नामांकन के आख़िरी दिन बिसाहू को ब्लॉक दफ़्तर की सीढ़ियों पर पता चला कि उसकी पत्नी का पर्चा उससे आधा घंटा पहले जमा हो चुका है। वह वहीं रुक गया। पीछे खड़े लोगों ने पहले उसका चेहरा देखा, फिर एक-दूसरे का, और फिर वही हुआ जो महासमुंद की तहसील में ऐसी ख़बर पर हमेशा होता है। पूरी सीढ़ी हँस पड़ी।
सरपंच की कुर्सी उस बरस औरत के लिए आरक्षित हो गई थी। पुराने सरपंच ने दो ही साल में इस्तीफ़ा दे दिया था, क्योंकि धान ख़रीदी का एक मामला उसके नाम से निकल आया था। उपचुनाव की तारीख़ चैत में पड़ी, ठीक उन दिनों जब खेत निपट चुके थे और गाँव के पास वक़्त ही वक़्त था।
बिसाहू कभी सरपंच नहीं रहा। उसे ज़रूरत भी नहीं पड़ी। गाँव का जो काम ब्लॉक में अटकता था वह उसी के हाथ से निकलता था, और यह कोई छोटी बात नहीं थी। किस बाबू को किस दिन बैठना है, कौन सा काग़ज़ किस रजिस्टर में चढ़ता है, किस अफ़सर से दोपहर में बात करनी है और किससे शाम को। सरपंच कोई भी रहा हो, चलाता वही था। बीस बरस से।
इस बार भी तय हो चुका था। समारू की पत्नी खड़ी होगी और बिसाहू चलाएगा। इसके लिए कोई बैठक तक नहीं हुई। समारू के आँगन में शाम को छह-सात लोग बैठे, दो दौर चाय चली, और बात हो गई।
पर्चा भरने से चार दिन पहले ब्लॉक का एक बाबू सूची लेकर बिसाहू के घर आया था। फुलबासन चाय लेकर आई। बाबू ने समारू की पत्नी का नाम चढ़ाया और काग़ज़ बिसाहू की तरफ़ बढ़ा दिया कि प्रस्तावक में दस्तख़त कर दो। फुलबासन ने गिलास रखते हुए इतना पूछा कि पढ़ना-लिखना तो उसे भी आता है, उसका नाम क्यों नहीं। बाबू ने जवाब नहीं दिया। उसने बिसाहू की तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया, और बिसाहू भी मुस्कुरा दिया।
फुलबासन ने उसके बाद बात आगे नहीं बढ़ाई। उसने गिलास उठाए और अंदर चली गई। बिसाहू को शाम तक यह याद भी नहीं रहा।
चैत की नवरात्रि उन्हीं दिनों पड़ी। मंदिर में जँवारा बोया गया, नौ दिन शाम को गाँव वहीं इकट्ठा होने लगा, और दोनों तरफ़ के लोगों को अपना काम उसी भीड़ के आसपास करना पड़ा। उन नौ दिनों में गाँव और कहीं मिलता ही नहीं था।
बिसाहू का काम अब यह था कि वह अपनी पत्नी के ख़िलाफ़ प्रचार करे।
उसने वह किया, और ढंग से किया। शाम को वह पारा-पारा घूमता और लोगों से कहता कि पंचायत वही चला सकता है जिसे ब्लॉक का रास्ता मालूम हो। लोग सुनते, सिर हिलाते, और फिर पूछते कि घर में खाना आजकल कौन बना रहा है। इस पर पूरा पारा हँसता। तीसरे दिन तक यह सवाल इतनी बार पूछा जा चुका था कि बिसाहू ने उसका जवाब भी तैयार कर लिया था, और वह जवाब भी लोगों को हँसाता ही था।
घर के आगे वाले हिस्से में फुलबासन की छोटी-सी दुकान थी। तेल, नमक, बीड़ी, साबुन, माचिस और चार तरह के बिस्किट। उधार गाँव के अड़तालीस घरों का चलता था और उसका पूरा हिसाब फुलबासन के सिर में रहता था। कोई कापी नहीं थी। अठारह बरस में कभी रही भी नहीं।
