आशीष पर मुक़दमा दो हज़ार सोलह से चल रहा था। मामला कॉलेज के दिनों का था। उस बरस वहाँ छात्रसंघ को लेकर बवाल हुआ था और उसमें एक बस जली थी और एक थाने पर पथराव हुआ था। रिपोर्ट में सत्ताईस नाम लिखे गए।
उनमें उसका भी था। उसने बस नहीं जलाई थी और वह वहाँ मौजूद ज़रूर था, और यह फ़र्क़ अदालत में साबित करने में बरस लगते हैं। उस तरह के मुक़दमे में गवाह वही पुलिस वाले होते हैं और उनके तबादले होते रहते हैं और हर तबादले पर तारीख़ आगे बढ़ जाती है।
नौ बरस में सत्ताईस में से चौदह लोग बरी हो चुके थे और तेरह का चलता रहा। इस बीच आशीष ने पढ़ाई छोड़ दी और अपने बाप की मनिहारी की दुकान पर बैठने लगा। और उसके रिश्ते की बात तीन जगह से लौटी।
यह उस क़स्बे में साफ़ बताया भी नहीं जाता। लड़की वाले आते हैं, बैठते हैं, चाय पीते हैं, और फिर उनका जवाब नहीं आता। तीसरी बार जवाब आ गया था, क्योंकि लड़की के चाचा उसी अदालत में मुहर्रिर थे। उन्होंने कहलवा दिया कि लड़का ठीक है पर काग़ज़ ख़राब है।
इसके बाद आशीष ने घर पर कह दिया कि अब कहीं बात मत चलाना। उसने यह ग़ुस्से में नहीं कहा, उसने कहा कि जब तक फ़ैसला नहीं आता, मैं किसी से नहीं कहूँगा कि मुझसे शादी कर लो। उसकी माँ ने बहुत बार समझाया और वह हर बार यही कहता रहा।
रीता उसी बाज़ार में थी, उसके पिता की सिलाई की दुकान थी, चार दुकान छोड़कर, और वह वहाँ बैठती थी। वह उसे तेरह बरस से जानती थी और यह जानना उसी तरह का था जैसा एक ही बाज़ार में बैठने वालों के बीच होता है।
उसे मुक़दमे की पूरी बात मालूम थी। शुरू से आख़िर तक। बाज़ार में ऐसी बात छिपती नहीं और वह उन दिनों की बात है जब हर दुकान पर यही चर्चा थी। उसे तीनों रिश्तों की बात भी मालूम थी। और यह भी कि वह ख़ुद कभी नहीं कहेगा।
यही आख़िरी बात इस पूरे क़िस्से की जड़ है। एक आदमी जिसने तय कर लिया हो कि वह माँगेगा नहीं, उसके सामने बैठकर इंतज़ार करने का कोई मतलब नहीं है। रीता ने अट्ठाईस की उम्र में यह बात रखी। ख़ुद।
उसने वह किसी नाटक के साथ नहीं की। मार्च की एक दोपहर थी और बाज़ार में उस वक़्त कोई नहीं होता। वह उसकी दुकान पर गई और काउंटर के इस तरफ़ खड़ी रही और उसने कहा कि मुझे तुमसे एक बात करनी है।
फिर उसने वह कह दी, आशीष ने कोई जवाब नहीं दिया। वह खड़ा रहा और फिर उसने कहा कि तुम्हें मालूम है न। उसने कहा कि सब मालूम है। और वह चली गई। जवाब का इंतज़ार किए बिना।
इसके बाद तीन हफ़्ते कुछ नहीं हुआ। पूरे इक्कीस दिन। आशीष उन तीन हफ़्तों में उससे नहीं मिला और बाज़ार में जहाँ आमने-सामने पड़ गया वहाँ नमस्ते करके निकल गया। उसकी वजह वह नहीं थी जो रीता ने सोची। वह डरा हुआ नहीं था और उसे यह भी नहीं लग रहा था कि वह मज़ाक़ कर रही है।
वह उन तीन हफ़्तों में अपने वकील के पास गया और उसने उससे पूछा कि सीधी बात बताइए, कितना और लगेगा। वकील ने कहा कि दो बरस, शायद तीन, फिर वह अपने बाप के पास गया और उसने पूछा कि दुकान में उसका अपना हिस्सा कितना बनता है।
यानी उसने वह किया जो एक ज़िम्मेदार आदमी करता है और जिसमें वक़्त लगता है। चौथे हफ़्ते वह उनकी दुकान पर गया और रीता के पिता से बात की। उसने उनसे कोई बात छिपाई नहीं। उसने मुक़दमा भी बताया और यह भी बताया कि कब तक चल सकता है।
उन्होंने दो दिन का वक़्त लिया। फिर हाँ कह दी। शादी उसी बरस हुई, मुक़दमा उसके बाद छह बरस और चला। इन छह बरसों में वे दोनों तेईस तारीख़ों पर गए और उनमें से उन्नीस पर सिर्फ़ अगली तारीख़ मिली।
रीता हर बार साथ गई। तेईस में से तेईस। इसकी एक वजह यह भी थी कि अदालत में अकेले जाने वाला आदमी वहाँ बैठे-बैठे टूट जाता है और साथ वाला उसे बात में लगाए रखता है। फ़ैसला ग्यारहवें बरस आया।
मार्च में। तेरह में से ग्यारह बरी हुए और आशीष उनमें था। उस दिन वह दुकान पर था, क्योंकि उस तारीख़ पर सिर्फ़ बहस थी और फ़ैसला बाद में सुनाया जाना था और वह दिन उन्हें बताया नहीं गया था।
आदेश की नक़ल लेने रीता गई। अकेले। वह उस दिन किसी और काम से अदालत की तरफ़ गई थी और वकील के मुंशी ने उसे बता दिया। उसने नक़ल ली और वहीं बरामदे में खड़े होकर पढ़ी। उसमें चार पन्ने थे और आख़िरी पन्ने पर वह लिखा था जो ग्यारह बरस से नहीं लिखा गया था।
उसने वह काग़ज़ अपने थैले में रखा। फिर वह सब्ज़ी मंडी गई, क्योंकि वह रास्ते में पड़ती है और उस दिन घर में सब्ज़ी नहीं थी।
उसने आशीष को शाम को बताया।
खाना लगाते वक़्त, बीच में, जैसे बाज़ार की कोई बात बताई जाती है। उसने कहा कि आज तुम्हारे केस का फ़ैसला आ गया, नक़ल थैले में है, और आलू का भाव फिर चढ़ गया है। आशीष ने वह काग़ज़ उसी रात पढ़ा और दो बार पढ़ा और उसके बाद उसे उसी थैले में वापस रख दिया, और वह थैला अब भी दुकान के काउंटर के नीचे टँगा रहता है।