रिश्ता अगस्त में तय हुआ और शादी आखातीज पर रखी गई। बीच में नौ महीने थे, और इसकी वजह महेश की छुट्टी थी। वह शारजाह में था। एसी का काम करता था, ठीक करने और लगाने का, और झुंझुनू ज़िले के उस गाँव से उस लाइन में गए हुए लड़के बहुत हैं।
उसे साल में इक्कीस दिन मिलते थे और वे भी एक ही बार में। इसलिए वह शादी के लिए आ सकता था और देखने के लिए नहीं। सीमा का गाँव चालीस किलोमीटर दूर था। दोनों घरों ने एक-दूसरे को देख लिया था और बात पक्की हो गई थी और उन दोनों ने एक-दूसरे को नहीं देखा था।
फिर फ़ोन शुरू हुआ। हर शुक्रवार, क्योंकि वहाँ शुक्रवार को छुट्टी होती है। चालीस मिनट, कभी-कभी थोड़ा ज़्यादा, और हमेशा शाम को, क्योंकि दिन में सीमा के घर में लोग रहते थे। पहले महीने में बात करने को बहुत कुछ था। घर, भाई-बहन, पढ़ाई, वहाँ का मौसम, यहाँ का मौसम।
दूसरे महीने में ख़त्म हो गया। यह उस उम्र में किसी को समझ नहीं आता और उसे भी नहीं आया। दो लोग जो एक-दूसरे को जानते नहीं, वे चालीस मिनट में क्या बात करें। महेश ने इसका जो हल निकाला, वह उसके हिसाब से बिलकुल ठीक था।
उसने एक कापी में लिखना शुरू कर दिया। जब भी कोई बात दिमाग़ में आती, वह उसे लिख लेता। हफ़्ते भर में चार-पाँच जमा हो जातीं और शुक्रवार को वह उन्हें एक-एक करके निकालता। नौ महीने में उस कापी में इकतालीस बातें लिखी गईं।
वे बातें बड़ी नहीं थीं। बारिश। भाई की नौकरी। खाना। ऊँट वाले का लड़का। दुबई में एक हादसा। कमरे में नया लड़का आया है। बात हर हफ़्ते हुई और अच्छी हुई और दोनों तरफ़ से भली बनी रही। और उन नौ महीनों में उनके बीच कुछ नहीं हुआ, यह बाद में दोनों को समझ आया।
वह अप्रैल के आख़िर में उतरा। जयपुर तक हवाई जहाज़, फिर बस। बस अड्डे पर सीमा नहीं थी, क्योंकि वहाँ लड़की नहीं जाती। वह पहली बार उसे शादी वाले दिन देखेगा, यह तय था। पर एक चीज़ हुई जो तय नहीं थी।
आखातीज से दो दिन पहले उसके घर वाले सीमा के घर गए और वह भी गया, और वहाँ आँगन में वह उसके सामने पड़ गई। पंद्रह सेकंड के लिए। और उन पंद्रह सेकंड में महेश को यह समझ आया कि वह उसे पहचान नहीं पा रहा।
परदे पर आदमी का कुछ नहीं दिखता। क़द नहीं दिखता, चलना नहीं दिखता, और आवाज़ भी वह नहीं होती जो कमरे में होती है। सीमा उससे लंबी थी। इतनी नहीं कि कोई कहे, पर थी। और महेश के दाएँ पैर में बचपन का एक हल्का लंगड़ापन है, जो बैठे हुए आदमी में कभी नहीं दिखता।
नौ महीने में यह बात एक बार नहीं आई थी। शादी हो गई और उसके बाद तीन दिन घर में सौ लोग रहे। उन तीन दिनों में उन दोनों के बीच जो बात हुई वह गिनी जा सकती है। चाय लोगे। हाँ। कितनी चीनी। एक।
चौथी सुबह बिजली गई। मई में उस इलाक़े में यह रोज़ का है और उसके लिए घर में इनवर्टर लगा है। उस सुबह इनवर्टर ने बीप करना शुरू कर दिया और बंद नहीं हुई। घर में और कोई नहीं था। महेश की माँ बुआ के यहाँ गई थीं और बाक़ी सब खेत पर।
वह उस मशीन के सामने खड़ा रहा। उसे उसका कुछ नहीं आता था। घर में इनवर्टर उसकी माँ चलाती थीं, हमेशा से, और वह पिछले सात बरस से यहाँ रहा ही नहीं था। सीमा आई और उसे भी नहीं आता था, क्योंकि उनके घर में दूसरे मॉडल का लगा है और उसमें बटन दूसरी जगह हैं।
फिर वे दोनों बीस मिनट तक उसके पीछे लगे स्टिकर को फ़ोन की रोशनी में पढ़ते रहे। स्टिकर पर हिंदी में कुछ नहीं था। अंग्रेज़ी में छोटा-छोटा लिखा था और उसमें आधा घिस चुका था। इसी बीच सीमा हँस पड़ी।
उसने कहा कि नौ महीने में यह भी पूछ लेते। महेश ने कहा कि कापी में लिखा ही नहीं था। उसने यह मज़ाक़ में नहीं कहा था। वह सच बोल रहा था और उसे उसी वक़्त लगा कि यह बात उसे नहीं कहनी चाहिए थी।
सीमा ने पूछा कि कौन-सी कापी। उसे बताना पड़ा। इनवर्टर आख़िर में पड़ोस के लड़के ने ठीक किया, ग्यारह बजे, और उसमें उसे दो मिनट लगे। उन दोनों की पहली असल बात वह थी, इनवर्टर के सामने, अँधेरे में, और वह किसी मशीन के बारे में थी।
उसके बाद अठारह दिन बचे थे। वे अठारह दिन उन्होंने बात करने में लगाए और उसमें कोई कापी नहीं थी। महेश लौट गया और फ़ोन फिर शुरू हुआ और अब वह अलग था।
अब वह बताता था कि साहब ने क्या कहा और उसे बुरा क्यों लगा, और सीमा बताती थी कि सास से किस बात पर खटपट हुई, और चालीस मिनट कम पड़ने लगे। चौथे बरस सीमा को वह कापी मिली। वह पेटी साफ़ कर रही थी और वह पुराने काग़ज़ों के बीच पड़ी थी।
उसने महेश से पूछा। फ़ोन पर, हँसते हुए। उसने कहा कि फेंक दो। उसने नहीं फेंकी। वह कापी अब भी अलमारी में है।
उसमें इकतालीस बातें लिखी हैं, एक के नीचे एक, नंबर डालकर। बयालीस नंबर पर कुछ नहीं लिखा और उसके आगे के सारे पन्ने कोरे हैं, क्योंकि उस चौथी सुबह के बाद उसे उसकी ज़रूरत कभी नहीं पड़ी।