सीतापुर की कचहरी के सामने वाली उस दुकान को जानकी के बाप ने खोला था। टाइप, नक़ल, स्टांप, और अर्ज़ी लिखना। बाप को लकवा मारा तब वह चौबीस की थी। दुकान उसी दिन उसकी हो गई और उसके बाद वह वहीं से नहीं हिली।

अब वह चौवालीस की है।

उसकी शादी नहीं हुई और इसकी वजह किसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी, क्योंकि जिस घर में एक बीमार आदमी बीस बरस पड़ा रहे, उस घर में यह सवाल अपने आप बंद हो जाता है। उसके बाप की एक आदत उसने रखी हुई थी।

जो भी अर्ज़ी टाइप होती थी, उसका एक कार्बन वह अपने पास रख लेती थी। यह किसी काम की चीज़ नहीं मानी जाती। ग्राहक अपनी कापी ले जाता है और दुकान वाले को उससे कोई मतलब नहीं रहता। बाप कहता था कि काग़ज़ फेंकने की चीज़ नहीं होता।

इसलिए बाईस बरस के कार्बन उस दुकान में रखे हुए हैं।

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साल के हिसाब से बंडल बँधे हैं, रस्सी से, और हर बंडल पर साल लिखा है, और वे पीछे वाली दीवार की तीन तख़्तों पर ऊपर तक चढ़े हुए हैं। बरसात में उनकी रखवाली करनी पड़ती है।

काग़ज़ का असली दुश्मन पानी नहीं, नमी है। वह दीवार से आती है और नीचे वाले बंडल पहले पकड़ती है, और जो बंडल एक बार सील गया वह खुलते ही झड़ जाता है। इसलिए हर जुलाई में जानकी सारे बंडल उतारकर देखती है।

यह चार दिन का काम है। वह इसे अकेले करती है। शिवनाथ की पहली अर्ज़ी उसी दुकान से गई थी। बँटवारे का मुक़दमा था। तीन भाइयों में ज़मीन का।

ऐसे मुक़दमे उस ज़िले में बीस-बीस बरस चलते हैं और यह सबको मालूम है और फिर भी सब करते हैं, क्योंकि न करने का मतलब है कि आपका हिस्सा किसी और के पास रह गया। शिवनाथ का चौदह बरस चला।

पूरे चौदह। इन चौदह बरसों में वह उस दुकान पर कम से कम दो सौ बार आया होगा।

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नक़ल कराने, अर्ज़ी टाइप कराने, तारीख़ की पर्ची बनवाने, और कई बार सिर्फ़ इसलिए कि वकील ने बैठने को कह दिया था और बैठने की जगह कहीं और नहीं थी। जानकी ने उसका पूरा मुक़दमा पढ़ रखा था। यह उसने जान-बूझकर नहीं पढ़ा। जो आदमी चौदह बरस आपके सामने अपने काग़ज़ रखता रहे, उसका मामला आपको आ ही जाता है।

शिवनाथ की उम्र अब उन्तालीस थी और उसकी भी शादी नहीं हुई थी। इसकी वजह वही मुक़दमा था और यह बात उस इलाक़े में कोई छिपाता नहीं।

जिस आदमी के पास अपने नाम की ज़मीन न हो, उसके लिए रिश्ता नहीं आता। और जिसका बँटवारा अदालत में हो, उसके नाम कुछ नहीं होता, चाहे खेत में वह चौदह बरस से हल चला रहा हो। मुक़दमा उस बरस मार्च में हारा गया।

हार की वजह एक काग़ज़ था जो मौजूद नहीं था।

सन् अट्ठानबे में तहसील से एक आदेश हुआ था जिसमें उसके बाप के हिस्से की चौहद्दी लिखी थी। वह आदेश कहीं खो गया और तहसील के रिकॉर्ड रूम में जो बस्ता था वह दो हज़ार सात की आग में गया।

