टेंपो की आवाज़ मोड़ से ही पहचान में आ जाती थी, क्योंकि उसका क्लच सालों से आवाज़ करता था और शमशेर ने उसे कभी ठीक नहीं कराया था। रतनी उस आवाज़ पर गेट तक आ जाती थी। मंगलवार की सुबह उसके घर में यही एक तय बात थी।
वह पापड़ बनाती थी। घर की बैठक में चार औरतें काम करती थीं और हफ़्ते भर का माल मंगलवार को उठता था। डिब्बे गिने जाते, पर्ची बनती, दस्तख़त होते, और टेंपो चला जाता। पूरा काम पाँच मिनट का था।
उन पाँच मिनटों में बात होती थी। मौसम की, सड़क की, उस पुल की जो तीन साल से बन रहा था। शमशेर बताता था कि किस मोड़ पर पानी भर जाता है। रतनी बताती थी कि इस बार उड़द का भाव क्या चल रहा है। कभी-कभी वह अपने बेटे मनोहर का ज़िक्र कर देती थी, जो पुणे में था। एक बार, बहुत साल पहले, शमशेर ने बताया था कि उसकी माँ भी पापड़ बेला करती थीं। रतनी ने यह नहीं पूछा कि वे अब कहाँ हैं, और उसने बताया भी नहीं।
वह एक शाम
पंद्रह साल से यही हो रहा था। इसके बाहर की कोई बात उनके बीच कभी नहीं आई।
रतनी चौंतीस की थी जब उसके पति गुज़रे। उसके बाद उसने पापड़ का काम खड़ा किया, बेटे को पढ़ाया, और उसे पुणे भेज दिया। घर अब बड़ा लगता था। शाम को वह बैठक में बैठकर अगले दिन के लिए उड़द भिगोती थी और रेडियो चलता रहता था। दीवार पर उसके पति की तस्वीर थी, जिस पर बरस में एक बार माला चढ़ती थी और बाक़ी दिनों वह उसे कपड़े से साफ़ करती रहती थी।
शमशेर की शादी नहीं हुई थी। वह अपने भाई के परिवार के साथ रहता था और कमाई का बड़ा हिस्सा वहीं जाता था। उसकी उम्र अट्ठावन थी और वह अब भी सुबह चार बजे निकलता था।
क़स्बा छोटा था। एक विधवा और एक अकेला आदमी अगर पाँच मिनट से ज़्यादा गेट पर खड़े रह जाएँ, तो शाम तक बात तीन घरों में पहुँच जाती है। दोनों यह जानते थे। इसीलिए घड़ी दोनों की जेब में थी, हालाँकि किसी ने कभी उसे निकालकर नहीं देखा।
आषाढ़ के एक मंगलवार को टेंपो नहीं आया। साढ़े आठ बजे तक रतनी तीन बार गेट तक गई। नौ बजे उसने ख़ुद को समझाया कि माल तो शाम तक भी जा सकता है। सवा नौ पर आवाज़ आई।
आख़िरी बार
शमशेर ने देर की वजह बताई और फिर एक बात और कही। उसका भाई इंदौर जा रहा था, तबादला हो गया था, और वह भी साथ जा रहा था। तीन मंगलवार बचे थे।
रतनी ने पर्ची पर दस्तख़त किए और कहा कि इंदौर अच्छा शहर है। शमशेर ने कहा कि सुना तो यही है। इसके बाद किसी को कुछ नहीं सूझा, और वह पहली बार था जब पाँच मिनट लंबे लगे।
अगले मंगलवार रतनी ने डिब्बों के साथ एक शीशी रख दी, नींबू का अचार, जो ऑर्डर में नहीं था। शमशेर ने उसे उठाया, गाड़ी में रखा, और पर्ची पर दस्तख़त कर दिए। उसने पूछा नहीं कि यह किसलिए है।
उसके अगले मंगलवार को दूसरी शीशी गई, आम की। तीसरी बार के लिए रतनी ने कुछ नहीं बनाया, क्योंकि तीसरी बार आख़िरी थी और उसे लगा कि शीशी से काम नहीं चलेगा।
आख़िरी मंगलवार को उसने सारा माल सुबह छह बजे ही गिनकर, बाँधकर, गेट के पास रखवा दिया। सात बजे टेंपो आया। शमशेर ने डिब्बे चढ़ाए और पर्ची निकाली।
रतनी ने पर्ची नहीं ली। "एक काम था," उसने कहा। शमशेर ने हाथ नीचे कर लिया। "मुझे बरगदी जाना है। मेरे ससुराल का गाँव है। बीस साल से नहीं गई।"
बरगदी तीन घंटे दूर थी और वहाँ जाने वाली बस दोपहर में एक ही थी, जो लौटती अगले दिन थी। यह रतनी पंद्रह साल से जानती थी। उसने आज तक किसी से यह नहीं कहा था, और आज उसने कह दिया, और कहने के बाद वह गेट के खंभे को पकड़कर खड़ी रही।
शमशेर ने कुछ पूछा नहीं। उसने झुककर इंजन बंद किया, फिर दोबारा चालू किया, और कहा कि पीछे बैठ जाइए, आगे धूप आती है।
रास्ते में बारिश मिली। बरगदी में रतनी ने जो करना था किया। गाँव के कुछ लोगों ने उसे पहचान लिया और एक बूढ़ी औरत ने उसका हाथ पकड़कर बहुत देर तक कुछ कहा, जिसका जवाब उसने सिर हिलाकर दिया। शमशेर तीन घंटे टेंपो के पास खड़ा रहा और एक बार भी भीतर नहीं आया। लौटते हुए अँधेरा हो गया था। आधे रास्ते में रतनी सो गई और शमशेर ने रफ़्तार धीमी कर ली, क्योंकि उस सड़क पर गड्ढे थे और गड्ढों पर नींद टूटती है।
वह अगले हफ़्ते इंदौर चला गया। अब मंगलवार को दूसरा टेंपो आता है और उसका क्लच आवाज़ नहीं करता, इसलिए रतनी को गेट तक हॉर्न सुनकर जाना पड़ता है। एक बात उसे बाद में पता चली। बरगदी वाले सफ़र से एक हफ़्ता पहले शमशेर ने अपना क्लच बनवाया था, पंद्रह साल टालने के बाद, और उसके बाद उस गाड़ी को उसने सिर्फ़ दो बार चलाया।