किरन को खाना बनाना नहीं आता था। इसकी वजह कोई नख़रा नहीं था।

उसकी माँ नौ बरस की उम्र में गुज़र गई थीं और घर में बाप और दो भाई थे, और उस घर का खाना एक बुआ बनाती थीं जो पास में रहती थीं। किसी ने उसे सिखाया नहीं और वह पढ़ती रही और बीए कर गई।

यह उस क़स्बे में बहुत बड़ी कमी मानी जाती है। रामबाबू बीज गोदाम में क्लर्क है। तेरह से उन्नीस की उम्र तक वह एक हलवाई के यहाँ काम कर चुका था, क्योंकि उसके घर में उस वक़्त और कोई रास्ता नहीं था।

वहाँ उसने वह सब सीखा जो एक हलवाई के लड़के को सीखना पड़ता है। उन्नीस के बाद उसने पढ़ाई पूरी की और नौकरी लग गई और चूल्हा छूट गया। शादी के दूसरे महीने में उसे यह समझ आ गया। उसने इस पर कुछ कहा नहीं। उसने एक सुबह उठकर खाना बना दिया।

और उसके बाद अठारह बरस तक बनाता रहा। अब यह समझना पड़ेगा कि इसमें मुश्किल क्या थी। मुश्किल बनाना नहीं था। उसे आता था और अच्छा आता था। मुश्किल यह थी कि किसी को मालूम नहीं होना चाहिए था। उस क़स्बे में जिस घर का मर्द खाना बनाता हो, उस मर्द का मज़ाक़ बनता है। यह पहली बात है और छोटी है।

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दूसरी बात बड़ी है।

उस औरत को निकम्मी कहा जाता है और वह बात उसके साथ जीवन भर चलती है, और उसके मायके तक जाती है, और उसकी बहनों के रिश्तों तक जाती है। रामबाबू को दूसरी बात से डर लगता था। इसलिए उसने वह किया जो अठारह बरस तक करना पड़ा।

वह साढ़े चार बजे उठता था। उस वक़्त गली सोई रहती है और सर्दियों में अँधेरा रहता है। वह दाल चढ़ाता, सब्ज़ी बनाता, आटा गूँधकर रख देता, और सात बजे तक सब कुछ ढककर रसोई से बाहर। फिर वह नहाता और आठ बजे गोदाम निकल जाता।

सात बजे के बाद गली की औरतें आना-जाना शुरू करती हैं और तब तक चूल्हा ठंडा हो चुका होता था और किरन रसोई में होती थी। रोटी किरन सेंकती थी। वह उसने सीख लिया था और वही एक चीज़ थी जो वह कर लेती थी।

बाक़ी सब वह परोसती थी, और परोसना ही वह हिस्सा है जो लोग देखते हैं। इसका हिसाब कोई नहीं लगाता, इसलिए यहाँ लगा दिया जाए। अठारह बरस, हर दिन, डेढ़ घंटे की नींद। और किरन ने बाक़ी सब सँभाला। पैसा उसके हाथ में था, बच्चों का स्कूल उसके पास था, मकान की मरम्मत, बिजली का बिल, बैंक, और वे सब काम जिनमें बाहर जाना पड़ता है।

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साल में एक दिन ऐसा आता था जिसका हल नहीं निकलता था। होली से एक दिन पहले।

उस दिन गुझिया बनती है और गुझिया अकेले नहीं बनती। गली की छह-सात औरतें किसी एक घर में जुटती हैं और पूरा दिन लगता है, और अगले बरस दूसरे घर में। उस घर की बारी अठारह बरस में कभी नहीं आई।

किरन उस दिन बीमार पड़ जाती थी। अठारह बार। यह चलता रहा और किसी ने कुछ पूछा नहीं और सब कुछ न कुछ समझते रहे, पर जो समझते थे वे ग़लत समझते थे। उस बरस रामबाबू की बहन सोनमती आई।

उसका पित्त की थैली का ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टर ने दो महीने आराम कहा था और उसके घर में देखने वाला कोई नहीं था।

वह तीसरे दिन जान गई।

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रात में पेशाब के लिए उठी और उसने रसोई में रोशनी देखी और वहाँ उसका भाई चूल्हे पर था। पौने पाँच बजे। उसने उस वक़्त कुछ नहीं कहा। वह वापस जाकर लेट गई। और उसने दो महीने में एक बार भी इसका ज़िक्र नहीं किया।

न भाई से, न भाभी से, न फ़ोन पर किसी और से। होली उन्हीं दो महीनों में पड़ी। उससे एक दिन पहले सोनमती ने गली में कह दिया कि इस बार गुझिया यहीं बनेगी। उसने यह किसी से पूछकर नहीं कहा।

किरन ने उससे कहा भी कि रहने दीजिए, आपका ऑपरेशन हुआ है। उसने कहा कि बैठकर करूँगी। उस दिन उस घर में सात औरतें आईं। सोनमती पूरे दिन बैठी रही और उसने काम बाँटा और सबसे ज़्यादा ख़ुद किया। और उसने किरन को अपने पास बिठाए रखा।

पूरे दिन। वहीं, अपनी बग़ल में। उस एक दिन में किरन ने तीन चीज़ें सीखीं। मावा भूनना, चाशनी का तार पहचानना, और गुझिया का किनारा मोड़ना। बाक़ी औरतों को यह सिखाना नहीं लगा, क्योंकि सिखाना और साथ बैठाना बाहर से एक जैसा दिखता है।

जाते वक़्त सोनमती ने किरन से सिर्फ़ एक वाक्य कहा। भाभी, चाशनी का तार अब तुम्हें आ गया। इससे ज़्यादा उसने कुछ नहीं जोड़ा, और वह चली गई।

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उसके बाद उस घर में छिपाना धीरे-धीरे कम हुआ।

यह एक दिन में नहीं हुआ। दो-तीन बरस लगे और कोई ऐलान नहीं हुआ। बस रामबाबू ने कभी-कभी सात बजे के बाद भी रसोई में रहना शुरू कर दिया, और एक बार पड़ोस की एक औरत ने उसे कड़ाही में सब्ज़ी चलाते देख लिया, और उसने घर जाकर बता दिया।

फिर कुछ नहीं हुआ।

दो दिन थोड़ी बात हुई और तीसरे दिन वह भी ख़त्म हो गई और किसी ने किरन को कुछ नहीं कहा। यह अपने आप में एक कड़ी बात है, क्योंकि इसका मतलब यह भी है कि अठारह बरस की वह सारी सुबहें शायद ज़रूरी नहीं थीं।

रामबाबू अब भी साढ़े चार बजे उठता है।

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अठारह बरस में शरीर की आदत पड़ जाती है और अब उसे उस वक़्त नींद आती भी नहीं। वह चूल्हा जलाता है और दाल चढ़ाता है। किरन सवा पाँच बजे उठकर वहीं आ जाती है और स्टूल पर बैठ जाती है, और ज़्यादातर वह कुछ नहीं करती, बस बैठी रहती है और वे दोनों बातें करते रहते हैं। उस घर में यह दिन का इकलौता वक़्त है जब बाहर कोई नहीं होता।