हर शादी के पंडाल के पीछे एक जगह होती है जहाँ हलवाई बैठते हैं, ख़ाली गैस सिलेंडर पड़े रहते हैं, और रोशनी कम होती है। वहाँ बर्तन धुलते हैं, चाय बनती रहती है, और कोई रिश्तेदार भूलकर भी नहीं आता, क्योंकि वहाँ बैठने लायक़ कुर्सी नहीं होती। पंकज को वह जगह हमेशा पहले मिल जाती थी। वह वहाँ प्लेट लेकर खड़ा हो जाता था और खाना ख़त्म होने तक कोई उसे ढूँढ़ता नहीं था।
अगहन की उस शादी में वह वहाँ अकेला नहीं था। एक लड़की पहले से खड़ी थी, प्लेट हाथ में, और उसने पंकज को देखकर ज़रा सा किनारे हो गई, जैसे जगह बाँट रही हो।
"कितनी बार पूछा गया?" उसने पूछा। "चार।" "मुझसे नौ।" "आप जीत गईं।"
घरवालों की राय
वह आरती थी, दुल्हन की चचेरी बहन। पंकज दूल्हे का ममेरा भाई था। दोनों चौबीस के थे, दोनों अकेले थे, और दोनों उस शाम एक ही सवाल के अलग-अलग संस्करण सुनकर वहाँ पहुँचे थे। उनके घरों में उस साल यही एक विषय था, और दोनों ने उससे बचने का यही एक तरीक़ा निकाला था कि खाना शुरू होते ही ग़ायब हो जाओ।
उन्होंने बीस मिनट बात की और वह बीस मिनट पूरी शाम का सबसे अच्छा हिस्सा रहा। फिर किसी ने आरती को बुला लिया। नंबर लेने की बात किसी के दिमाग़ में नहीं आई, क्योंकि उस उम्र में लगता है कि लोग फिर मिल ही जाएँगे।
डेढ़ साल बाद माघ में एक और शादी पड़ी। पंकज पंडाल के पीछे पहुँचा तो आरती वहीं खड़ी थी, उसी तरह, प्लेट हाथ में। "इस बार?" उसने पूछा। "ग्यारह।" "मैं हार गया। सात।"
इस बीच पंकज को नौकरी मिल गई थी और आरती एम.ए. कर रही थी। उन्होंने यह सब एक-दूसरे को इस तरह बताया जैसे कोई पुराना हिसाब मिला रहा हो। उस शाम बात चालीस मिनट चली।
पंकज की बुआ शकुंतला के पास एक कॉपी थी। उस कॉपी में उन लोगों के नाम थे जिनकी शादी होनी बाक़ी थी, उम्र के साथ, और वह उसे हर शादी में साथ ले जाती थीं। उम्र के आगे एक और खाना था जिसमें वे तनख़्वाह लिखती थीं, और तीसरे खाने में वह चीज़ जिसे वे कमी कहती थीं। पंकज का नाम उसमें तीसरे नंबर पर था और हर साल ऊपर चढ़ रहा था।
लौटने का ख़याल
तीसरी शादी बैसाख में हुई और इस बार दोनों ने एक-दूसरे को खोजा, हालाँकि किसी ने यह नहीं माना। आरती ने बताया कि उसके घर में अब बात गंभीर हो गई है। पंकज ने बताया कि बुआ की कॉपी में वह पहले नंबर पर आ गया है। दोनों हँसे, और हँसी थोड़ी देर से रुकी।
चौथी शादी अगले अगहन में थी। पंकज पंडाल के पीछे पहुँचा और उसने बताया कि उसकी सगाई हो गई है।
आरती ने बधाई दी और पूछा कि लड़की कैसी है, और पंकज ने कहा कि अच्छी है। आरती ने अपनी प्लेट में से गुलाब जामुन उठाया और वापस रख दिया, और पंकज ने यह देख लिया। फिर दोनों कुछ देर चुप रहे और हलवाई की कड़ाही की आवाज़ बहुत तेज़ लगने लगी। उस शाम बात बीस मिनट भी नहीं चली।
सगाई छह महीने बाद टूट गई। वजह पैसे की थी और उसमें किसी का दिल नहीं टूटा, सिर्फ़ दो परिवारों की बातचीत बंद हो गई। पंकज ने यह ख़बर किसी को नहीं दी क्योंकि देने की ज़रूरत नहीं थी, ख़बर अपने आप पहुँच गई।
पाँचवीं शादी माघ में थी और पंकज वहाँ सबसे पहले पहुँचा। उसने पूरी शाम पंडाल के पीछे गुज़ारी और तीन बार आगे जाकर देखा।
आरती नहीं आई।
उसने पूछा नहीं, क्योंकि पूछने के लिए किसी से पूछना पड़ता। रात में लौटते हुए उसे समझ आया कि छह साल में उसने कभी उसका नंबर नहीं लिया, उसके घर का पता नहीं पूछा, यह तक नहीं पूछा कि वह किस मोहल्ले में रहती है। उसे सिर्फ़ यह मालूम था कि वह कहाँ खड़ी मिलेगी। छह साल में उनकी हर मुलाक़ात किसी तीसरे के ब्याह के भरोसे टिकी रही थी, और यह उसे तब समझ आया जब कोई ब्याह नहीं बचा।
अगली सुबह पंकज ने वह किया जो वह छह साल से टाल रहा था। वह बुआ शकुंतला के पास गया और उनसे कहा कि कॉपी दिखाइए।
बुआ ने कॉपी निकाली, चश्मा ठीक किया, और पूछा कि किसका नाम देखना है, और पंकज ने नाम बता दिया। बुआ ने कॉपी बंद कर दी और कहा कि नाम उन्हें ज़बानी याद है, और यह भी कि वे छह साल से इस दिन का इंतज़ार कर रही थीं और उन्हें लगने लगा था कि यह लड़का पत्थर का है।
फ़ोन उसी दोपहर हुआ। आरती इंदौर में थी, एक इंटरव्यू के लिए गई हुई, और शादी में इसीलिए नहीं आई थी। बात अठारह मिनट चली और उसमें ज़्यादातर वही बताया गया जो दोनों को पहले से मालूम था। अगले अगहन में एक और शादी हुई, जिसमें आगे बैठने का उन्हीं दोनों का नंबर था, और खाना शुरू होते ही वे दोनों उठकर पंडाल के पीछे चले गए, जहाँ रोशनी कम थी और हलवाई अपनी कड़ाही समेट रहे थे।