नागेंद्र की पहली पत्नी दो हज़ार बारह में गई थीं। उस वक़्त उसके दो बच्चे थे। अंजू आठ की और छोटा चार का। तारा का मामला दूसरा था और उस तरह का मामला ज़्यादा मुश्किल होता है। उसका आदमी दो हज़ार नौ में मुंबई गया और लौटा नहीं।
वह मरा नहीं था। किसी ने उसे मरा हुआ नहीं बताया और किसी ने ज़िंदा भी नहीं बताया, और सात बरस में तीन बार अफ़वाह उड़ी कि वह कहीं देखा गया।
ऐसी औरत को उस इलाक़े में विधवा नहीं कहा जाता और सुहागिन भी नहीं कहा जाता। उसके लिए एक ही शब्द चलता है और वह शब्द यहाँ लिखने लायक़ नहीं है। उसका बेटा शैलेंद्र उस वक़्त पाँच का था। तारा ने आठवें बरस अदालत से डिक्री ली।
इसमें उसे ढाई बरस लगे और उसमें अख़बार में इश्तिहार भी देना पड़ा, जिसमें उसके आदमी का नाम छपा और नीचे यह छपा कि वह कहाँ है, यह मालूम नहीं। उस इश्तिहार को उसके मुहल्ले में बहुतों ने पढ़ा। शादी उसके अगले बरस हुई।
दोनों घरों ने आधे मन से माना। यह भी सही ही लिखा जाना चाहिए। किसी ने रोका नहीं और किसी ने ख़ुशी भी नहीं मनाई, और शादी में कुल छत्तीस लोग थे। घर में तीन बच्चे हो गए। अंजू ग्यारह की, शैलेंद्र आठ का, और छोटा सात का।
आगे जो हुआ, वह उन तीनों के बीच का नहीं है। बच्चे आपस में उतने ही लड़े और उतने ही मिले जितने भाई-बहन लड़ते और मिलते हैं, और उसमें कोई ख़ास बात नहीं है। बात काग़ज़ों की है। शैलेंद्र के हर काग़ज़ पर उसके बाप का नाम वही था जो जन्म के वक़्त लिखा गया था।
जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल का दाख़िला रजिस्टर, टीसी, आधार। यह सब एक-दूसरे से जुड़ा होता है और एक जगह से बदलने पर बाक़ी जगह से नहीं बदलता। स्कूल में हर साल फ़ॉर्म भरा जाता है और उसमें वह नाम हर बार लिखा जाता है।
उसे तारा ही भरती थी। चौदह बरस का होने पर शैलेंद्र ने कहा। उसने रात के खाने पर कहा और उसने साफ़ कहा, जैसे लड़के उस उम्र में कहते हैं। उसने कहा कि स्कूल में नाम बदलवा दो, पापा का नाम इनका लिखवा दो।
उसने नागेंद्र को पापा कहना बहुत पहले शुरू कर दिया था और उसे किसी ने कहा नहीं था। तारा ने मना कर दिया। उसी वक़्त, वहीं, नागेंद्र के सामने। उसने कहा कि नहीं होगा। शैलेंद्र ने वजह पूछी और उसने बता भी दी, और उसमें भावुकता कहीं नहीं थी।
उसने कहा कि वह आदमी ज़िंदा है।
उसने कहा कि काग़ज़ में झूठ लिख देने से बात ख़त्म नहीं होती, बल्कि तब शुरू होती है जब तुम्हें कहीं नौकरी में पुलिस जाँच देनी हो, या पासपोर्ट बनवाना हो, या कोई पुराना काग़ज़ नए काग़ज़ से मिलाया जाए।
उसने यह भी कहा कि मैंने इसी चक्कर में ढाई बरस अदालत में काटे हैं और मैं यह तुम्हारे सिर पर नहीं आने दूँगी।
यह पूरी तरह सही बात थी।
और लड़के के लिए इसका कोई मतलब नहीं था, क्योंकि चौदह की उम्र में काग़ज़ की बात दिल की बात के सामने कुछ नहीं होती। उसने नागेंद्र की तरफ़ देखा। और नागेंद्र ने कहा कि तुम्हारी माँ ठीक कह रही है।
उसने यह धीरे से नहीं कहा और टालकर नहीं कहा। उसने उसी मेज़ पर, उसी वक़्त, पूरा वाक्य कहा और उसके बाद खाना खाता रहा। उस रात के बाद शैलेंद्र ने उन दोनों से पाँच महीने ढंग से बात नहीं की।
वह घर में रहा, खाता रहा, स्कूल जाता रहा, और सवालों के जवाब हाँ-ना में देता रहा। नागेंद्र ने उससे इस बारे में दोबारा कुछ नहीं कहा।
उसने बस वह किया जो वह पहले से करता आया था। साइकिल ठीक करना, दवा लाना, स्कूल का काम देखना, और शाम को उसके साथ बैठना, चाहे वह कुछ न बोले। पाँच महीने बाद बात अपने आप पटरी पर आ गई और किसी को यह याद नहीं कि किस दिन आई।
शैलेंद्र की शादी बारह बरस बाद हुई। वह तब छब्बीस का था और ग्वालियर में एक कंपनी में काम कर रहा था। कार्ड उसी ने छपवाया। उसमें ऊपर उसका नाम था और उसके नीचे, जहाँ लिखा जाता है, वहाँ उसके बाप का नाम था।
वही नाम। यह उसने किसी नाराज़गी में नहीं किया।
उसने वही लिखवाया जो काग़ज़ में था, क्योंकि चौदह की उम्र में उसे यही बताया गया था कि काग़ज़ काग़ज़ होता है, और छब्बीस की उम्र में उसे यह समझ भी आ चुका था। शादी में नागेंद्र ने वह सब किया जो बाप करता है।
तिलक उसी ने चढ़ाया। बारात के आगे वही चला। लेन-देन उसी ने देखा। द्वारचार में वही खड़ा रहा और उसने अपने घुटने के दर्द के बावजूद तीन घंटे खड़े होकर काटे। लड़की वालों की तरफ़ के एक आदमी ने उसका कार्ड पढ़ा था।
उसने खाने की जगह पर नागेंद्र से पूछ लिया कि आप लड़के के चाचा हैं। नागेंद्र ने कहा कि हाँ। उसने यह बिना रुके कहा और आगे कुछ नहीं जोड़ा और उस आदमी से दो-तीन और बातें कीं, वही जो शादी में की जाती हैं।
तारा वहीं से दो क़दम पर खड़ी थी और उसने यह सुन लिया था।
उसने वहाँ कुछ नहीं बोला। वह चलकर उसके पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया, वहीं, उस भीड़ में, जहाँ लड़की वालों के साठ-सत्तर लोग खाना खा रहे थे। बारह बरस की गृहस्थी में उसने ऐसा एक बार भी नहीं किया था। उसने कुछ बोला नहीं और थोड़ी देर बाद हाथ छोड़ दिया और खाने की तरफ़ चली गई, और नागेंद्र वहीं खड़ा रहा।