तड़के तीन बजे कंबाइन गली से निकलकर सड़क पर आई और उसकी बत्तियाँ फ़तेहाबाद की तरफ़ मुड़ गईं। मशीन अपने ही पहियों पर चलती है और बीस की रफ़्तार से चलती है, इसलिए दो सौ किलोमीटर में पूरा दिन निकल जाता है। कर्मबीर ऊपर बैठा था। उसके बग़ल में राजबाला थी।

बाईस बरस में यह पहली बार था।

कंबाइन वाले फ़सल के पीछे चलते हैं। गेहूँ पहले नीचे की तरफ़ पकता है और फिर ऊपर आता है, इसलिए मार्च के दूसरे हफ़्ते में मशीनें श्योपुर और मुरैना की तरफ़ उतरती हैं, वहाँ से कोटा और बूँदी होते हुए राजस्थान में घूमती हैं, और अप्रैल में अपने ज़िले में लौटती हैं। उसके बाद पंजाब। तीन महीने का काम है और साल भर का पैसा उन्हीं तीन महीनों में बनता है।

कर्मबीर हर साल मार्च में निकलता था और जून में लौटता था। बीच में वह तीन-चार बार फ़ोन करता था और बाक़ी वक़्त खेतों में रहता था। राजबाला घर पर रहती थी, क्योंकि घर पर रहना ज़रूरी था। सास थी, दो भैंसें थीं, और बलजीत स्कूल में था।

इस बरस सास जनवरी में गुज़र गई। भैंसें कर्मबीर के भाई के हिस्से चली गईं। बलजीत हिसार में पढ़ने चला गया और उसका हॉस्टल हो गया। फरवरी के आख़िर में घर में सिर्फ़ वे दो रह गए, और उसके बाद कर्मबीर को मार्च में निकलना था।

📚 यह भी पढ़ें तीसरी दुकान
तीसरी दुकान

फरवरी में उसने मशीन वर्कशॉप में खड़ी की और चार दिन उसमें लगाए। कंबाइन का कैबिन दो आदमियों का नहीं होता। ऑपरेटर की सीट होती है और उसके पीछे इतनी जगह बचती है कि कोई खड़ा हो सके, बस। उसने पीछे की चादर कटवाई, लोहे का एक ढाँचा जुड़वाया, और ट्रैक्टर की एक पुरानी सीट उस पर कसवा दी।

उसने राजबाला से यह नहीं बताया। उसने घर आकर इतना कहा कि इस बार तुम भी चलो।

उसने पूछा कि बैठूँगी कहाँ। उसने कहा कि जगह है।

पहले पंद्रह दिन श्योपुर के आसपास निकले। दिन में मशीन खेत में रहती और रात को सड़क के किनारे। सुबह दस बजे से पहले कटाई नहीं होती, क्योंकि बालियों में नमी रहती है और गीला दाना मशीन में जाम करता है। इसलिए हर सुबह दो घंटे ख़ाली जाते थे। बाईस बरस में उन दोनों के पास ऐसे दो घंटे कभी नहीं आए थे।

तीसरे दिन एक बात हुई जो कर्मबीर के लिए नई थी।

📚 यह भी पढ़ें चाबी
चाबी

खेत का मालिक कह रहा था कि रक़बा चार एकड़ है। कर्मबीर की आँख कहती थी कि पाँच से कम नहीं है, पर इसे साबित कैसे करे, यह उसे कभी नहीं सूझा, और ऐसी बहस में आधा दिन चला जाता है। वह ऐसे मौक़ों पर चुप रह जाता था। उस दिन राजबाला नीचे उतरी और खेत के किनारे-किनारे चलकर वापस आई और मालिक से कहा कि चार एकड़ इस तरफ़ से एक सौ अस्सी क़दम बनते हैं और उसने अभी दो सौ चालीस गिने हैं।

मालिक ने पहले हँसकर बात टाली। फिर उसने पूछा कि आप कहाँ से हैं। उस दिन का पैसा साढ़े चार एकड़ का बना, जो सही से थोड़ा कम था और कर्मबीर की उम्मीद से बहुत ज़्यादा।

इसके बाद यह रोज़ का हो गया। रेट की बात राजबाला करने लगी और कर्मबीर मशीन पर बैठा रहता। वह लड़ती नहीं थी। वह गिनकर बता देती थी, और गिनती के आगे किसी के पास कुछ होता नहीं।

बूँदी के पास एक खेत में फ़सल ओले से गिरी हुई थी। गिरी फ़सल में मशीन धीमी चलती है, कटर बार में मिट्टी आती है, और दाना ज़्यादा टूटता है। उसका रेट अलग होता है और सब जानते हैं कि अलग होता है। वह मालिक मानने को तैयार नहीं था।

कर्मबीर ने मशीन मोड़ ली। यही उसका तरीक़ा था। जो न माने उससे बहस मत करो, आगे बढ़ो, खेत बहुत हैं।

📚 यह भी पढ़ें तारीख़
तारीख़

राजबाला ने उसे रोक दिया। उसने मालिक से कहा कि आधा खेत आपके रेट पर काट देते हैं और आधे के बाद आप ख़ुद बता दीजिएगा। आधे के बाद मालिक ने बाक़ी का पैसा बिना कहे बढ़ाकर दिया, और साथ में यह भी कहा कि पहले वाला हिस्सा भी बराबर कर देता हूँ।

उस रात कर्मबीर ने सोचा कि यह उसने कहाँ से सीखा। फिर उसे याद आया कि राजबाला के पिता के पास भी भैंसें थीं और दूध का हिसाब घर में वही रखती थी। यह बात उसे शादी के वक़्त बताई भी गई थी। वह भूल गया था।

कैबिन में धूल इतनी होती है कि शाम तक दोनों के चेहरे एक जैसे हो जाते थे। बाल, भौंहें, कान। रात को वे मशीन के नीचे तिरपाल डालकर सोते थे और उससे ऊपर आसमान नहीं दिखता था, लोहा दिखता था। खाना ढाबे पर होता था, और जिस रात देर हो जाती उस रात नहीं भी होता था।

अप्रैल में वे अपने ज़िले लौटे और वहाँ का काम निपटाकर पंजाब चले गए। बैसाखी मोगा के पास पड़ी और उस दिन खेतों में काम बंद रहा।

उस शाम कर्मबीर ने पूछा कि अगले बरस चलेगी।

📚 यह भी पढ़ें तीसरी दुकान
तीसरी दुकान

राजबाला ने कहा कि मशीन में सीट तो लगी ही है।

जून में मशीन लौटकर वर्कशॉप में गई। हर बरस वहाँ उसे खोलकर साफ़ किया जाता है, कटर बार बदला जाता है, और जो चीज़ें फ़ालतू हैं वे निकाल दी जाती हैं, क्योंकि कैबिन में जगह वैसे ही कम पड़ती है। मिस्त्री ने पूछा कि यह पिछली सीट निकाल दूँ, आगे बैठने में आसानी रहेगी। कर्मबीर ने कहा कि रहने दे। वह सीट आज भी वहीं कसी हुई है और साल के नौ महीने ख़ाली रहती है, और उन नौ महीनों में भी कर्मबीर उस पर कुछ नहीं रखता, न औज़ार, न डिब्बा, न कोई और चीज़।