रहमत आज़मगढ़ की उस छोटी लाइन पर गेटमैन था। फाटक गाँव के बाहर है और उसके बग़ल में रेलवे की दो कोठरियाँ हैं, जिनमें से एक में वे लोग रहते थे। ड्यूटी बारह घंटे की होती थी। बदलती नहीं थी।

उसकी रात की थी। शाम आठ से सुबह आठ। तबस्सुम आँगनबाड़ी में थी। उसका वक़्त सुबह सात से दोपहर एक तक। अब इसका हिसाब लगाइए। वह सीधा है। वह सुबह आठ बजे ड्यूटी से छूटकर आता था और वह सात बजे निकल चुकी होती थी।

वह एक बजे लौटती थी और तब तक वह सो चुका होता था, क्योंकि रात की ड्यूटी वाले आदमी को दिन में सोना पड़ता है। वह शाम को चार बजे उठता था और आठ बजे चला जाता था। उन चार घंटों में घर के काम होते थे, बच्चे होते थे, बाज़ार होता था, और मेहमान होते थे।

बारह बरस में उन दोनों के अकेले बैठने का वक़्त दिन में चालीस मिनट के आसपास रहा। यह हिसाब उन्होंने कभी नहीं लगाया और यह ठीक ही है। अब वह चीज़ जो इस घर की असल चीज़ थी। छह बजकर बावन मिनट पर डाउन पैसेंजर आती थी।

उससे पाँच मिनट पहले फाटक गिराना पड़ता है।

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फाटक गिरता है तो सड़क रुक जाती है और दोनों तरफ़ साइकिल, ठेले और पैदल वाले खड़े हो जाते हैं, और वह रुकना दो से तीन मिनट का होता है। तबस्सुम का आँगनबाड़ी उसी सड़क पर, फाटक के उस पार है।

वह पौने सात बजे निकलती थी और उसे फाटक तक पहुँचने में पाँच मिनट लगते थे। यानी वह ठीक उस वक़्त वहाँ होती थी जब फाटक गिरा होता था। और उन दो मिनटों में वह वहाँ खड़ी रह सकती थी।

यह ज़रूरी बात है और बाहर वाले को समझ नहीं आएगी। गाँव में औरत का अपने आदमी के पास खड़े होकर बात करना, बीच सड़क पर, सुबह-सुबह, कोई आम बात नहीं है। पर जब फाटक गिरा हो तो सब खड़े होते हैं।

उस वक़्त वहाँ खड़ा रहना किसी को अजीब नहीं लगता, क्योंकि सबको खड़ा रहना पड़ता है। रेलवे की समय-सारणी ने उन्हें रोज़ दो मिनट दिए और उन दो मिनटों पर किसी की नज़र नहीं थी। उन दो मिनटों में जो बात होती थी, वह बहुत मामूली थी।

कि रात कैसी कटी। कि छोटे को बुख़ार है या उतर गया। कि तनख़्वाह कब आएगी। कि उसकी माँ का फ़ोन आया था। कभी-कभी कुछ नहीं होता था और वह बस वहाँ खड़ी रहती थी और वह अपनी कोठरी के सामने खड़ा रहता था।

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फिर गाड़ी निकल जाती और वह फाटक उठाता और सब चल पड़ते और वह भी चल देती। बारह बरस। बिना नागा। बारिश हो या जाड़ा, यह चलता रहा। बारिश में वह छाता लेकर खड़ी रहती थी। जाड़े में अँधेरे में खड़ी रहती थी।

तेरहवें बरस उस लाइन का दोहरीकरण शुरू हुआ। यह अच्छा काम था और उस इलाक़े के लिए ज़रूरी था और उससे बहुत लोगों को फ़ायदा हुआ। काम पूरा होने पर पूरी समय-सारणी बदल गई। डाउन पैसेंजर अब छह बावन पर नहीं आती। वह सात बीस पर आती है।

सात बीस पर तबस्सुम आँगनबाड़ी में होती है, क्योंकि उसका वक़्त सात बजे का है। और छह पचास पर अब वहाँ कुछ नहीं गुज़रता। एक चीज़ बची। सिर्फ़ एक। एक मालगाड़ी है जो उधर से जाती है और मालगाड़ी का कोई पक्का वक़्त नहीं होता।

वह छह चालीस और सवा सात के बीच कभी भी आ सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि अब वे दो मिनट पक्के नहीं रहे। तबस्सुम ने अपना निकलने का वक़्त छह चालीस कर लिया। वह फाटक पर पहुँचकर खड़ी हो जाती है।

कुछ दिन मालगाड़ी छह पैंतालीस पर आ जाती है और तब उन्हें चार मिनट मिल जाते हैं, क्योंकि मालगाड़ी लंबी होती है और उसे निकलने में ज़्यादा वक़्त लगता है। कुछ दिन वह सात पाँच पर आती है। और कुछ दिन वह आती ही नहीं।

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जिन दिनों नहीं आती, उन दिनों वह सात पाँच तक खड़ी रहती है और फिर चली जाती है। इसमें उसे देर हो जाती है। हर बार नहीं, पर अक्सर। आँगनबाड़ी में हाज़िरी का हिसाब रहता है और सुपरवाइज़र महीने में एक-दो बार आती हैं।

नौ बरस में दो बार उसकी देरी दर्ज हुई है। दोनों बार उसने कोई सफ़ाई नहीं दी। एक शब्द भी नहीं। पहली बार पूछे जाने पर उसने कहा कि हाँ, देर हुई थी। दूसरी बार भी उसने यही कहा।

यह वह औरत है जिसने उन्नीस बरस की नौकरी में एक दिन की छुट्टी नहीं ली, न बच्चों के बीमार होने पर, न अपनी सास के जाने पर, क्योंकि आँगनबाड़ी में उसके न आने का मतलब है कि उस दिन तैंतीस बच्चों को खाना नहीं मिलेगा।

उसकी फ़ाइल में उसके काम की कोई शिकायत नहीं है। एक भी नहीं। उसमें बस वे दो टिप्पणियाँ हैं, देर से आने की, नौ बरस के फ़ासले में लिखी हुई। उन दोनों में यह नहीं लिखा है कि वह कहाँ खड़ी थी।

रहमत की उम्र अब तिरपन है और उसकी ड्यूटी अब भी रात की है, क्योंकि इस लाइन पर दिन वाली जगह किसी और की है और वह उससे सीनियर है।

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मालगाड़ी उन्हें अब भी कभी-कभी दो मिनट दे देती है। जिस दिन देती है, उस दिन वे वही बातें करते हैं जो बारह बरस से करते आए हैं, और वे बातें अब भी उतनी ही मामूली हैं। और जिस दिन नहीं देती, उस दिन तबस्सुम पच्चीस मिनट खड़े रहकर वापस मुड़ जाती है और आँगनबाड़ी चली जाती है, और वहाँ पहुँचकर सबसे पहले चूल्हा जलाती है।