उन तेरह दिनों में वह सुबह सात बजे निकल जाती। दुकान पर बिसाहू बैठा।
पहले ही दिन उसे समझ आ गया कि गाँव को जानना अलग बात है और गाँव का हिसाब जानना अलग। कौन कितना ले चुका है, किसका पिछला बाक़ी है, किसे इस महीने रोकना है और किसे नहीं रोकना, क्योंकि उसके घर में इस बार कुछ हुआ है। लोग आते, अपने आप बता देते, और वह मान लेता। दो दिन में उसे यह भी लग गया कि कुछ लोग सच बता रहे हैं और कुछ नहीं, और सच-झूठ पकड़ना उसे नहीं आता था।
तीसरे दिन उसने पीछे की दीवार पर पेंसिल से लिखना शुरू किया। सिर में यह टिकता नहीं था।
उसकी लिखावट टेढ़ी थी और वह नाम पूरे लिखता था, जबकि फुलबासन दो अक्षर में काम चला लेती। तेरह दिन में दीवार का वह हिस्सा भर गया। उसमें से कितना सही था, यह उसे उसी वक़्त भी मालूम नहीं था।
छठे दिन की शाम उसे अपनी ही एक बात खटकी। ब्लॉक का रास्ता कोई पैदा होते ही साथ लेकर नहीं आता। वह भी बीस बरस में सीखा था, और शुरू के तीन बरस उसे भी बाबू लोग बाहर बरामदे में बिठाए रखते थे और चौथे-पाँचवें चक्कर पर बुलाते थे। उसने यह किसी को नहीं बताया। प्रचार भी नहीं रोका।
उन तेरह दिनों में घर के अंदर झगड़ा एक दिन भी नहीं हुआ, जो अपने आप में अजीब था, क्योंकि आम दिनों में हो जाया करता था। रात को वह लौटती, खाना बनता, दोनों खाते, और दोनों में से कोई प्रचार का ज़िक्र नहीं करता। एक रात उसने इतना ज़रूर पूछा कि एड़ी की जो फटन है उस पर मरहम लगाया कि नहीं। इस पर उसने कहा कि लगा लिया है, और यह झूठ था।
वोट चैत की चौदस को पड़े। धूप उस दिन तेज़ थी और लाइन सुबह सात बजे से लग गई थी। औरतें अलग लाइन में थीं और उनकी लाइन दोपहर तक ज़्यादा लंबी रही, जो उस गाँव में पहले कभी नहीं हुआ था। बिसाहू सुबह से बूथ के बाहर खड़ा रहा, दूसरी तरफ़ की तरफ़ से।
गिनती दोपहर बाद हुई। फुलबासन इकतीस वोट से जीत गई।
समारू ने हाथ मिलाया और कहा कि गाँव ने ठीक किया। उसने यह बुरा मानकर नहीं कहा। हारने वाले को वहाँ यही कहना होता है, और वह उस रात मिठाई भी लेकर आया, और आधा घंटा बैठकर यह भी बता गया कि किस पारा में क्या गड़बड़ हुई।
अगली सुबह छह बजे दरवाज़े पर आवाज़ आई। नीचे वाले पारा में बिजली का तार गिरा था और किसी को ब्लॉक जाना था।
बिसाहू उठ खड़ा हुआ। उसने चप्पल भी पहन ली।
फिर वह रुका। वह वापस बैठ गया और उसने अंदर की तरफ़ आवाज़ लगाई कि तुम्हें बुला रहे हैं।
उस दोपहर फुलबासन पहली बार दुकान पर बैठी और उसने पीछे की दीवार देखी। तेरह दिन की टेढ़ी लिखावट, पूरे-पूरे नाम, और कई जगह कम लिखी हुई रक़म। किसका कितना बनता है यह सब उसे याद था, इसलिए यह भी दिख गया कि कहाँ-कहाँ कितना छूट गया है। उसने कपड़ा नहीं उठाया। उसने उसी लिखावट के नीचे इस महीने का ख़ाना शुरू किया और वहीं से आगे चलाया, और वह दीवार आज भी वैसी ही है, नीचे नए हिसाब चढ़ते जाते हैं और ऊपर वे तेरह दिन ज्यों के त्यों पड़े हैं।