शादी के बाद की पहली बरसात में उनके बीच बात नहीं होती थी। यह कोई झगड़ा नहीं था।

उन्हें एक-दूसरे को दो महीने ही हुए थे और दोनों तरफ़ से कोई बात शुरू करने वाला नहीं था। दिन में वे मिलते ही नहीं थे और रात में घर में और लोग होते थे। वंदना की नौकरी चौदह किलोमीटर दूर थी।

वह गाँव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ाती थी, दूसरे ब्लॉक में, और वहाँ जाने के लिए पहले बस अड्डे तक पहुँचना पड़ता था, जो घर से तीन किलोमीटर था। बस सुबह सवा सात पर निकलती थी।

बरसात में वे तीन किलोमीटर सबसे मुश्किल हो जाते हैं। कच्चा रास्ता है, कीचड़ भर जाता है, और अगर पैदल जाओ तो साड़ी घुटनों तक ख़राब हो जाती है और उसी हालत में पूरा दिन काटना पड़ता है। पहले हफ़्ते वह पैदल गई।

दूसरे हफ़्ते ब्रजेश ने साइकिल निकाल ली। उसने यह पूछकर नहीं किया। एक सुबह वह छह पचास पर साइकिल लेकर दरवाज़े पर खड़ा हो गया और उसने बस इतना कहा कि बैठ जाओ। वंदना बैठ गई। रास्ते भर बात नहीं हुई।

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वहाँ से यह रोज़ का हो गया। ब्रजेश की अपनी नौकरी दूसरी तरफ़ थी, ब्लॉक के दफ़्तर में, और वह नौ बजे शुरू होती थी।

बस अड्डे तक छोड़कर वापस आने में उसे चालीस मिनट लगते थे, फिर तैयार होकर निकलना, और यह सब उस बारिश में होता था जो जुलाई में सुबह-सुबह सबसे ज़्यादा पड़ती है।

उसके पास एक ही बरसाती थी।

प्लास्टिक की, नीली, जो पीछे बैठने वाले को भी ढक ले, उस तरह की। वह उसे साइकिल पर हमेशा वंदना के ऊपर कर देता था और ख़ुद उसके बाहर रहता था। यह उसने कहकर नहीं किया। एक बार भी नहीं।

वह बस उसे पीछे की तरफ़ खींच देता था और चलाने लगता था। वंदना ने पहले दिन इसे नहीं देखा। दूसरे दिन देखा। तीसरे दिन उसने कुछ कहने की कोशिश की और ब्रजेश ने पैडल मारना बंद नहीं किया। अगस्त के दूसरे हफ़्ते में पुलिया वाली जगह पर सड़क कट गई।

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वहाँ पानी घुटनों से ऊपर था और साइकिल उसमें से निकल नहीं सकती थी। ब्रजेश ने साइकिल कंधे पर उठाई और वंदना पानी में चलकर उतरी, और दूसरी तरफ़ पहुँचते-पहुँचते बस निकल चुकी थी। अगली बस साढ़े नौ की थी।

उस दिन वह उसे पूरे चौदह किलोमीटर साइकिल से लेकर गया।

स्कूल वह वक़्त पर पहुँच गई। ब्रजेश अपने दफ़्तर बारह बजे पहुँचा और उसकी आधे दिन की तनख़्वाह कटी, और घर आकर उसने यह नहीं बताया, और वंदना को यह तीन महीने बाद पता चला। दफ़्तर में वह रोज़ भीगा हुआ पहुँचता था।

यह छोटी बात लगती है और नहीं होती। भीगे कपड़े दिन भर सूखते नहीं और उन्हें पहनकर बैठे रहने से खाँसी हो जाती है, और उस बरस उसे दो बार हुई भी। अगस्त के पहले हफ़्ते में वंदना ने दूसरी बरसाती ख़रीदी।

वह ब्लॉक के बाज़ार से आई थी, उसके अपने वेतन से। और उसने उसे ब्रजेश को दी नहीं। उसने उसे साइकिल की सीट के नीचे, कैरियर की जाली में, दबाकर रख दिया।

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यह भी बिना कहे किया गया और इसका ज़िक्र न उसने किया न उसने, और वह पूरे इलाक़े की सबसे साफ़ बात थी जो उन दो लोगों के बीच उन दिनों में हुई।

अगली सुबह ब्रजेश ने उसे देखा। उसने पैकेट निकाला, उसे पलटकर देखा, और वापस वहीं रख दिया। उस दिन भी उसने पुरानी वाली वंदना के ऊपर की और ख़ुद बाहर रहा। और उसके बाद हर दिन यही हुआ। नई बरसाती अपने पैकेट में रखी रही और वह वहीं से गीली होती रही और वहीं से सूखती रही, जाली में दबी हुई।

इस पर बात सितंबर में हुई। पहली बार। वंदना ने पूछा कि रखी क्यों है। ब्रजेश ने कहा कि जगह घेरे रहेगी तो याद रहेगा कि है।

यह कोई जवाब नहीं था और वंदना ने आगे नहीं पूछा। पर उस शाम पहली बार दोनों देर तक बात करते रहे, और बात बरसाती की नहीं थी, स्कूल की थी और वंदना की एक लड़की की थी जो पढ़ने में तेज़ थी और जिसका बाप उसे हटा लेना चाहता था।

उसके बाद बातचीत चलने लगी। धीरे-धीरे, पर चलने लगी। अक्टूबर में बारिश बंद हो गई और साइकिल वाला सिलसिला अपने आप ख़त्म हो गया। अगले बरस वह फिर शुरू हुआ। तीसरे बरस भी। चौथे बरस वंदना का तबादला उसी गाँव के स्कूल में हो गया।

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स्कूल घर से सात मिनट का था और उसके बाद बस अड्डे तक जाने की कोई वजह नहीं बची। साइकिल ब्रजेश के पास रही। वह उसे दफ़्तर ले जाता रहा। उस साइकिल पर वह ग्यारह बरस चला। बारहवें बरस उसने मोटरसाइकिल ली और साइकिल घर के पीछे वाले कमरे में चली गई, जहाँ पुराना सामान रखा जाता है।

उसे वहाँ रखते वक़्त उसने वह पैकेट निकाला। जाली में से, जहाँ वह पड़ा था।

पैकेट कड़ा हो चुका था और उसके किनारे भुरभुरे हो गए थे, जैसे प्लास्टिक बरसों बाद हो जाता है। अंदर वाली बरसाती वैसी की वैसी थी, तह की हुई, और उसकी तहों पर सफ़ेद लकीरें पड़ चुकी थीं। वंदना ने उसे लेकर देखा, फिर वापस उसी में रखा, और फिर उसे वहीं छोड़ दिया जहाँ वह ग्यारह बरस से था, कैरियर की जाली में, और साइकिल उसी हालत में पीछे वाले कमरे में खड़ी है।