देवउठनी के बाद बाँदा के उस इलाक़े में शादियाँ शुरू हो जाती हैं। बलदेव के भतीजे की शादी उसी हफ़्ते पड़ी।
घर में शादी हो तो चाचा का काम तय होता है। टेंट, हलवाई, पानी, कुर्सियाँ, और वे सौ चीज़ें जिनके लिए कोई ज़िम्मेदार नहीं होता और जो चाचा के सिर आ जाती हैं। इसलिए वह उस दिन बारह घंटे खड़ा रहा।
कमलावती उसे रात के नौ बजे दिखी। वह लड़की वालों की तरफ़ से थी। उसके पति की बुआ का घर उसी गाँव में है और इसी नाते वे लोग आए थे।
तीस बरस हो गए थे।
पहचानने में उसे देर नहीं लगी और यह उसे बाद में अजीब लगा, क्योंकि तीस बरस में चेहरा पूरा बदल जाता है। उन्नीस की उम्र में उनके बीच जो था, उसका कोई नाम नहीं था।
उस गाँव में उस उम्र में किसी चीज़ का नाम नहीं होता। दोनों एक ही रास्ते से पढ़ने जाते थे और दोनों जानते थे कि दूसरा किस वक़्त निकलेगा, और यही पूरी बात थी। एक शाम कुछ कहा जाने वाला था।
वह कहा नहीं गया।
इसकी कोई बड़ी वजह नहीं थी। सामने से कोई आ गया था और बात वहीं रुक गई, और अगले हफ़्ते उसके बाप का तबादला हो गया और वे लोग बाँदा से हमीरपुर चले गए।
उसके बाद कोई चिट्ठी नहीं गई। किसी तरफ़ से नहीं। बलदेव की शादी तेईस की उम्र में हुई। सुधा से। शादी के दूसरे बरस उसने सुधा को यह बात बता दी थी।
यह उसने किसी अपराधबोध में नहीं बताया। बात निकली थी, गाँव के किसी और के बारे में बात हो रही थी, और उसने कह दिया कि मेरे साथ भी ऐसा था। सुधा ने उस वक़्त क्या कहा, यह उसे याद नहीं।
उसे यह याद है कि उसके बाद उस बात का ज़िक्र तेईस बरस में दोबारा नहीं हुआ और घर में इससे कुछ नहीं बदला। उस रात, शादी में, वे दोनों पानी के ड्रम के पास खड़े हो गए। वह जगह ऐसी ही होती है। खाने की पंगत से हटकर, जहाँ रोशनी कम होती है और जहाँ लोग गिलास लेने आते हैं और चले जाते हैं।
वे वहाँ ग्यारह मिनट खड़े रहे।
बीच में एक लड़का पानी लेने आया और ड्रम की टोंटी नीचे थी, इसलिए कमलावती ने गिलास पकड़ा और बलदेव ने ड्रम को थोड़ा टेढ़ा किया। उन ग्यारह मिनटों में यही एक काम था जो दोनों ने साथ किया, और वह एक प्लास्टिक का गिलास था।
बात यह हुई कि उसके कितने बच्चे हैं। कि बड़ा लड़का रेलवे में लग गया है। कि उसके अपने घुटने में तकलीफ़ रहती है और डॉक्टर ने वज़न कम करने को कहा है। उसने पूछा कि उसके बाप कब गए।
बलदेव ने बताया कि दो हज़ार आठ में। उसने कहा कि उसकी माँ भी उसी बरस गई थीं। इसके बाद दोनों थोड़ी देर चुप रहे और फिर उसने कहा कि खाना देख लो, तुम्हारे यहाँ की शादी है। और वह चली गई।
बस यही हुआ। बलदेव अगले दो घंटे टेंट और कुर्सियों में लगा रहा। उसे इस पर सोचने का मौक़ा तीन दिन बाद मिला, जब वह टेंट वाले के गिने हुए बाँस मिलाकर लौटा रहा था और गिनती दो बार ग़लत निकली।
जो चीज़ उसे लगी, वह यह थी। तीस बरस में उसने कभी-कभार उसके बारे में सोचा था। ज़्यादा नहीं, पर सोचा था। और जिसके बारे में वह सोचता रहा था, वह औरत उस रात वहाँ नहीं थी।
जो वहाँ थी, वह घुटने की तकलीफ़ वाली एक अधेड़ औरत थी जो अपने बड़े लड़के की नौकरी से ख़ुश थी और जिसे उस पंगत में देर हो रही थी। और यह उसे बुरा नहीं लगा। इसमें उसे राहत मिली, और यह वह चीज़ है जो कहने में अटपटी लगती है।
तीस बरस से वह जिसे याद कर रहा था, वह असल में कोई थी ही नहीं। वह उसका बनाया हुआ एक चेहरा था, जो उन्नीस बरस की उम्र में बना था और वहीं रुका रह गया था। असली औरत उससे कहीं ज़्यादा सीधी निकली।
उसने घर आकर सुधा को बता दिया।
खाना खाते वक़्त, बीच बात में, उसी तरह जैसे बाज़ार का हाल बताया जाता है। उसने कहा कि उस दिन कमलावती मिली थी, लड़की वालों की तरफ़ से आई थी। सुधा ने कहा कि अच्छा। फिर उसने पूछा कि उसका लड़का वही है जो रेलवे में लगा है।
बलदेव ने कहा कि हाँ, वही। सुधा ने कहा कि उसकी सास ने बताया था, दो बरस पहले।
गाँव में यही होता है। जिसे आप तीस बरस से याद कर रहे हैं, उसके घर की ख़बर आपकी घरवाली को पहले से मालूम होती है, और वह उसे कोई ख़बर भी नहीं मानती।
इसके बाद बात ख़त्म हो गई। फिर सुधा उठी और अंदर से दाल लेकर आई और उसकी थाली में डाल दी।
उसने माँगी नहीं थी। तेईस बरस से वह माँगता ही नहीं, क्योंकि माँगने की नौबत नहीं आती। रोटी दो और दाल एक बार और, और उसके बाद वह हाथ खींच लेता है, और यह हिसाब उस घर में किसी ने कभी बोलकर तय नहीं किया।