मेज़ के बीचोंबीच काजू की एक कटोरी रखी थी और डेढ़ घंटे में किसी ने उसे नहीं छुआ। उसके साथ चाय थी और नमकीन भी। बैठक में दोनों तरफ़ के आठ लोग बैठे थे, और बैसाख की उस दोपहर जबलपुर में पंखा चलाने से भी हवा गरम ही लगती थी। बाहर सड़क पर एक ठेले वाला बर्फ़ के गोले बेच रहा था और उसकी घंटी हर दो मिनट में भीतर तक सुनाई दे रही थी।
बात वही हुई जो ऐसे मौक़ों पर होती है। किसके कितने भाई-बहन हैं, कौन कहाँ है, मकान अपना है या किराए का। श्वेता के पिता बंसीधर दो बार अपनी घड़ी देख चुके थे। अभय की माँ लीलावती ने तीन बार कहा कि लड़की देखने में सुशील है। बीच-बीच में ऐसी चुप्पियाँ आ रही थीं जिनमें दोनों तरफ़ के लोग एक साथ चाय उठा लेते थे, सिर्फ़ इसलिए कि कुछ करने को हो।
फिर वही वाक्य आया जिसका दोनों को इंतज़ार था। बच्चों को आपस में बात कर लेने दो। श्वेता उठी और अभय उसके पीछे सीढ़ियों से छत पर चला गया। नीचे किसी ने कहा कि चालीस मिनट काफ़ी हैं।
पहली मुलाक़ात
छत पर धूप थी और एक तरफ़ पानी की टंकी की छाँव थी। दोनों वहीं खड़े हो गए। शुरू के दस मिनट वही सवाल-जवाब रहे जो नीचे हो चुके थे, बस अब उन्हें ख़ुद पूछना पड़ रहा था। उन्होंने कॉलेज की बात की, फिर जबलपुर की गरमी की, फिर उस नए बाज़ार की जो स्टेशन के पास खुला था और जहाँ अभी आधी दुकानें ख़ाली पड़ी थीं। दोनों को मालूम था कि इनमें से किसी बात का कोई मतलब नहीं है। अभय ने पूछा कि उसे खाना बनाना आता है और पूछकर उसे ख़ुद बुरा लगा।
श्वेता ने ग़ौर किया कि वह बार-बार सीढ़ियों की तरफ़ देख रहा है। घबराहट नहीं थी। वह कुछ तय कर रहा था।
पंद्रहवें मिनट पर उसने कहा, "एक बात बतानी है। नीचे नहीं बता सकता।" श्वेता ने कुछ कहा नहीं। उसने बस उसे देखा।
"दुकान घाटे में है। बायोडाटा में लिखा है कि पुश्तैनी कारोबार है। है भी। पर पिछले चार साल से घाटे में है और अब उधार पर चल रही है।"
"कितना?"
साथ चलने का सवाल
अभय ने सोचा नहीं था कि पहला सवाल यह होगा। उसने संख्या बताई। श्वेता ने दोहराई, फिर ज़ोर से जोड़ने लगी, ब्याज कितना बैठता है, हर महीने कितना निकलेगा, कितने साल में उतरेगा। बोलते-बोलते उसने अपनी उँगलियाँ मोड़ीं और फिर खोलीं। उसकी नौकरी में हिसाब रोज़ का काम था और संख्या सुनते ही उसे तोड़ लेने की आदत उसे लग चुकी थी।
"सूरत जाना पड़ेगा," अभय ने कहा। "मामा की फ़र्म में काम मिल जाएगा। दुकान बंद करके नहीं, चलाते हुए। दो-तीन साल।" "और यह घर के लोग जानते हैं?" "माँ जानती है। बाक़ी नहीं।"
श्वेता ने पूछा कि वह उसे यह क्यों बता रहा है, जबकि बताने से रिश्ता टूट सकता है। अभय ने कहा कि बाद में तो पता चलेगा ही, और तब वह उसका झूठ हो जाएगा, अभी सिर्फ़ उसकी परेशानी है।
फिर श्वेता ने अपनी बात कही। वह लैब में काम करती थी, तीन साल से, और वह नौकरी नहीं छोड़ेगी। उसने यह माँग की तरह नहीं कहा। उसने इसे उसी तरह रखा जैसे अभय ने अपनी दुकान रखी थी, एक ऐसी चीज़ की तरह जो पहले से मौजूद है। तीन साल में उसने एक भी छुट्टी नहीं ली थी और यह बात उसे याद भी नहीं रहती थी, क्योंकि वहाँ जाना उसे कभी बोझ नहीं लगा।
"सूरत में लैब होंगी?" "होंगी।" "तो पता कर लीजिएगा।" अभय ने पहली बार पूछा कि वह लैब में करती क्या है। श्वेता ने बताना शुरू किया और पाँच मिनट बोलती रही। दोनों परिवारों में आज तक किसी ने उससे यह नहीं पूछा था।
पैंतीसवें मिनट पर नीचे आवाज़ें तेज़ हो गईं। कोई हँस रहा था और कोई बर्तन उठा रहा था।
"मैं आपसे कुछ माँग नहीं सकता," अभय ने कहा। "मेरे पास अभी कुछ है नहीं।" "उधार है," श्वेता ने कहा। "वह भी कुछ होता है। दो लोग मिलकर उतारें तो आधे समय में उतरता है।"
अभय ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस टंकी की छाँव से निकलकर धूप में क़दम रखा और वापस छाँव में आ गया, जैसे उसे कुछ करने की ज़रूरत हो। मुँडेर से नीचे गली दिख रही थी और उसमें दो बच्चे एक साइकिल के पीछे भाग रहे थे।
चालीस मिनट पूरे होने पर दोनों नीचे उतरे। सीढ़ियाँ सँकरी थीं और अभय आगे था। मोड़ पर वह रुक गया और तब तक खड़ा रहा जब तक श्वेता उसके बराबर नहीं आ गई। यह छोटी बात थी और श्वेता ने उसे नोट कर लिया।
बैठक में दोनों से अलग-अलग पूछा गया। अभय ने वही कहा जो कहा जाता है, कि जैसा बड़े ठीक समझें। श्वेता ने कहा, हाँ। अब सूरत में तीन साल हो गए हैं, उधार का आधे से ज़्यादा उतर चुका है, और इस बात पर दोनों में अब भी बहस होती है कि पहले हाँ किसने कहा था, क्योंकि अभय का कहना है कि उसने सीढ़ी के मोड़ पर ही तय कर लिया था।