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उसके बिना बाक़ी सब काग़ज़ बेकार थे। चौहद्दी के बिना बँटवारा नहीं होता। वकील ने साफ़ कह दिया कि अपील में भी कुछ नहीं रखा और अब इसे छोड़ दो। शिवनाथ ने छोड़ दिया। चौदह बरस बाद, एक ही बार में।

उसने अप्रैल में आकर अपनी फ़ाइल जानकी की दुकान से उठाई, जो वहाँ बरसों से पड़ी रहती थी, और उसने कहा कि अब इसकी ज़रूरत नहीं। जानकी ने कुछ नहीं कहा। उस साल जुलाई में उसने बंडल उतारे। यह वही चार दिन वाला काम था और उसने वही किया जो हर बरस करती है।

तीसरे दिन दो हज़ार नौ वाला बंडल खुला।

उसमें बीच में एक अर्ज़ी थी जो उसने ही टाइप की थी, शिवनाथ के पुराने वकील की लिखवाई हुई, और वह एक ऐसी अर्ज़ी थी जिसका मुक़दमे में कोई ख़ास मतलब नहीं था। उसमें अदालत से कुछ माँगा गया था और माँगने की वजह में तीन पुराने काग़ज़ों का हवाला दिया गया था।

उन तीनों के नंबर और तारीख़ें उस अर्ज़ी में पूरी लिखी थीं। तीसरा वही अट्ठानबे वाला आदेश था। नंबर पूरा। तारीख़ पूरी। जानकी ने उस रात दुकान बंद की और वहीं बैठी रही।

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वह वकील नहीं है और उसने कभी क़ानून नहीं पढ़ा। पर कचहरी के सामने बीस बरस बैठने से आदमी को एक चीज़ आ जाती है, और वह यह कि किस काग़ज़ की क़ीमत क्या है।

उसे यह मालूम था कि जिस आदेश का नंबर और तारीख़ किसी पुरानी अदालती अर्ज़ी में दर्ज हो, वह आदेश अदालत के लिए मौजूद हो जाता है, चाहे उसका असल काग़ज़ जल चुका हो।

अगली सुबह उसने वह कार्बन निकालकर अलग रखा। फिर उसने चार दिन इंतज़ार किया, क्योंकि शिवनाथ महीने में एक बार बाज़ार आता था और उसे बुलवाना उसे ठीक नहीं लगा। वह पाँचवें दिन आया, किसी और काम से। उसने उसे वह काग़ज़ दिया और कहा कि इसे वकील को दिखा दो।

अपील दायर हुई। सुनवाई में अदालत ने तहसील से वह मिसिल तलब की और नंबर के सहारे वह निकल आई, और दूसरे बरस फ़ैसला उसके हक़ में हो गया। उसे तीन बीघा और एक कच्चा घर मिला। इसमें दो बरस और लगे और तब तक वह इकतालीस का हो चुका था।

फ़ैसले के बाद कचहरी आने की उसकी कोई वजह नहीं बची। वह तीन महीने नहीं आया। चौथे महीने में वह आया और दुकान के सामने खड़ा हो गया और उसके हाथ में कोई काग़ज़ नहीं था। जानकी उस वक़्त बंडल बाँध रही थी। उसने बिना कुछ पूछे रस्सी का दूसरा सिरा उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।

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उसने पकड़ लिया। उस दिन कोई बात नहीं हुई। उन्हें साथ रहते अब छह बरस हुए और शिवनाथ खेत देखता है और शाम को दुकान पर आ जाता है। दीवार की तख़्तों पर अब अट्ठाईस बंडल हैं।

उनमें से एक अलग रखा है, बाक़ी सबसे हटकर, आँख की सीध में। वह दो हज़ार नौ वाला है और जानकी ने उसे उस दिन के बाद दोबारा नहीं बाँधा। हर बरस जुलाई में वह उसे भी उतारकर देखती है और नमी टटोलती है और वापस वहीं रख देती है, खुला ही।