जगदीश भादों की एक दोपहर को घर लौटा। बस अड्डे से गाँव तक का रास्ता उसे याद था, पर उसमें अब एक पक्की सड़क जुड़ गई थी जो पहले नहीं थी। घर के बाहर नीम वैसा ही खड़ा था। बाक़ी सब बदला हुआ था। दरवाज़े पर पीतल का कुंडा नया था और उसे खोलने का तरीक़ा उसे नहीं आया।
शादी के तीन महीने बाद वह शारजाह गया था। छह साल में वह दो बार आया, दोनों बार पंद्रह-पंद्रह दिन के लिए, और दोनों बार घर में कोई न कोई बीमार था। इस बार वह हमेशा के लिए लौटा था। टिकट वापसी का नहीं था।
सुमन दरवाज़े पर मिली। उसने पैर छुए, फिर सामान भीतर रखवाया, फिर पानी लाई। दोनों की नज़रें मिलीं। दोनों चुप रहे। छह साल की चिट्ठियाँ और फ़ोन कॉलें एक तरफ़ थीं, और सामने खड़ा आदमी दूसरी तरफ़।
जो कहा नहीं गया
पहले तीन दिन मेहमानों में निकल गए। चौथे दिन जगदीश सुबह उठा तो घर में कोई नहीं था, सिवाय अम्मा के, जो बरामदे में बैठी थीं। सुमन पौने पाँच बजे उठकर जा चुकी थी। वह पूछ नहीं पाया कि कहाँ।
उसे उस दिन पता चला कि घर अब किस तरह चलता है। सुमन ने चार भैंसें कर ली थीं। दूध सुबह और शाम निकलता था, ठंडा करके कैन में भरा जाता था, और शहर की डेयरी वाला उसे सड़क के मोड़ से उठा ले जाता था। महीने का हिसाब एक कॉपी में था, तारीख़वार, लीटर और दाम अलग-अलग खानों में। काम बड़ा था। जगदीश ने सोचा भी नहीं था कि इतना बड़ा होगा।
जगदीश ने कॉपी उठाकर देखी और उसे पढ़ने में दिक़्क़त हुई, इसलिए नहीं कि लिखावट ख़राब थी, बल्कि इसलिए कि उसमें ऐसे नाम थे जो वह नहीं जानता था। चारा किससे आता है, डॉक्टर कौन है, कौन उधार में लेता है और कौन नक़द देता है। यह सब छह साल में बना था। उसमें उसका नाम कहीं नहीं था।
उसने पैसे भेजे थे, हर महीने, बिना नागा। पैसा पहुँचता रहा था। पर पैसा भेजना एक काम है और घर चलाना दूसरा, और अब उसे यह फ़र्क़ पहली बार दिख रहा था।
दूसरे हफ़्ते में उसने कोशिश की। उसने भैंस को सानी लगाई और मात्रा ग़लत डाल दी। उसने डेयरी वाले से भाव पर बहस की और बाद में पता चला कि भाव पहले से तय था। तीसरी बार उसने कैन उठाकर गिरा दिया। आठ लीटर। उस पूरे दिन घर में इस पर एक शब्द नहीं बोला गया, और यही सबसे बुरा था। चौथे दिन उसने कुछ नहीं छुआ और दोपहर तक बरामदे में बैठा रहा।
दो घर
उस रात उसने सुमन से कहा कि वह वापस चला जाए तो शायद ठीक रहेगा। वहाँ काम मिल जाएगा। यहाँ वह किसी काम का नहीं है।
सुमन कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा, "एक काम है, जो मैं नहीं कर सकती।"
असल बात यह थी कि डेयरी वाला मोड़ तक आता था और मोड़ तक कैन ले जाना पड़ता था, पौन किलोमीटर, भोर में। छह साल से यह काम एक मज़दूर करता था और उसे इसके पैसे जाते थे। दूरी कोई नहीं थी। सुमन ख़ुद फिर भी नहीं जा सकती थी, इसलिए नहीं कि रास्ता लंबा था, बल्कि इसलिए कि इस गाँव में भोर के अँधेरे में औरत का सड़क पर अकेले जाना बात बन जाती है।
"तुम जा सकते हो," उसने कहा। "तुम्हें कोई नहीं पूछेगा।"
उसने यह बात बिना कड़वाहट के कही और जगदीश ने उसे बिना सफ़ाई के सुना। दोनों जानते थे कि यह काम उसे इसलिए नहीं मिल रहा कि वह बेहतर है, बल्कि इसलिए कि गाँव उसे जाने देगा और उसे नहीं।
अगली सुबह वह साढ़े चार बजे उठा। अँधेरा था। साइकिल के दोनों तरफ़ कैन लटकाए और मोड़ तक गया। लौटते हुए उजाला होने लगा था। उसने रास्ते में एक आदमी को राम-राम कहा और आदमी ने पूछा कि कब आए, और उसने कहा कि आ गया।
वह काम उसने फिर रोज़ किया। एक दिन भी नागा नहीं। महीने के आख़िर में सुमन ने मज़दूर वाला ख़र्च कॉपी से हटा दिया और उसकी जगह कुछ नहीं लिखा।
धीरे-धीरे और चीज़ें भी उसके हिस्से में आ गईं। चारे का सौदा, डॉक्टर को बुलाना, दो नई भैंसों के लिए बैंक का काम। बैंक वाले ने बात उसी से की, क्योंकि काग़ज़ों पर नाम उसी का था, और यह बात घर में किसी ने नहीं उठाई। कॉपी अब भी सुमन के पास रहती थी और शाम को वही लिखती थी। जगदीश ने उसे कभी नहीं माँगा।
एक शाम अम्मा ने सुमन से कहा कि अब सब सँभाल लिया है इसने, तू आराम कर। सुमन ने हामी भर दी। उसके बाद भी कॉपी उसी के पास रही।
अब वे दोनों महीने के आख़िरी दिन देर रात तक बैठकर हिसाब मिलाते हैं। जगदीश तारीख़ें बोलता है और सुमन जोड़ती है, क्योंकि उसका जोड़ तेज़ है और दोनों को यह मालूम है। दो बार जोड़ में फ़र्क़ आया है। दोनों बार ग़लती जगदीश की निकली। दोनों बार वह हँसा है।