झाँसी ज़िले के उस गाँव में दोनों घर आमने-सामने हैं। बीच में एक मेड़ है और मेड़ के सिरे पर एक कुआँ। मुक़दमा उसी मेड़ का था। ग्यारह बिस्वा ज़मीन और वह कुआँ। यह चंपा के बाप ने दायर किया था और सुक्खू के बाप उसमें प्रतिवादी थे, और यह उन दोनों के पैदा होने से पहले की बात है।
गाँव में ऐसे मुक़दमे रिश्तेदारी की तरह चलते हैं। वे किसी एक बात पर ख़त्म नहीं होते और उनका कोई एक कारण भी नहीं बताया जा सकता। चंपा और सुक्खू ने शादी कर ली। गाँव ने जो सोचा था, वह नहीं हुआ।
किसी ने घर से नहीं निकाला। किसी ने पंचायत नहीं बुलाई। किसी ने आग नहीं लगाई। दोनों घरों ने वह किया जो असल में होता है, और जिसके बारे में कोई नहीं बताता। वे ठंडे पड़ गए। चंपा की माँ आती-जाती रहीं। उसका बाप उसके घर कभी नहीं आया, और गली में मिलने पर उसने कभी मुँह नहीं फेरा और कभी बात भी नहीं की।
और मुक़दमा चलता रहा।
यह उस शादी से रुका नहीं। रुकने की कोई वजह भी नहीं थी। ज़मीन वहीं थी और काग़ज़ वहीं थे और अदालत को इससे कोई मतलब नहीं कि वादी की बेटी प्रतिवादी के घर में है। तारीख़ हर दो-ढाई महीने में पड़ती थी।
अदालत ज़िले में है और गाँव से चालीस किलोमीटर है और वहाँ जाने का एक ही साधन है, सुबह पौने सात वाली बस। उस बस में वे दोनों साथ जाते थे। चंपा अपने बाप के साथ जाती थी और सुक्खू अपने बाप के साथ, और चारों उसी बस में होते थे और दोनों बाप एक-दूसरे से बात नहीं करते थे।
अदालत में वे अलग बैठते थे।
यह कोई नियम नहीं है। पर मुक़दमे में दो तरफ़ होती हैं और दोनों तरफ़ के लोग अपनी-अपनी तरफ़ बैठते हैं, और वहाँ बैठने की जगह भी वैसे ही बँटी होती है जैसे बाक़ी सब। इसलिए वे ग्यारह बरस तक एक ही कमरे में अलग बेंच पर बैठे।
और शाम को उसी बस से लौटे। यह ऐसी चीज़ है जिसे बाहर वाला समझ नहीं सकता और गाँव वाले समझ जाते हैं। घर के अंदर उन्होंने एक बात तय कर रखी थी। मुक़दमे की बात घर में नहीं होगी।
इसे किसी ने लिखा नहीं था और इसे किसी ने तोड़ा भी नहीं। ग्यारह बरस में सुक्खू ने चंपा से एक बार नहीं पूछा कि तुम्हारे वकील ने क्या कहा, और चंपा ने भी नहीं। बच्चे दो हुए। लड़की पहले, लड़का बाद में।
उन्हें इस बारे में कुछ बताया नहीं गया। नौवें बरस में चंपा के बाप चले गए। उनकी उम्र बहत्तर थी और उन्हें कोई बीमारी नहीं थी और वे रात में सोए और सुबह नहीं उठे।
इसके बाद जो हुआ वह इस पूरे मामले की सबसे कड़ी बात है। उनकी कोई और औलाद नहीं थी। इसलिए मुक़दमा ख़त्म नहीं हुआ। वह उनकी बेटी के नाम चढ़ गया। अब काग़ज़ पर वादी चंपा थी और प्रतिवादी उसके ससुर।
उसका वकील उससे मिलने घर आया और उसने वही कहा जो हर वकील ऐसे मौक़े पर कहता है। कि अब तो आप एक ही घर में हैं, इसे ख़त्म करा दीजिए, आपस में बैठकर बाँट लीजिए। चंपा ने मना कर दिया।
उसने इतना कहा कि नहीं, यह चलेगा। इसे समझने के लिए एक चीज़ जाननी पड़ेगी। उसका बाप उस मुक़दमे पर उन्तीस बरस चला था। बस का किराया, वकील की फ़ीस, नक़ल के पैसे, और वे सारी तारीख़ें जिन पर सिर्फ़ अगली तारीख़ मिली।
अगर वह उसे वापस ले लेती तो उन उन्तीस बरसों का कोई मतलब नहीं बचता। यह उसने सुक्खू को नहीं समझाया। और सुक्खू ने उससे यह नहीं कहा कि वापस ले लो। पूरे दो बरस में एक दिन भी नहीं, और उस घर में उसने जो किया वह इससे कम नहीं था।
उन दो बरसों में वे उसी बस से जाते रहे। अब चारों नहीं, तीन। फ़ैसला ग्यारहवें बरस अप्रैल में आया। ज़मीन बँट गई। छह बिस्वा एक तरफ़, पाँच दूसरी तरफ़। और कुआँ किसी को नहीं मिला। अदालत ने उसे साझा घोषित कर दिया, यानी दोनों उसका पानी ले सकते हैं और कोई उसे बंद नहीं कर सकता।
जिस चीज़ पर तीस बरस लड़ाई हुई, उस पर किसी का हक़ नहीं ठहरा। उस दिन वे शाम वाली बस से लौटे। तीनों। बस में उनकी सीट वही थी जो हमेशा रहती थी। बाईं तरफ़, पीछे से तीसरी, और चंपा खिड़की के पास।
ग्यारह बरस में यह कभी नहीं बदला था।
अदालत में वे अलग बैठते रहे और बस में एक ही सीट पर, और इसमें उन्हें कभी कुछ अजीब नहीं लगा, क्योंकि वह उनकी अपनी चीज़ थी और मुक़दमे की नहीं थी। अब उसे सात बरस हो गए हैं। कुआँ वैसा ही है और उसका पानी अब भी अच्छा है।
दोनों घर उसका पानी नहीं भरते। तीस बरस की आदत सात बरस में नहीं जाती और दोनों तरफ़ के लोग हैंडपंप तक जाते हैं, जो दुगुनी दूर है। उस कुएँ पर सिर्फ़ बच्चे जाते हैं। चंपा की लड़की अब चौदह की है और लड़का ग्यारह का, और वे दोनों गर्मियों में वहीं खेलते हैं और उन्हें आज तक यह नहीं बताया गया कि उस कुएँ के बारे में कोई बात भी थी।