रामदीन की दुकान मऊ के उस बाज़ार में है जहाँ सात दर्ज़ी एक क़तार में बैठते हैं। वह उन सातों में सबसे पुराना है और सबसे धीमा भी।

धीमा होना उस लाइन में तारीफ़ नहीं मानी जाती। जिस दुकान से कपड़ा तीन दिन में निकलता है वहाँ भीड़ रहती है, और रामदीन के यहाँ आठ दिन लगते हैं। फिर भी उसका काम चलता रहा, क्योंकि जिन्हें ठीक चाहिए वे उसी के पास आते हैं।

उसकी शादी नहीं हुई। इसकी कोई कहने लायक़ वजह नहीं है और छोटे शहर में ऐसी बात का कोई न कोई मतलब निकाल ही लिया जाता है, और वे सब मतलब ग़लत थे। पुष्पा पहली बार सावन में आई थी। छह बरस पहले।

उसके हाथ में एक पुराना ब्लाउज़ था और थान का एक टुकड़ा। उसने कहा कि इसी का बना दीजिए, बिलकुल इसी का। यह कोई अनोखी बात नहीं थी। बहुत औरतें पुराना कपड़ा लेकर आती हैं और कहती हैं कि इसी नाप का बना दो, क्योंकि नाप देना उन्हें अच्छा नहीं लगता।

रामदीन ने वैसा ही बना दिया। उसने नाप उतारकर अपनी कापी में लिख भी लिया, जैसा वह हर नए ग्राहक का लिखता है। तीन महीने बाद वह फिर आई। दूसरा पुराना ब्लाउज़, दूसरा थान। फिर तीसरा। फिर चौथा। छह बरस में उसने सत्रह सिलवाए।

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और सत्रहों का नाप एक ही था। यह वह चीज़ है जो सिर्फ़ दर्ज़ी को दिखती है और किसी को नहीं दिखती।

आदमी का शरीर छह बरस में बदलता है। दो इंच इधर, एक इंच उधर, कंधा थोड़ा गिरता है, कमर बदलती है। कोई भी औरत जो अपने लिए कपड़े सिलवाती है, उसका नाप छह बरस एक जैसा नहीं रह सकता। पुष्पा का रहा।

दूसरी बात यह थी कि वह नाप उसका था ही नहीं। रामदीन उसे सामने खड़ा देखता था। कंधा उससे चौड़ा था, लंबाई ज़्यादा थी, और बाँह की गोलाई कहीं और की थी। वे कपड़े किसी और के नाप के थे और वह उन्हें ले जाती थी।

तीसरी बात सबसे साफ़ थी। हर पुराने ब्लाउज़ के बाएँ कंधे की सिलाई थोड़ी तिरछी थी। यह किसी दर्ज़ी की चूक थी, बरसों पुरानी। ऐसी चूक हर दर्ज़ी से हो जाती है और उसे ठीक करना आधे घंटे का काम है।

पुष्पा हर बार कहती थी कि सब वैसा ही रहे। इसलिए रामदीन हर नए कपड़े में वह तिरछी सिलाई भी उतारता था। जान-बूझकर, हाथ से, क्योंकि मशीन सीधी ही चलती है। चौथे बरस उसने एक बार पूछ लिया था। उसने कहा कि कंधा ठीक कर दूँ, कोई पैसा नहीं लगेगा।

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पुष्पा ने कहा कि नहीं। इतनी ही बात हुई और उसके बाद छह बरस में इस पर दोबारा कुछ नहीं कहा गया। उसकी माँ की बात रामदीन को बाज़ार से मालूम हुई थी, बहुत बाद में। वे उसी बरस गई थीं जिस बरस पुष्पा पहली बार आई थी।

पुष्पा उन कपड़ों को पहनती नहीं थी। वह उन्हें अलमारी में रखती थी और साल में दो बार धूप दिखाती थी और वापस रख देती थी। यह भी रामदीन ने किसी से नहीं पूछा और यह भी उसे मालूम हो गया, क्योंकि सत्रह में से एक भी कपड़ा कभी मरम्मत के लिए वापस नहीं आया।

पहना हुआ कपड़ा छह बरस में एक बार तो लौटता ही है। सातवें बरस की बरसात में वह अठारहवाँ लेकर आई। उस दिन बहुत पानी था और वह भीगकर आई थी और उसके हाथ में लिफ़ाफ़ा था। रामदीन ने उसे खोला और मेज़ पर फैलाया और उसे तुरंत समझ आ गया कि इस बार नहीं होगा।

वह कपड़ा गल चुका था।

सूती कपड़ा एक हद के बाद नाप देने लायक़ नहीं रहता। उसे मेज़ पर फैलाओ तो वह अपना आकार नहीं रखता, किनारे बैठ जाते हैं, और उससे नक़ल उतारो तो जो बनेगा वह उस कपड़े का नहीं होगा, उसकी थकान का होगा।

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उसने पुष्पा से यह कह दिया। उसने साफ़ कहा कि इसका बनाना ठीक नहीं होगा और जो बनेगा वह वैसा नहीं होगा। पुष्पा ने लिफ़ाफ़ा उठा लिया और जाने लगी। रामदीन ने उसे रोक लिया। उसने कहा कि छोड़ जाइए।

उसने यह क्यों कहा, यह उसने ख़ुद से भी नहीं पूछा। उस कपड़े पर उसने तीन दिन काम किया। उसने उसे बनाया नहीं। उसने उसे जोड़ा।

पूरे ब्लाउज़ के पीछे उसने बारीक मलमल की परत लगाई और उस परत पर पूरे कपड़े को हाथ से टाँका, धागे से धागे मिलाकर, ताकि जो बचा है वह अपनी जगह पर टिका रहे। बग़ल की दोनों सिलाई उसने खोलकर दोबारा की। किनारे उसने अंदर की तरफ़ मोड़कर बंद किए।

बाएँ कंधे की तिरछी सिलाई उसने वैसी ही रहने दी। यह तीन दिन का काम था और बनाने में एक दिन लगता। उसने दाम बनाने का ही लिया। सवा दो सौ।

पुष्पा उसे लेने आई और उसने उसे दुकान पर ही खोलकर देखा और काफ़ी देर तक देखती रही, और फिर उसने पैसे रखे और चली गई और उस दिन कुछ नहीं कहा। अगले महीने वह फिर आई। इस बार उसके हाथ में कोई पुराना कपड़ा नहीं था। सिर्फ़ थान था।

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उसने कहा कि मेरा नाप ले लीजिए। रामदीन ने कापी निकाली और उसी पन्ने पर, पुराने नाप के नीचे, नया लिखा। दोनों में तीन जगह फ़र्क़ था। इसे अब चार बरस बीत चुके हैं और उस कापी में उसके नाप के नीचे और भी लिखा जाता रहा है, क्योंकि नाप बदलता है।

वह अठारहवाँ वाला ब्लाउज़ पुष्पा पहनती है।

सत्रह में से एक भी उसने आज तक नहीं पहना और वह अठारहवाँ वह महीने में दो-तीन बार पहन लेती है। उसका बायाँ कंधा थोड़ा तिरछा बैठता है और जो देखता है वह यही समझता है कि दर्ज़ी से चूक हो गई है। बाज़ार में सात दर्ज़ी बैठते हैं और उनमें से छह यही समझते हैं।