मोतियाबिंद का ऑपरेशन संक्रांति से दो दिन पहले हुआ। डॉक्टर ने कहा कि छह दिन आँखों पर पट्टी रहेगी, झुकना नहीं है, और रसोई में बिलकुल नहीं जाना है। शारदा ने सुना और सिर हिला दिया। ओमकार ने भी सुना और उसे तब समझ नहीं आया कि उसने क्या सुना है।

उनकी शादी को बयालीस साल हो चुके थे। इन बयालीस सालों में उन्होंने एक-दूसरे को कभी कोई प्यारी बात नहीं कही थी। ओमकार डाकघर में क्लर्क थे और शारदा घर में थीं, और दोनों के दिन इस तरह बँटे हुए थे कि आपस में कुछ तय करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। बर्तन कहाँ रखे हैं, बिजली का बिल कब जमा होता है, किसकी दवा कब ख़त्म होने वाली है, ये सब बातें दोनों में से किसी एक के हिस्से में थीं और दूसरे को उन पर कभी सोचना नहीं पड़ा।

पहली सुबह ओमकार साढ़े पाँच बजे उठे। उन्होंने पतीली चढ़ाई, पानी डाला, पत्ती डाली, दूध डाला, चीनी डाली। सब कुछ उसी क्रम में जिस क्रम में उन्हें लगा कि होना चाहिए। चाय बन गई। रंग भी ठीक था।

एक छोटी सी बात

शारदा ने आधा कप पिया और कप नीचे रख दिया। उन्होंने कुछ कहा नहीं। दूसरा कप उन्होंने नहीं माँगा।

ओमकार शाम तक इसी पर अटके रहे। बात यह थी कि शारदा रोज़ दो कप पीती थीं। बयालीस साल से, हर सुबह, बिना नागा। और दूसरा कप उन्होंने कभी माँगा नहीं था, वह अपने आप आ जाता था, क्योंकि वे ख़ुद बनाती थीं। ओमकार ने बैठे-बैठे हिसाब लगाया तो संख्या तीस हज़ार से ऊपर बैठी, और उन तीस हज़ार कपों में से एक भी उन्होंने अपने हाथ से नहीं बनाया था।

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दूसरी सुबह उन्होंने पत्ती ज़्यादा डाली। शारदा ने फिर आधा पिया। "कैसी बनी है?" ओमकार ने पूछा। "ठीक है।" यह उनका सबसे बुरा शब्द था और ओमकार यह जानते थे।

उस दिन उन्होंने एक बात पर ग़ौर किया। बयालीस साल में उन्होंने कभी शारदा को चाय बनाते नहीं देखा था। हर सुबह वे बरामदे में अख़बार लेकर बैठ जाते थे और चाय हाथ में आ जाती थी। रसोई से आवाज़ें आती थीं और वे आवाज़ें उन्हें कभी याद नहीं रहीं। पतीली का ढक्कन किस तरह बजता था, चम्मच किस बर्तन से टकराता था, यह सब उनके कानों के सामने से रोज़ गुज़रा था और कहीं ठहरा नहीं था।

तीसरे दिन वे बग़ल वाली कुसुमा के यहाँ गए। कुसुमा को बहुत मज़ा आया। उसने अपनी विधि बताई, जिसमें अदरक कूटकर पानी में सबसे पहले पड़ता था। ओमकार ने वैसी बनाई। शारदा ने एक घूँट लिया और कप रख दिया। "इसमें अदरक है।" "तो?" "मुझे सुबह अदरक नहीं चाहिए।"

एक और मौका

बयालीस साल। ओमकार को यह भी नहीं पता था।

उन्होंने विनायक को फ़ोन किया, जो बेंगलुरु में था। बेटे ने कहा कि उसे भी नहीं मालूम, माँ बना देती थीं, वह पी लेता था। फ़ोन रखने के बाद ओमकार कुछ देर वहीं खड़े रहे। बात यह नहीं थी कि बेटे को नहीं मालूम। बात यह थी कि किसी को नहीं मालूम।

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चौथे दिन उन्होंने तरीक़ा बदला। दूध पहले, पानी बाद में। फिर पानी पहले, दूध बाद में। फिर पत्ती को उबाल आने के बाद डाला। शारदा ने उस दिन आधे से कुछ ज़्यादा पिया, और ओमकार ने वह फ़र्क़ पकड़ लिया।

पाँचवें दिन सुबह उन्हें चीज़ मिली। वे ऊपर वाले खाने से चीनी का डिब्बा उतार रहे थे कि पीछे से एक पुरानी स्टील की पतीली निकली, तली से काली, किनारे से पिचकी हुई। नई पतीली वे तीन साल पहले लाए थे और शारदा ने कभी शिकायत नहीं की थी। पुरानी वाली पीछे रखी थी, धुली हुई, रखी हुई। उन्होंने उसे उलटकर देखा और पाया कि तली पर बरसों की आँच के निशान हैं और एक जगह से वह इतनी पतली पड़ चुकी है कि रोशनी के सामने पकड़ने पर हल्की सी लगती है।

उन्होंने उसी में चढ़ाई। स्वाद बदला, पर पूरा नहीं बदला। कुछ और भी था।

उस शाम वे रसोई में खड़े होकर सोचते रहे कि आवाज़ें कैसी आती थीं। और तब उन्हें याद आया कि उबाल दो बार आता था। एक बार चढ़ती थी, नीचे बैठती थी, फिर दोबारा चढ़ती थी। बीच में एक ठहराव था जिसकी आवाज़ अलग थी।

छठी सुबह उन्होंने पुरानी पतीली में चढ़ाई, अदरक नहीं डाला, और उबाल दो बार आने दिया। कप शारदा के हाथ में दिया और ख़ुद दरवाज़े पर खड़े रहे।

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शारदा ने पहला घूँट लिया। फिर दूसरा। फिर उन्होंने पूरा कप ख़त्म किया और कुछ देर चुपचाप बैठी रहीं। पट्टी की वजह से उनका चेहरा पढ़ा नहीं जा सकता था। बयालीस साल में यह पहली बार था कि ओमकार ने खड़े होकर उन्हें चाय पीते हुए देखा, शुरू से आख़िर तक, बिना अख़बार के। फिर उन्होंने ख़ाली कप उठाकर आगे बढ़ा दिया।

ओमकार ने कप लिया और दूसरा भर लाए।

सातवें दिन पट्टी खुल गई और शारदा अगली सुबह से फिर रसोई में थीं। ओमकार बरामदे में अख़बार लेकर बैठ गए और चाय हाथ में आ गई, जैसे बयालीस साल से आती थी। फ़र्क़ बस इतना है कि अब पहला कप ख़त्म होते ही वे उठकर भीतर जाते हैं और दूसरा ख़ुद ले आते हैं, दोनों के लिए, और शारदा उन्हें रोकती नहीं।