुनी। वह उसे उतनी ही अच्छी तरह जानती थी जितना अपने आँगन के हैंडपंप को।

मार्च में मिल ने पालियाँ घटा दीं।

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यह उस लाइन में हर दो-तीन बरस में होता है और उस बार बड़ा हुआ। सूत महँगा था और माल उठ नहीं रहा था, और सेठ ने तीन शेड में से एक बंद कर दिया। उमेश उसी में था। उसने घर नहीं बताया।

इसकी वजह वही थी जो हर आदमी की होती है। उसे लगा कि दो हफ़्ते में कहीं और लग जाएगा और तब बताने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। दो हफ़्ते चार महीने हो गए। इस पूरे अरसे में उसने एक भी रविवार नहीं छोड़ा।

वह आठ बजे फ़ोन करता था और वही बात करता था। कि आज ओवरटाइम था। कि सेठ ने नया माल पकड़ा है। कि खाने का हिसाब वही चल रहा है। वह उन दिनों एक दूसरे मज़दूर के कमरे में रह रहा था, चार लोगों के साथ, और उसका सामान एक बोरे में था।

पहले ही रविवार को प्रभा ने सुन लिया। उसे कुछ बताया नहीं गया था और उसने कुछ पूछा भी नहीं। उसने बस इतना सुना कि पीछे कुछ नहीं है। कोई खटर-खटर नहीं। कुत्ते की आवाज़ थी, और दूर कहीं गाड़ी की।

उस रात उसने फ़ोन रखकर काफ़ी देर आँगन में बैठकर सोचा। उसके आगे दो रास्ते थे और वे दोनों साफ़ थे। एक यह कि पूछ ले। दो मिनट का काम था। दूसरा यह कि न पूछे, और उसे वह क़िस्सा सुनाने दे जो वह सुनाना चाहता है, और अपनी तरफ़ से वह करे जो उसके हाथ में है।

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उसने दूसरा चुना और वह इसलिए चुना कि वह उस आदमी को जानती थी।

वह आदमी अगर पकड़ा जाता तो लौट आता। तुरंत, अगली गाड़ी से, और सिर झुकाकर लौटता। और गाँव में इस तरह लौटा हुआ आदमी क्या होता है, यह उस गाँव में सबको मालूम है। दूसरे महीने प्रभा ने भैंस बेच दी।

अठारह हज़ार में। दाम कम था, क्योंकि बरसात में भैंस का दाम गिरता है और उसे रुकने का वक़्त नहीं था।

उसने वह पैसा उमेश को भेजा।

भेजते वक़्त उसने कहा कि दूध का पैसा जोड़-जोड़कर रखा था और अब बैंक में पड़ा-पड़ा क्या करेगा, तुम रख लो, वहाँ महँगाई है।

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उमेश ने यह पैसा लिया।

इसमें उसे शर्म आई और उसने वह शर्म भी फ़ोन पर नहीं दिखाई, और यही उन दोनों का चलन था। तीसरे महीने के एक रविवार को वह बताने ही वाला था। उसने शुरू कर दिया था। उसने कहा कि सुनो, एक बात है।

प्रभा ने उसी वक़्त पूछा कि छोटे वाले का दाख़िला किस स्कूल में करवाएँ। और फिर उसने उस पर पूरे बारह मिनट बात की। दोनों स्कूलों की फ़ीस, दूरी, मास्टर कैसे हैं, और कौन-सा किसके यहाँ से पड़ता है। बारह मिनट बाद वह बात ख़त्म हो चुकी थी जो शुरू हुई थी।

यह उसने अगले रविवार को फिर किया। उमेश को अगस्त में काम मिल गया। दूसरी मिल में, कम पैसे पर, पर मिल गया। उस रविवार के फ़ोन में पीछे से फिर वही खटर-खटर आ रही थी और प्रभा ने कुछ नहीं कहा।

उसने इतना ही कहा कि आवाज़ साफ़ आ रही है आज। उमेश चार बरस बाद गाँव लौट आया और अब वहीं है, ब्लॉक की एक दुकान में।

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भैंस वाली बात उसे लौटने के बाद पता चली, पड़ोस की एक औरत से, बातों-बातों में, और वह भी इस तरह कि किस बरस बिकी थी यह भी उसमें आ गया। उसने प्रभा से इस पर कभी कुछ नहीं कहा।

उन दोनों को अब एक ही घर में रहते नौ बरस हो गए हैं।

और हर रविवार को, आठ बजे, वह उठकर बाहर चला जाता है। खेत की तरफ़, जहाँ बोरिंग वाला कमरा है। वहाँ से वह घर पर फ़ोन मिलाता है और प्रभा उठाती है और वे पाँच-सात मिनट बात करते हैं, वही सब जो दिन भर में कह चुके होते हैं। बच्चे इस पर हँसते हैं और इसका जवाब न वह देता है न प्रभा, क्योंकि जवाब किसी के पास है ही नहीं।