इलाहाबाद के उस रीडिंग रूम में सैंतीस मेज़ें थीं और उनमें से एक खिड़की के पास थी। धूप वहाँ दिन भर सीधी आती थी, इसलिए दोपहर में गरमी लगती थी, और शायद इसीलिए वह मेज़ ख़ाली रह जाती थी। सत्येंद्र ने उसे इसलिए चुना था कि वहाँ बल्ब की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
अनुराधा उसके तीन हफ़्ते बाद आई और सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई, और किसी ने कोई बात नहीं की। अगले दिन वह फिर वहीं बैठी। तीसरे दिन के बाद वह मेज़ उन दोनों की हो गई, इस तरह कि कोई और वहाँ बैठता ही नहीं था।
वहाँ का नियम सादा था। बोलना नहीं है। सब लोग किसी न किसी घर से आए थे जिसने इसके लिए कुछ बेचा था, और वे सब यह जानते थे। बात करने वाले को लोग घूरकर देख लेते थे और दोबारा कहना नहीं पड़ता था।
दूरी बढ़ गई
दो साल में उनके बीच जितनी बातें हुईं, उन्हें जोड़ा जाए तो शायद दो घंटे बनते। पर उन दो सालों में वे एक-दूसरे को उतना देख चुके थे जितना कोई किसी को नहीं देखता। कौन कब थकता है। किसकी कमर कब दुखने लगती है। कौन किस विषय से बचता है। सत्येंद्र जानता था कि अनुराधा कोई कठिन चीज़ पढ़ते हुए पेंसिल दाँतों के बीच रख लेती है, और अनुराधा जानती थी कि सत्येंद्र का दिमाग़ दोपहर तीन बजे बीस मिनट के लिए बिलकुल नहीं चलता।
बातें पर्चियों पर होती थीं। एक तारीख़ पूछता, दूसरा लिख देता, एक थर्मस लाता और दूसरा गिलास। अनुराधा की लिखावट छोटी थी और सत्येंद्र उसे पढ़ने के लिए काग़ज़ पास खींच लेता था।
सत्येंद्र का यह तीसरा साल था। उसके पिता ने डेढ़ बीघा बेचा था और गाँव में यह बात सबको मालूम थी। चौथे साल के लिए बेचने को कुछ था भी नहीं।
अनुराधा को घर से दो साल मिले थे। दो साल में हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो एक रिश्ता रुका हुआ था जिसे उसके ताऊ ने संभालकर रखा था। उसने यह बात एक ही बार कही थी, पर्ची पर नहीं, बोलकर, बाहर सीढ़ियों पर।
दोनों जानते थे। यह ऐसी चीज़ नहीं थी जिसे जानने के लिए कहना पड़े। पर कहने का मतलब यह होता कि उसके बाद दोनों में से कोई भी उस मेज़ पर उस तरह नहीं बैठ पाता, और उस साल उस मेज़ से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं था। इसलिए नहीं कहा गया।
जब सब सुन रहे थे
क्वार की एक शाम बिजली गई और पूरा हॉल अँधेरे में डूब गया। सब लोग बाहर निकल आए। सत्येंद्र और अनुराधा सीढ़ियों पर बैठ गए और चालीस मिनट तक बिजली नहीं आई। उन चालीस मिनटों में उन्होंने पढ़ाई के अलावा भी बातें कीं। घर की, गाँव की, और उस मास्टर की जिसने दोनों को अलग-अलग शहरों में बैठकर एक ही किताब पढ़ने की सलाह दी थी। बिजली आते ही दोनों उठकर भीतर चले गए।
इम्तिहान दिसंबर में था और नतीजा मई में आया।
अनुराधा का नाम सूची में था। सत्येंद्र का नहीं था। उसने सूची तीन बार देखी, फिर चौथी बार, फिर बंद कर दी।
उस दिन दोनों रीडिंग रूम में नहीं गए। अगले दिन सत्येंद्र गया और मेज़ पर अकेला बैठा रहा और एक पन्ना नहीं पढ़ा। अनुराधा तीसरे दिन आई। वह कुछ देर खड़ी रही, फिर बैठ गई, और दोनों शाम तक वहीं रहे। उन दिनों में उनके बीच कोई बात नहीं हुई, और वह चुप्पी पहले वाली से अलग थी, क्योंकि पहले वाली में एक मेज़ साझा थी और अब साझा कुछ भी नहीं था।
जाने का दिन आया तो वह स्टेशन तक छोड़ने गया। ट्रेन मसूरी की ट्रेनिंग के लिए थी और उसमें उसके पिता और छोटा भाई भी थे। सत्येंद्र ने सामान चढ़ाया। अनुराधा ने कहा कि पहुँचकर बता देगी और उसने कहा कि ठीक है।
ट्रेन चलने में चार मिनट थे। इन चार मिनटों में उसने वह बात कहने के बारे में सोचा। फिर उसने सोचा कि अब कहने का क्या मतलब है, जब उसे ख़ुद नहीं मालूम कि अगले साल वह कहाँ होगा। ट्रेन चल दी।
उसने चौथा साल किया, बिना किसी को बताए, पिता के भेजे बिना। ट्यूशन पढ़ाकर ख़र्च निकाला। नतीजा फिर वही रहा। पाँचवें साल उसने फ़ॉर्म भरा और परीक्षा देने नहीं गया।
उसी कोचिंग ने उसे नौकरी दे दी। वह अब वहीं पढ़ाता है, इतिहास, और उसके बैच में हर साल पैंतालीस बच्चे होते हैं। पंद्रह साल हो गए।
अनुराधा की चिट्ठी पहुँचने के बाद आई थी, जैसा उसने कहा था। पहली में मसूरी की ठंड का ज़िक्र था और दूसरी में उसके बैच के लोगों का। उसके बाद दो और आईं। फिर काम बढ़ता गया, जैसा बढ़ता है। दोनों तरफ़ से कोई नाराज़गी नहीं थी और यही सबसे अजीब बात है।
रीडिंग रूम अब भी चलता है और सैंतीस मेज़ें अब भी हैं। पिछले हफ़्ते एक लड़की ने सत्येंद्र से पूछा कि क्या वह खिड़की वाली मेज़ ले सकती है, क्योंकि वहाँ दिन भर उजाला रहता है। उसने कहा कि ले लो, वहाँ बल्ब की ज़रूरत नहीं पड़ती।