उस वाचनालय में छत्तीस सीटें थीं और सबकी अपनी-अपनी थीं। यह इलाहाबाद के उस मुहल्ले की बात है जहाँ हर दूसरी इमारत की पहली मंज़िल पर यही चलता है। नीचे दुकान, ऊपर लकड़ी की मेज़ों की दो कतारें, हर मेज़ पर एक बत्ती, और हर मेज़ के नीचे एक छोटी अलमारी जिसमें किताबें रहती हैं।

ताला अपना लाना पड़ता है।

महीने के साढ़े तीन सौ लगते थे। जमा करने पर सीट आपकी हो जाती थी और जब तक आप जमा करते रहें, उस पर कोई और नहीं बैठता, चाहे आप महीने भर न आएँ। धीरज की सीट चौंतीस थी। अरुणा की पैंतीस।

दोनों साथ-साथ थीं, खिड़की वाली दीवार से तीसरी और चौथी, और बीच में लकड़ी की एक पट्टी थी जो कोहनी से थोड़ी ऊँची पड़ती थी। वे दोनों वहाँ एक ही महीने आए थे। जुलाई में। इसका कोई मतलब नहीं था और यह बाद में उन्हें कई बार याद आया।

चार बरस तक वे रोज़ मिलते रहे।

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मिलना ठीक शब्द नहीं है। वे रोज़ बग़ल में बैठते थे, सुबह छह से रात दस तक, बीच में दो बार खाने के लिए उठकर, और उनके बीच बातचीत कुल मिलाकर बहुत कम हुई। जो हुई, वह ज़्यादातर काम की थी।

कि पिछले बरस का पर्चा किसके पास है। कि पंचायती राज वाला अध्याय किस किताब में ठीक है। कि नीचे वाले की चाय में आजकल पानी ज़्यादा है। पर चार बरस में और भी बहुत कुछ होता है।

अरुणा को बरसात में सिरदर्द होता था, और धीरज को यह तीसरे महीने में पता चल गया था, और उस दिन से वह अपनी बत्ती का मुँह हमेशा दूसरी तरफ़ मोड़कर रखता था ताकि रोशनी उसकी आँख पर सीधी न पड़े।

अरुणा ने यह कभी नहीं कहा कि उसने देख लिया है।

धीरज खाना नहीं खाता था जब पैसे कम पड़ते थे, और यह महीने के आख़िरी हफ़्ते में होता था। अरुणा ने कभी नहीं पूछा। वह बस उन दिनों दो पूरी ज़्यादा ले आती थी और मेज़ पर रख देती थी और कह देती थी कि आज ज़्यादा बन गया।

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यह चार बरस चला और एक भी बार सच नहीं बोला गया। दोनों तरफ़ वजह एक ही थी।

जो लोग ऐसी तैयारी में होते हैं, उनके यहाँ एक चलन है। पहले नतीजा, फिर बाक़ी सब। और यह चलन इसलिए है कि उनमें से एक का भी न निकलना उस बात को ऐसी जगह पहुँचा देता है जहाँ से लौटना मुश्किल होता है।

इसलिए दोनों चुप रहे। चौथे बरस धीरज का हो गया। उसका नाम अंतिम सूची में आया और उसे तीन महीने बाद जाना था, दूसरे मंडल में। वाचनालय में ऐसे मौक़े पर मिठाई बाँटी जाती है और उसने बाँटी। सबने बधाई दी। अरुणा ने भी दी और उसने वही कहा जो और लोगों ने कहा।

उस बरस अरुणा का नहीं हुआ।

आठ नंबर से नहीं हुआ, जो उस इम्तिहान में बहुत कम माने जाते हैं और उससे कुछ बदलता नहीं। धीरज जाने से एक दिन पहले वाचनालय आया। सामान समेटने। उसने अपनी अलमारी ख़ाली की और किताबें दो बोरों में बाँधीं और नीचे वाले लड़के को दे दीं, जो पहले बरस का था।

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फिर वह नीचे मुंशी के पास गया। उसने चौंतीस नंबर का बारह महीने का किराया एक साथ जमा किया। बयालीस सौ रुपये। मुंशी ने कहा कि तुम तो जा रहे हो। उसने कहा कि सीट ख़ाली रहेगी। मुंशी ने कहा कि ख़ाली सीट का किराया कौन देता है।

इसका जवाब उसने नहीं दिया। उसने आगे बस इतना जोड़ा कि किसी को बताना नहीं, और रसीद भी मत काटना, और मुंशी ने रसीद नहीं काटी।

उसने अपना ताला भी नहीं खोला।

अलमारी ख़ाली थी और ताला उस पर लगा रहा, ताकि सफ़ाई वाला उसे खोलकर किसी और को न दे दे। अरुणा को यह दो महीने बाद पता चला। मुंशी ने बताया नहीं। उसे ख़ुद दिखा, क्योंकि दो महीने में किसी ख़ाली सीट पर कोई न बैठे, यह उस वाचनालय में हो नहीं सकता।

उसने मुंशी से पूछा और मुंशी ने पहले टाला और फिर बता दिया। अरुणा ने उस दिन कुछ नहीं किया।

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वह अपनी ही सीट पर बैठी रही, पैंतीस पर, और बग़ल में चौंतीस ख़ाली रही, और उसके नीचे वाली अलमारी पर वह ताला लगा रहा जो अब किसी चीज़ की हिफ़ाज़त नहीं कर रहा था।

वह बरस उसने वहीं काटा।

फ़ोन नंबर उसके पास था और उसने नहीं मिलाया, और उसके पास भी था और उसने भी नहीं मिलाया, और इस बात का कोई अच्छा कारण आज तक न वह बता पाया है और न वह।

अगले बरस अरुणा का हो गया।

उसका नंबर पिछली बार से ऊपर था और उसे मंडल भी वही मिला, जो इत्तिफ़ाक़ था और सिर्फ़ इत्तिफ़ाक़ था। जाने से एक दिन पहले वह वाचनालय आई। सामान समेटने। उसने अपनी अलमारी ख़ाली की और किताबें एक लड़की को दे दीं जो पहले बरस की थी।

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फिर वह नीचे मुंशी के पास गई और उसने पैंतीस नंबर का बारह महीने का किराया एक साथ जमा किया। मुंशी ने इस बार कुछ नहीं पूछा। उसने पैसे लिए, रसीद नहीं काटी, और अपनी कापी में दोनों नंबरों के आगे एक-एक निशान लगा दिया।

वे दोनों उसी शहर में हैं और उनका काम अब एक-दूसरे से मिलता-जुलता है, और वे कभी-कभी एक ही मीटिंग में बैठते हैं और वहाँ सब लोग होते हैं। वाचनालय अब भी चलता है और मुंशी वही है।

उस बरस चौंतीस और पैंतीस दोनों ख़ाली रहीं और उन दोनों पर ताले लगे रहे, और उसके बाद किराया आना बंद हो गया और मुंशी ने ताले कटवा दिए, क्योंकि वह उसका काम था। अब वहाँ दो नए लड़के बैठते हैं जो एक-दूसरे को नहीं जानते। पर मुंशी ने अपनी कापी में वे दो निशान नहीं मिटाए, और वह कापी हर बरस बदली जाती है, और वह उन दो निशानों को हर नई कापी में उतार लेता है।