शालिनी की साड़ियाँ अब भी उसी लोहे के संदूक में थीं। वत्सला को उस घर में आए तीन महीने पूरे हो गए थे और उसने वह संदूक खोला तक नहीं। दीवार पर तस्वीर भी वहीं टँगी रही। रसोई के डिब्बे उसी क्रम में रखे रहे जिस क्रम में वे उसे मिले थे, हल्दी सबसे बाएँ और चायपत्ती सबसे दाएँ, जो उसके अपने हिसाब से उल्टा था।
चाल में लोग इसी का इंतज़ार कर रहे थे। किसी ने पूछा नहीं। देखा सबने।
वत्सला चौंतीस की थी और यह उसकी पहली शादी थी। बात उसके भाई के पड़ोसी के ज़रिए आई थी और उसमें कुछ छिपाया नहीं गया था। दो बरस पहले शालिनी को कुछ हुआ था, अस्पताल में चार दिन लगे थे, और उसके बाद घर में एक मर्द और एक नौ बरस की लड़की रह गए थे। वत्सला यह भी जानती थी कि शादी इसलिए हुई है कि मंजिरी को कोई चाहिए।
दिगंबर अकोला की एक जिनिंग फैक्ट्री में काँटे पर बैठता था। कपास की गाड़ियाँ नवंबर से आने लगती हैं और अप्रैल तक चलती हैं। बैलगाड़ी हो या ट्रैक्टर, वह उसे काँटे पर चढ़वाता, वज़न लिखता, और मालिक को पर्ची थमा देता। बारह घंटे की ड्यूटी थी और उसमें बात करने का काम बहुत कम था।
मंजिरी नाराज़ नहीं थी। यह और मुश्किल था। जो सामने रखा जाता वह खा लेती थी, स्कूल ख़ुद तैयार होकर जाती थी, और पानी भी ख़ुद भरकर पीती थी। तीन महीने में उसने वत्सला से एक चीज़ नहीं माँगी।
अप्रैल में अकोला में दोपहर को बाहर निकलना बंद हो जाता है। बोरवेल फरवरी से नीचे बैठने लगता है और टैंकर हफ़्ते में दो बार आता है, इसलिए हर घर में गरमी से पहले बड़े बरतन नीचे उतरते हैं और माँजे जाते हैं। उस बरस वह काम वत्सला ने किया।
बड़ा पातेला उसने राख से माँजा, खँगाला, और उलटकर धूप में रखा। तभी उसे तली पर वे निशान दिखे।
कील से खुरची हुई एक तारीख़ थी। ग्यारह छह दो हज़ार चौदह। उसके नीचे एक शब्द था, मूर्तिजापुर।
उसने बाक़ी बरतन उलटे। हर एक पर तारीख़ थी। थाली, परात, दो पातेले, चाय का पतीला, दूध की डेगची, और वह पुराना हंडा जो अब इस्तेमाल में नहीं था। किसी पर जगह का नाम भी था और किसी पर नहीं। सबसे पुरानी तारीख़ दो हज़ार तेरह की थी, यानी उनकी शादी के बरस की।
रात को उसने दिगंबर से पूछा।
उसने कहा कि उसे मालूम नहीं। फिर उसने यह भी कहा कि उसने कभी बरतन उलटकर देखा ही नहीं। यह उसने शरमाकर नहीं कहा। उसे सचमुच मालूम नहीं था, और बारह बरस की शादी में यह बात एक बार भी सामने नहीं आई थी।
मंजिरी दरवाज़े पर खड़ी थी।
उसने जो बताया वह तीन महीने में उसकी सबसे लंबी बात थी। तारीख़ लिखने का काम पहले उसकी माँ करती थी, हर नई चीज़ पर, ताकि बाद में याद रहे कि कब ली थी और कहाँ से ली थी। फिर जब मंजिरी को अंक लिखने आ गए तो यह काम उसे मिल गया। कील रसोई की खिड़की की चौखट में एक दरार में रहती थी।
वत्सला ने अगले दिन दोबारा देखा। पुराने बरतनों पर लिखावट छोटी और सीधी थी। नए आठ पर वह बड़ी थी और अंक थोड़े टेढ़े थे और छह हर बार उल्टा बना था।
उसने इस पर कुछ नहीं किया। न किसी को बताया, न मंजिरी से दोबारा पूछा। वह उस घर में तीन महीने से यही कर रही थी और उसे यह करना आता था।
गुड़ी पड़वा उन्हीं दिनों पड़ा। उस घर में गुड़ी दरवाज़े के बाहर लगती थी और पिछले दो बरस से नहीं लगी थी। उस सुबह दिगंबर ने कोठरी से बाँस निकाला और बाहर टिका दिया, और फिर काम पर चला गया। शाम तक वह वैसे ही टिका रहा। वत्सला ने उसे उठाया और वापस अंदर रख दिया। किसी ने कुछ नहीं कहा।
अप्रैल के दूसरे हफ़्ते में फैक्ट्री का सीज़न ख़त्म हो गया। दिगंबर को आख़िरी हफ़्ते का पैसा मिला और उसी में से वह पानी रखने के लिए स्टील का एक बड़ा ड्रम ले आया, क्योंकि टैंकर का पानी दो दिन चलाना था और पुराने बरतनों में उतना अँटता नहीं था।
शाम को वत्सला ने वह ड्रम धोया और आँगन में उलटकर रख दिया।
फिर उसने मंजिरी को बुलाया और पूछा कि आज तारीख़ क्या है।
मंजिरी ने बताई। वत्सला ने कहा कि कील ले आ।
लड़की खिड़की की तरफ़ गई, दरार में उँगली डाली, और कील निकालकर ले आई। वह ड्रम के पास बैठ गई। वत्सला ने ड्रम को दोनों हाथों से पकड़कर टिकाए रखा, ताकि वह हिले नहीं, और मंजिरी ने तली पर तारीख़ खुरची। छह इस बार भी उल्टा बना।
मंजिरी ने कील उसकी तरफ़ बढ़ाई और कहा कि इसे खिड़की में ही रख देना, वहीं रहती है, नहीं तो खो जाएगी। वत्सला ने वह कील उसी दरार में डाल दी और उस दिन उसने इस पर कोई बात नहीं की, और उस घर में हर नई चीज़ की तली पर तारीख़ आज भी उसी टेढ़ी लिखावट में पड़ती है।