बंशी को चार बरस हुए और उसने वह काम किया भी था। यह बात शुरू में ही साफ़ रहनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना बाक़ी सब झूठा हो जाएगा। नलकूप पर पानी की बारी पर झगड़ा हुआ था। धक्का उसी ने दिया था और आदमी पीछे गिरा और सिर पक्की जगत पर लगा और वह उसी रात चला गया।

बंशी ने भागने की कोशिश नहीं की और उसने अदालत में अपना बयान भी नहीं बदला। उसे चार बरस मिले। रधिया उस वक़्त इकतीस की थी और दो बच्चे थे और घर में दो भैंसें थीं। उन चार बरसों में उसने वे दोनों भैंसें रखीं और दूध बेचा और बच्चों को स्कूल में बनाए रखा।

यह उन चार बरसों का हाल है, और वह हाल रधिया का है, बंशी का नहीं। मुलाक़ात पंद्रह दिन में एक बार होती थी। ज़िला जेल तैंतीस किलोमीटर पर है और वहाँ पहुँचने में बस से डेढ़ घंटा लगता है और लाइन में दो-तीन घंटे।

मिलने का वक़्त बीस मिनट होता है। बीच में लोहे की जाली रहती है और दोनों तरफ़ और भी लोग बैठे होते हैं और सब एक साथ बोल रहे होते हैं। बीस मिनट सुनने में बहुत लगते हैं और होते नहीं हैं।

पहली तीन मुलाक़ातों में यही हुआ। वे बीस मिनट बात करते रहे और बस से लौटते वक़्त रधिया को याद आता था कि असल बात तो रह ही गई। बच्चे की फ़ीस। भैंस को सूजन। छत की एक कड़ी। भाई ने क्या कहा।

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चौथी बार से उसने परची लिखनी शुरू कर दी। आगे की रात में, चूल्हे के पास बैठकर, वह एक काग़ज़ पर नंबर डालकर लिख लेती थी। चार से आठ बातें होती थीं। जेल के अंदर काग़ज़ ले जाने नहीं देते, इसलिए वह उसे बाहर ही देख लेती थी, लाइन में खड़े-खड़े, और फिर तह करके ब्लाउज़ में रख लेती थी।

इससे बीस मिनट पूरे चलने लगे। पहले बरस में बंशी ने एक नियम बनवा लिया। उसने कहा कि आख़िरी दो मिनट में कुछ मत बोलना। रधिया ने पूछा कि क्यों। उसने कहा कि बस। और यह आख़िर तक चला। अठारह मिनट में परची निपटती थी और बाक़ी दो मिनट वे दोनों जाली के आर-पार बैठे रहते थे और कुछ नहीं कहते थे।

आसपास बाक़ी लोग तब भी चिल्ला रहे होते थे। तीसरे बरस के जाड़ों में रधिया दो मुलाक़ातें नहीं आ सकी। उसे मियादी बुख़ार हुआ था और वह इक्कीस दिन खाट पर रही। अंदर ख़बर पहुँचाने का कोई तरीक़ा नहीं होता।

बंशी को एक महीने तक कुछ मालूम नहीं था और उस एक महीने में उसने वह सोचा जो ऐसी जगह पर आदमी सोचता है। वह तीसरी बार आई तो उसने यह नहीं पूछा कि क्यों नहीं आई। उसने परची की पहली बात से शुरू किया, जैसे रोज़ का काम हो।

रधिया ने ख़ुद बताया। उसी दिन, अठारह मिनट के अंदर, नंबर छह पर। उसने बुख़ार को भी परची में लिखा था। एक बात और थी जो पूरे चार बरस चलती रही। जो आदमी गया था, उसका घर उसी गाँव में है।

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उसकी विधवा और रधिया एक ही हैंडपंप पर पानी भरती हैं। वह हैंडपंप दोनों घरों के बीच में है और गाँव में दूसरा नहीं है। चार बरस में उन दोनों के बीच एक शब्द नहीं हुआ। न गाली, न ताना, न बात।

जो पहले आ जाती, दूसरी उसके भर लेने का इंतज़ार करती और फिर अपनी बाल्टी रखती। दोनों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते रहे। बंशी चौथे बरस के अंत में छूटा। माघ में। उसे लेने कोई नहीं गया, क्योंकि छूटने का दिन पक्का नहीं होता और वह सुबह की बस से अपने आप आ गया।

गाँव ने न स्वागत किया न कुछ कहा। वहाँ ऐसा ही होता है। जो हो चुका उसे लोग अपनी जगह रख देते हैं और आदमी को उसके काम में लगा देते हैं। घर लौटने के बाद तीन हफ़्ते अजीब रहे।

इसका कारण वह नहीं था जो कोई सोचेगा। वजह यह थी कि उसने चार बरस उस औरत का चेहरा सिर्फ़ जाली के पार से देखा था। एक सौ चार बार। अब वह सामने थी और उसके बीच कुछ नहीं था और बंशी को हर बार नज़र हटानी पड़ती थी।

रधिया ने यह देख लिया। एक शाम उसने संदूक से एक डिब्बा निकाला। पुराना टिन का डिब्बा था, जिसमें पहले चायपत्ती रहती थी। उसमें वे सारी परचियाँ थीं। सब की सब।

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उसने उन्हें फेंका नहीं था। हर मुलाक़ात के बाद वह उन्हें वापस घर ले आती थी और उसी डिब्बे में डाल देती थी, और चार बरस में वह भर गया था। उसने डिब्बा उसके सामने रख दिया और कहा कि पढ़ लो।

बंशी ने उन्हें ग्यारह दिन में पढ़ा। एक सौ चार परचियाँ थीं और उनमें कुल मिलाकर छह सौ से ऊपर बातें लिखी थीं, और वे सब वही बातें थीं जो उसने बीस-बीस मिनट में सुनी थीं। पर तारीख़ के हिसाब से पढ़ने पर वे कुछ और थीं।

उनसे यह दिखता था कि किस महीने में क्या बिका, कब उधार लेना पड़ा, कब बच्चे की किताब नहीं ख़रीदी गई, और किस बरस भैंस की सूजन तीन बार लौटी। यानी उसमें वे चार बरस पूरे लिखे हुए थे, जो उसने देखे नहीं थे।

डिब्बा अब भी संदूक में है।

रधिया ने उसे नहीं हटाया और बंशी ने भी नहीं। उसमें आख़िरी परची सबसे ऊपर है और उस पर तीन बातें लिखी हैं, क्योंकि उस मुलाक़ात के बाद वाली मुलाक़ात की ज़रूरत नहीं पड़ी और वह परची पूरी नहीं भरी गई।