सरस्वती के यहाँ से रोज़ चार टिफ़िन जाते थे और पाँचवाँ देवेंद्र का था। छिंदवाड़ा के उस मुहल्ले में यह काम बहुत लोग करते हैं।
जिनके घर औरत अकेली है और जिनके पास कोई हुनर नहीं है, वे यही करती हैं। दस-बारह टिफ़िन तक कोई मुश्किल नहीं होती और उससे ऊपर आदमी रखना पड़ता है। सरस्वती ने कभी पाँच से ऊपर नहीं किए। उसे उतने की ही ज़रूरत थी और उतने में ही चल जाता था, क्योंकि घर अपना था और बेटा शादीशुदा था और अलग रहता था।
देवेंद्र बिजली बोर्ड से रिटायर हुआ था। उसकी पत्नी चार बरस पहले गई थीं और उसके बाद से वह अकेला था। टिफ़िन उसने उन्हीं दिनों लगवाया था। मुहल्ले के एक लड़के ने बता दिया था कि कौन बनाती है। बात यहीं से शुरू होती है और लंबी नहीं है।
जो लोग टिफ़िन लगवाते हैं, वे डिब्बा जूठा ही लौटाते हैं। यह बुरी बात नहीं मानी जाती। पैसा इसी बात का है और धोना बनाने वाले का काम है, और सब यही करते हैं। देवेंद्र ने पहले ही दिन डिब्बा धोकर लौटाया।
साफ़ करके, पोंछकर, ढक्कन अलग करके। पहले दिन सरस्वती को लगा कि भूल से हो गया होगा। दूसरे दिन भी वैसा ही आया। तीसरे दिन भी। फिर चार बरस तक वैसा ही आता रहा।
इस पर उन दोनों के बीच कभी कोई बात नहीं हुई, और वजह यह नहीं थी कि बात करना मना था। वजह यह थी कि वे मिलते ही नहीं थे। टिफ़िन लड़का ले जाता था और लड़का ही लाता था।
पैसे महीने की पहली तारीख़ को आते थे, लिफ़ाफ़े में, और उसमें हर बार बीस-पचीस रुपये ज़्यादा होते थे।
यह भी कभी नहीं कहा गया।
चार बरस में वे कुल चार बार आमने-सामने पड़े। दो बार बाज़ार में, एक बार अस्पताल के बाहर, और एक बार उस लड़के की शादी में जो टिफ़िन पहुँचाता था। चारों बार नमस्ते हुई और बात नहीं हुई। पाँचवें बरस के जनवरी में देवेंद्र का बेटा उसे नागपुर ले गया।
बेटा अच्छा लड़का है और यह बात साफ़ रहनी चाहिए। उसने अपने बाप को अकेले छोड़ने से मना किया और अपने साथ रख लिया, और यही सही माना जाता है। देवेंद्र गया और टिफ़िन बंद हो गया।
उसके बाद ग्यारह दिन तक सरस्वती ने पाँच टिफ़िन बनाए। चार बँटते थे और पाँचवाँ बचता था।
पहले दिन उसने सोचा कि आदत है। दूसरे दिन भी यही सोचा। ग्यारहवें दिन उसने वह डिब्बा उस लड़के के हवाले कर दिया और कह दिया कि रोज़ तुम खा लिया करो, और उसके बाद वह पाँच ही बनाती रही।
देवेंद्र पाँच महीने बाद लौट आया।
वहाँ उसका मन नहीं लगा। यह जो वाक्य है, इसके पीछे बहुत कुछ होता है और वह किसी को बताया नहीं जाता। लौटने के दूसरे दिन टिफ़िन फिर शुरू हो गया। और पहला डिब्बा उसी शाम धुला हुआ वापस आया।
अब जो हुआ वह सावन में हुआ।
मुहल्ले में एक शादी थी और वहाँ सरस्वती की बहू ने कुछ कहा। ज़ोर से कहा, हँसते हुए कहा, और उस तरह कहा जिसमें कोई गाली नहीं होती और सब कुछ आ जाता है। उसने टिफ़िन वाली और बुड्ढे बाबू का ज़िक्र किया।
आसपास आठ-दस औरतें थीं और सब चुप हो गईं और फिर बात बदल गई। सरस्वती उस रात नहीं सोई। उसके सामने दो ही चीज़ें थीं और वे उतनी ही सीधी थीं जितनी दिखती हैं। एक यह कि टिफ़िन बंद कर दे।
दूसरी यह कि जो चीज़ चार बरस से बिना नाम के चल रही है, उसे नाम दे दे। उसने अगली सुबह डिब्बे में एक परची रख दी। उस पर एक ही लाइन थी। लिखा था कि अब बात कर लेनी चाहिए।
देवेंद्र उसी शाम आया। पैदल, बिना बताए। उन्होंने आँगन में बैठकर चालीस मिनट बात की और उसमें सबसे ज़्यादा वक़्त इस पर लगा कि बच्चों को कैसे बताया जाएगा। रजिस्ट्री दो हफ़्ते बाद हुई। बरसात में। वहाँ चार लोग थे। सरस्वती की एक सहेली, देवेंद्र का एक पुराना साथी, टिफ़िन पहुँचाने वाला लड़का, और वकील का मुंशी।
देवेंद्र का बेटा नहीं आया।
उसने मना भी नहीं किया। उसने बस इतना कहा कि उससे नहीं आया जाएगा, और उसने नहीं आना ही चुना, और दो बरस से यह वैसा ही है। वह दीवाली पर पैसे भेजता है और फ़ोन पर हालचाल पूछ लेता है। इससे आगे कुछ नहीं।
सरस्वती का बेटा आया था। बहू नहीं आई।
यह सब वैसा ही चल रहा है और शायद आगे भी वैसा ही चलेगा, और उन दोनों ने इसे उसी तरह मान लिया है जैसे बरसात में छत का टपकना मान लिया जाता है।
टिफ़िन अब चार जाते हैं।
हिसाब की कापी वही पुरानी है और सरस्वती नई नहीं लेती, क्योंकि पीछे के पन्ने अभी बचे हुए हैं। उसमें ग्राहकों वाले खाने में देवेंद्र का नाम आज भी लिखा है और उस पर एक सीधी लकीर खिंची हुई है, जो हर छूटे हुए ग्राहक पर खींची जाती है। और उसी पन्ने पर, सबसे नीचे, जहाँ वह हर महीने घर का ख़र्च लिखती है, उसी क़लम से एक जगह लिखा हुआ है कि घर में कितने लोग हैं, और वहाँ अब दो लिखा जाता है।